मंगलवार, 10 अप्रैल 2012

निजी स्कूलों के लिए क्या हो मानदण्ड

प्रदेश के शिक्षामंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने निजी स्कूलों की फीस वृद्धि नियंत्रण पर गैरजिम्मेदराना बयान देकर प्रदेश के अभिभावकों को उद्वेलित कर दिया है। निजी स्कूलों के खिलाफ जगह-जगह धरना-प्रदर्शन हो रहा है और रैलियां निकाली जा रही हैं। मंत्री महोदय, आखिर इस तरह का बयान देकर, किस तरफ इशारा कर रहे हैं? सरकार में बैठे हमारे हुक्मरान क्या कभी कोई बात कहने से पहले यह सोचते हैं कि उसके क्या निहितार्थ हो सकते हैं? वे उन स्कूलों में बच्चों को पढ़ाने की बात कह रहे हैं, जहां न तो गुणवत्तापूर्ण मानकों के अनुरूप शिक्षक हैं, न ढांचागत संरचना। भारतीय संविधान हर बच्चे को शिक्षा का मौलिक अधिकार देता है, फिर भी भारत में अनपढ़ों की संख्या सबसे अधिक है, 28 करोड़। शिक्षा का अधिकार कानून (आरटीई) बने दो साल हो चुके हैं, लेकिन प्रदेश के 95 फीसदी स्कूलों में आरटीई के मानकों के अनुरूप ढांचागत संरचना नहीं है। हर 10 में से एक में पेयजल सुविधाओं का अभाव है। 40 फीसदी स्कूलों में शौचालय नहीं हैं। अन्य 40 फीसदी में बालिकाओं के लिए अलग से शौचालय की व्यवस्था नहीं है। 40 फीसदी स्कूलों में बिजली होने का दावा किया जाता है, लेकिन सिर्फ 10 में ही बल्ब जलता है। यह रिपोर्ट अभी दो दिन पहले 'राइट टू एजूकेशन फोरमÓ ने जारी की है, जो 10 हजार गैर सरकारी संगठनों का समूह है। इसके पहले 'प्रथमÓ जैसे संगठन ऐसी बातें उजागर करते रहे हैं, जो परेशान करने वाली हैं। मसलन - कुछ स्कूलों में एक तिहाई ऐसे हैं जहां केवल एक या दो शिक्षक ही हैं। एक ही कमरे में चार कक्षाएं चलती हैं। पांचवीं उत्तीर्ण 40 फीसदी छात्रों को अक्षर ज्ञान तक नहीं होता। यही हाल गुरुजनों का है। ज्यादातर साधारण गणित की भी समझ नहीं रखते। 64 फीसदी शिक्षक एक अनुच्छेद को पढऩे के बाद उसका एक सटीक शीर्षक बता पाने की स्थिति में नहीं है। सोचिए, जो खुद किसी चीज में सिद्धहस्त नहीं है, वह भला आपके बच्चे को कैसे पढ़ा सकता है? बच्चों के शैक्षिक भविष्य में दिलचस्पी रखने वाले आखिर कितने ऐसे लोग हैं, जो ऐसे शिक्षकों और स्कूलों को यह जिम्मेदारी सौंपना चाहेंगे, जो उनके बच्चों का भविष्य गढ़ेंगे। आज प्रदेश का कौन सा मंत्री, विधायक, सांसद, आईएस, पीसीएस या कोई भी अन्य बड़ा अधिकारी अपने बच्चे को सरकारी प्राइमरी स्कूल में पढ़ा रहा है? पता कीजिए, खुद शिक्षामंत्री बृजमोहन अग्रवाल के बच्चे या नाते रिश्तेदार किस सरकारी स्कूल में पढ़ रहे हैं? सच्चाई यह है कि आज के सरकारी स्कूल बच्चों को सिर्फ साक्षर बना रहे हैं, उन्हें शिक्षित नहीं कर रहे हैं। वास्तव में शिक्षा और साक्षरता दोनों अलग-अलग चीजें हैं। शायद इसीलिए वे अभिभावक जो अपने बच्चों को शिक्षित करने चाहते हैं, वे निजी स्कूलों में जाने के लिए विवश हैं। उनकी इसी मजबूरी का फायदा निजी स्कूल उठा रहे हैं।
