मंगलवार, 10 अप्रैल 2012

निजी स्कूलों के लिए क्या हो मानदण्ड

प्रदेश के शिक्षामंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने निजी स्कूलों की फीस वृद्धि नियंत्रण पर गैरजिम्मेदराना बयान देकर प्रदेश के अभिभावकों को उद्वेलित कर दिया है। निजी स्कूलों के खिलाफ जगह-जगह धरना-प्रदर्शन हो रहा है और रैलियां निकाली जा रही हैं। मंत्री महोदय, आखिर इस तरह का बयान देकर, किस तरफ इशारा कर रहे हैं? सरकार में बैठे हमारे हुक्मरान क्या कभी कोई बात कहने से पहले यह सोचते हैं कि उसके क्या निहितार्थ हो सकते हैं? वे उन स्कूलों में बच्चों को पढ़ाने की बात कह रहे हैं, जहां न तो गुणवत्तापूर्ण मानकों के अनुरूप शिक्षक हैं, न ढांचागत संरचना। भारतीय संविधान हर बच्चे को शिक्षा का मौलिक अधिकार देता है, फिर भी भारत में अनपढ़ों की संख्या सबसे अधिक है, 28 करोड़। शिक्षा का अधिकार कानून (आरटीई) बने दो साल हो चुके हैं, लेकिन प्रदेश के 95 फीसदी स्कूलों में आरटीई के मानकों के अनुरूप ढांचागत संरचना नहीं है। हर 10 में से एक में पेयजल सुविधाओं का अभाव है। 40 फीसदी स्कूलों में शौचालय नहीं हैं। अन्य 40 फीसदी में बालिकाओं के लिए अलग से शौचालय की व्यवस्था नहीं है। 40 फीसदी स्कूलों में बिजली होने का दावा किया जाता है, लेकिन सिर्फ 10 में ही बल्ब जलता है। यह रिपोर्ट अभी दो दिन पहले 'राइट टू एजूकेशन फोरमÓ ने जारी की है, जो 10 हजार गैर सरकारी संगठनों का समूह है। इसके पहले 'प्रथमÓ जैसे संगठन ऐसी बातें उजागर करते रहे हैं, जो परेशान करने वाली हैं। मसलन - कुछ स्कूलों में एक तिहाई ऐसे हैं जहां केवल एक या दो शिक्षक ही हैं। एक ही कमरे में चार कक्षाएं चलती हैं। पांचवीं उत्तीर्ण 40 फीसदी छात्रों को अक्षर ज्ञान तक नहीं होता। यही हाल गुरुजनों का है। ज्यादातर साधारण गणित की भी समझ नहीं रखते। 64 फीसदी शिक्षक एक अनुच्छेद को पढऩे के बाद उसका एक सटीक शीर्षक बता पाने की स्थिति में नहीं है। सोचिए, जो खुद किसी चीज में सिद्धहस्त नहीं है, वह भला आपके बच्चे को कैसे पढ़ा सकता है? बच्चों के शैक्षिक भविष्य में दिलचस्पी रखने वाले आखिर कितने ऐसे लोग हैं, जो ऐसे शिक्षकों और स्कूलों को यह जिम्मेदारी सौंपना चाहेंगे, जो उनके बच्चों का भविष्य गढ़ेंगे। आज प्रदेश का कौन सा मंत्री, विधायक, सांसद, आईएस, पीसीएस या कोई भी अन्य बड़ा अधिकारी अपने बच्चे को सरकारी प्राइमरी स्कूल में पढ़ा रहा है? पता कीजिए, खुद शिक्षामंत्री बृजमोहन अग्रवाल के बच्चे या नाते रिश्तेदार किस सरकारी स्कूल में पढ़ रहे हैं? सच्चाई यह है कि आज के सरकारी स्कूल बच्चों को सिर्फ साक्षर बना रहे हैं, उन्हें शिक्षित नहीं कर रहे हैं। वास्तव में शिक्षा और साक्षरता दोनों अलग-अलग चीजें हैं। शायद इसीलिए वे अभिभावक जो अपने बच्चों को शिक्षित करने चाहते हैं, वे निजी स्कूलों में जाने के लिए विवश हैं। उनकी इसी मजबूरी का फायदा निजी स्कूल उठा रहे हैं।