अब आइए असल मुद्दे पर। आखिर क्या वजह है कि सरकार से सस्ती दर पर जमीन लेकर स्कूल बनाने वाला प्रबंधन निम्न आयवर्ग के बच्चों को दाखिला देने में ना-नुकुर करता है। प्राइवेट स्कूलों को प्रशासन का डर नहीं है, इसीलिए नामांकन के समय ही कमजोर तबके के बच्चों के साथ भेदभाव किया जाता है। बिना किसी पूर्व जानकारी के हर साल फीस बढ़ा दी जाती है। कई बार तो सत्र के बीच में भी दो-तीन बार बढ़ोतरी की जाती है। बिल्डिंग फीस, सिक्योरिटी डिपॉजिट, एक्सट्रा कलकुर्लर एक्टीविटिज, शूटिंग, घुड़सवारी, स्वीमिंग फीस और न जाने किन-किन मदों में रकम वसूली का खेल एक बार शुरू होने के बाद बंद होने का नाम नहीं लेता। मंथली फीस के अलावा हर माह बच्चों की डायरी में एक नोट लिखा मिलता है। इस फंक्शन के लिए 500 रुपए भेज दीजिए। कहने को तो यह स्वैच्छिक होता है, अभिभावक चाहें तो फीस भर दें, न भरना चाहें तो उस फंक्शन के दिन बच्चे को स्कूल न भेजें। लेकिन, ऐसा करने से बच्चों में इंफियारटी कॉम्प्लेक्स विकसित होता है। कोई भी अभिभावक एक या दो बार ऐसा कर सकता है, लेकिन सालभर में स्कूल में 25 से 50 फंक्शन होते हैं। हर बार ऐसा कर पालक अपने पैसे नहीं बचा सकता। इसी तरह हर तीसरे महीने में पेट्रोल-डीजल के दामों में वृद्धि के नाम पर स्कूल बस की फीस बढ़ जाती है। कई स्कूल तो किताब-कापी और यूनीफार्म की दुकानें खोल बैठे हैं। कुल मिलाकर शिक्षा की बढ़ती कीमतों ने अभिभावकों की कमर तोड़ दी है। 80 से 85 फीसदी मां-बाप अपनी इनहैंड इनकम का 60 से 70 फीसदी से ज्यादा हिस्सा अपने बच्चों की शिक्षा पर खर्च कर रहे हैं। बावजूद इसके स्कूलों की मनमानी का कोई रोक नहीं है।
सवाल यह कि आखिर इतनी परेशानियों के बाद वो कौन सी मजबूरी है जो बृजमोहन अग्रवाल को निजी स्कूलों पर लगाम कसने से रोकती है। दिल्ली, मुम्बई, ओडिशा, पंजाब व हरियाणा उच्च न्यायालयों ने पैरेन्ट्स एसोसिएशन के शिकायतों पर कई अहम निर्णय दिए हैं। जिनमें निजी स्कूलों से फीस वृद्धि के औचित्य पर सवाल उठाया गया है। इन न्यायालयों ने निजी स्कूलों से खर्च का ब्यौरा मांगने और फीस के स्लैब तय करने के निर्देश दिए हैं। इस वजह से इन राज्यों में छत्तीसगढ़ की तुलना में कम लूट है। आखिर इन निर्देशों को अमल में लाकर छत्तीसगढ़ सरकार भी निजी स्कूलों पर लगाम क्यों नहीं कस सकती। तमिलनाडु सरकार ने तो निजी स्कूलों की फीस पर नियंत्रण के लिए 'स्कूल रेगुलेशन ऑफ कलेक्शन ऑफ फी रूल्सÓ बनाया है। इसी तरह दिल्ली सरकार ने कोर्ट के निर्देश पर फीस वृद्धि के पांच स्लैब तय किए हैं। इसके मुताबिक अधिकतम 100 से 500 रुपए के बीच ही हर साल फीस में बढ़ोतरी की जा सकती है। ऑल इंडिया पैरेन्ट्स एसोसिएशन इस बात के लिए प्रयासरत है कि इंजीनियरिंग मैनेजमेंट्स और मेडिकल कॉलेजों की तरह ही निजी स्कूलों की फीस के लिए फीस नियमन समिति हर प्रदेश गठित करें। इसी मांग को लेकर रायपुर के 'छात्र-पालक संघ के पदाधिकारी शिक्षामंत्री से मिलने गए थे। लेकिन, मंत्री महोदय, अन्य राज्यों से सीख न लेकर अपने हाथ खड़े कर निजी स्कूलों को लूटने की खुली छूट दे दी। बहरहाल इसके पीछे उनकी क्या मजबूरी है, यह वही जाने। लेकिन, यदि वे प्रदेश में आरटीई कानूनों का ही सही ढंग से क्रियान्वन करा सकें तो कुछ अभिभावकों को ही सही, अपने बच्चों को सही शिक्षा दिलाने का सपना पूरा हो सकता है। और वे अपने पसीने की कमाई को लुटने से बचा सकते हैं।

बुधवार, 15 फ़रवरी 2012

कब तक छले जाएंगे किसान

छत्तीसगढ़ की खुशहाली खेती से है, लेकिन यहां के अन्नदाता बेहाल हैं। वेलेंटाइन के दिन राजधानी रायपुर में सैकड़ों किसानों का फूलगोभी और शिमला मिर्च के साथ अनूठा प्रदर्शन यह बताने के लिए पर्याप्त है कि राज्य के किसानों की हालत कैसी है। हाड़तोड़ मेहनत के बाद भी इनके श्रम का मूल्य नहीं मिल पा रहा है। कभी प्रकृति तो कभी सरकार, किसानों के साथ छल करती रहती है।  पिछले साल प्रदेश के १३ जिलों के हजारों किसानों ने हाईब्रिड बीज मामले में धोखा खाया। २०६ टन हाईब्रिड  बीज राष्ट्रीय बीज विकास निगम से खरीदा गया था। इसे महंगे दामों पर यह कहकर किसानों को बेचा गया कि इस बीज से प्रति हेक्टेयर ६० क्ंिवटल धान का उत्पादन होगा, लेकिन पैदावार प्रति हेक्टेयर ३४ क्ंिवटल से भी कम हुई। इतनी कम उपज की वजह से किसानों की लागत भी नहीं निकल पाई। वे सालभर से मुआवजे की मांग कर रहे हैं। मामला केन्द्र राज्य के बीच अटका है। किसान इस संकट से उबर भी नहीं पाए थे कि नवम्बर-दिसम्बर माह में हुई अतिवृष्टि ने इनकी कमर फिर से तोड़ दी। बेमौसम बारिश से सैकड़ों एकड़ खेत में खड़ी धान की फसल बर्बाद हो गई। खलिहानों में रखा धान भी भीग गया। इससे उसकी गुणवत्ता प्रभावित हुई। यह खराब धान अभी तक किसानों के घर पड़ा है, इसका कोई खरीदार नहीं मिल रहा। धान की खेती के लिए किसानों ने कर्ज लेकर बीज और खाद खरीदा था। अब इसकी भरपाई कैसे होगी, अन्नदाताओं को यह चिंता सता रही है। बहरहाल, किसानों ने हिम्मत नहीं हारी। जी-जान से सब्जी की खेती की। मेहनत रंग लाई और सब्जी की बंपर पैदावार हुई। इससे आस बंधी थी कि सब्जियों की बिक्री से सिर से कर्ज का बोझ उतर जाएगा। लेकिन, यहां भी धोखा हुआ। फूलगोभी, शिमला मिर्च, टमाटर और अन्य हरी सब्जियों को जब बाजार में बेचने की बारी आई तो इनके दाम अचानक गिर गए। दो हफ्ते पहले एक फूलगोभी दस-बारह रुपए में बिक रही थी। अब इसे एक-दो रुपए में भी कोई नहीं पूछ रहा। आढ़तिए टमाटर का भाव चार रुपए किलो भी नहीं लगा रहे। भिंडी, लौकी और मूली-गाजर के भी भाव नहीं लग रहे।  किसान हैरान और परेशान हैं। सिंचाई, खाद, बीज और जुताई की लागत कैसे निकले। एक ही साल में दो- दो फसली कर्ज लद गया। इसकी चिंता में रात-दिन की नींद गायब है। 
महाराष्ट्र के एग्रीकल्चर प्रोड्यूसर मार्केट कमेटी की तरह छत्तीसगढ़ में किसानों का कोई सशक्त संगठन भी नहीं है जो सरकार को यह मजबूर करे कि वह फसलों के नुकसान की भरपाई करे या फिर कर्ज माफ हों। न ही, यहां किसानों के लिए आंध्र प्रदेश की तरह ग्रीन हाउस और कोल्ड स्टोरेज हैं , जहां हरी सब्जियों को संरक्षित रखा जा सके। राज्य में हरी सब्जियों की पैकिंग और मार्केटिंग की भी कोई व्यवस्था नहीं है कि किसान हिमाचल प्रदेश की तरह जरूरत से ज्यादा उत्पाद को अन्य राज्यों को आसानी से बेच सकें। कहने के लिए राज्य में कृषि विपणन बोर्ड है। लेकिन, यह किसानों का कितना हितैषी है, जगजाहिर है। बोर्ड को किसानों की नहीं विधायकों की चिंता है। इसीलिए वह अन्नदाता की कमाई के पैसों से माननीयों को वाशिंग मशीन और अन्य उपहार बांट रहा है। ऐसे में बेचारे किसान या तो औने-पौने दामोंं  अपने खून-पसीने की कमाई को बेचें या फिर खेतों में खड़ी फसल को सडऩे के लिए छोड़ दें। इन हालातों में किसानों के पास के मरने के अलावा कोई और विकल्प नहीं है। सरकार की उपेक्षा की वजह से ही पिछले एक साल में १८०२ किसानों ने आत्महत्या कर ली। सरकार अब भी नहीं चेती तो न जाने कितने और किसान मरने को मजबूर होंगे। सरकार किसानों की खुशहाली चाहती है तो उसे न केवल कृषि पर ज्यादा ध्यान देना होगा बल्कि, केंद्र सरकार की तर्ज पर कर्ज माफी योजना लागू करनी होगी। तभी किसानों की हालत सुधरेगी।