अब आइए असल मुद्दे पर। आखिर क्या वजह है कि सरकार से सस्ती दर पर जमीन लेकर स्कूल बनाने वाला प्रबंधन निम्न आयवर्ग के बच्चों को दाखिला देने में ना-नुकुर करता है। प्राइवेट स्कूलों को प्रशासन का डर नहीं है, इसीलिए नामांकन के समय ही कमजोर तबके के बच्चों के साथ भेदभाव किया जाता है। बिना किसी पूर्व जानकारी के हर साल फीस बढ़ा दी जाती है। कई बार तो सत्र के बीच में भी दो-तीन बार बढ़ोतरी की जाती है। बिल्डिंग फीस, सिक्योरिटी डिपॉजिट, एक्सट्रा कलकुर्लर एक्टीविटिज, शूटिंग, घुड़सवारी, स्वीमिंग फीस और न जाने किन-किन मदों में रकम वसूली का खेल एक बार शुरू होने के बाद बंद होने का नाम नहीं लेता। मंथली फीस के अलावा हर माह बच्चों की डायरी में एक नोट लिखा मिलता है। इस फंक्शन के लिए 500 रुपए भेज दीजिए। कहने को तो यह स्वैच्छिक होता है, अभिभावक चाहें तो फीस भर दें, न भरना चाहें तो उस फंक्शन के दिन बच्चे को स्कूल न भेजें। लेकिन, ऐसा करने से बच्चों में इंफियारटी कॉम्प्लेक्स विकसित होता है। कोई भी अभिभावक एक या दो बार ऐसा कर सकता है, लेकिन सालभर में स्कूल में 25 से 50 फंक्शन होते हैं। हर बार ऐसा कर पालक अपने पैसे नहीं बचा सकता। इसी तरह हर तीसरे महीने में पेट्रोल-डीजल के दामों में वृद्धि के नाम पर स्कूल बस की फीस बढ़ जाती है। कई स्कूल तो किताब-कापी और यूनीफार्म की दुकानें खोल बैठे हैं। कुल मिलाकर शिक्षा की बढ़ती कीमतों ने अभिभावकों की कमर तोड़ दी है। 80 से 85 फीसदी मां-बाप अपनी इनहैंड इनकम का 60 से 70 फीसदी से ज्यादा हिस्सा अपने बच्चों की शिक्षा पर खर्च कर रहे हैं। बावजूद इसके स्कूलों की मनमानी का कोई रोक नहीं है।
सवाल यह कि आखिर इतनी परेशानियों के बाद वो कौन सी मजबूरी है जो बृजमोहन अग्रवाल को निजी स्कूलों पर लगाम कसने से रोकती है। दिल्ली, मुम्बई, ओडिशा, पंजाब व हरियाणा उच्च न्यायालयों ने पैरेन्ट्स एसोसिएशन के शिकायतों पर कई अहम निर्णय दिए हैं। जिनमें निजी स्कूलों से फीस वृद्धि के औचित्य पर सवाल उठाया गया है। इन न्यायालयों ने निजी स्कूलों से खर्च का ब्यौरा मांगने और फीस के स्लैब तय करने के निर्देश दिए हैं। इस वजह से इन राज्यों में छत्तीसगढ़ की तुलना में कम लूट है। आखिर इन निर्देशों को अमल में लाकर छत्तीसगढ़ सरकार भी निजी स्कूलों पर लगाम क्यों नहीं कस सकती। तमिलनाडु सरकार ने तो निजी स्कूलों की फीस पर नियंत्रण के लिए 'स्कूल रेगुलेशन ऑफ कलेक्शन ऑफ फी रूल्सÓ बनाया है। इसी तरह दिल्ली सरकार ने कोर्ट के निर्देश पर फीस वृद्धि के पांच स्लैब तय किए हैं। इसके मुताबिक अधिकतम 100 से 500 रुपए के बीच ही हर साल फीस में बढ़ोतरी की जा सकती है। ऑल इंडिया पैरेन्ट्स एसोसिएशन इस बात के लिए प्रयासरत है कि इंजीनियरिंग मैनेजमेंट्स और मेडिकल कॉलेजों की तरह ही निजी स्कूलों की फीस के लिए फीस नियमन समिति हर प्रदेश गठित करें। इसी मांग को लेकर रायपुर के 'छात्र-पालक संघ के पदाधिकारी शिक्षामंत्री से मिलने गए थे। लेकिन, मंत्री महोदय, अन्य राज्यों से सीख न लेकर अपने हाथ खड़े कर निजी स्कूलों को लूटने की खुली छूट दे दी। बहरहाल इसके पीछे उनकी क्या मजबूरी है, यह वही जाने। लेकिन, यदि वे प्रदेश में आरटीई कानूनों का ही सही ढंग से क्रियान्वन करा सकें तो कुछ अभिभावकों को ही सही, अपने बच्चों को सही शिक्षा दिलाने का सपना पूरा हो सकता है। और वे अपने पसीने की कमाई को लुटने से बचा सकते हैं।

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