चाउर वाले बाबा के सामने चुनौतियां

पिछले सात-आठ महीनों से विश्व समुदाय खाद्य सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे पर गंभीरता से मंथन कर रहा है। दुनिया के गरीब देश धनी देशों से अपील कर रहे हैं कि वे गरीबों की भोजन व्यवस्था पर ध्यान दें। अभी हाल ही में दुनिया के अल्प विकसित देशों के नई दिल्ली में हुए सम्मेलन में भी गरीब देशों के लिए जारी घोषणा -पत्र मेंं खाद्य सुरक्षा का प्रमुखता से जिक्र किया गया है। उधर, केन्द्र सरकार भी खाद्य सुरक्षा विधेयक लाने की तैयारी में है, ताकि देश के गरीबों को भरपेट भोजन मिल सके। सब कुछ ठीक रहा तो जल्द ही संप्रग सरकार इस बिल को संसद में पेश करेगी। विधेयक के कानून बन जाने के बाद देश की सत्तर प्रतिशत जनता को सस्ते दाम पर अनाज मिल सकेगा।
इन कवायदों के बीच छत्तीसगढ़ सरकार ने कुपोषण से मुक्ति के लिए जो पहल की है, वह काबिले तारीफ है। प्रदेश के36 लाख गरीब परिवारों को हर माह एकरुपए किलो चावल बंटवाने वाले 'चाउर वाले बाबाÓ अब आदिवासियों और गरीबों को सस्ती दर पर अगले महीने से देशी चना बंटवाने जा रहे हैं। मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह की योजना सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के तहत प्रदेश की राशन दुकानों से गरीबी रेखा के नीचे जीवन-यापन करने वाले हर परिवार को पांच रुपए में एक किलो चना देने की है। सरकार खुले बाजार से ३० रुपए प्रति किलो के हिसाब से चना खरीदेगी और इसमें अपनी ओर से २५ रुपए प्रति किलो की सब्सिडी देगी। यह योजना फिलहाल राज्य के सबसे पिछड़े इलाके बस्तर संभाग में लागू होने जा रही है। इससे क्षेत्र के लगभग पांच लाख परिवारों को लाभ मिलेगा। उधर, केंद्र सरकार भी गरीबी रेखा के नीचे जीवन-यापन करने वाले बीपीएल परिवारों को हर महीने ३५ किलो अनाज अलग से बांट रही है। इसके  तहत गेहंू ४.१५ रुपए प्रति किलो के भाव से मिलता है। जबकि, राज्य सरकार बीपीएल कार्डधारकों को प्रतिमाह एक रुपए की दर से 35 किलो चावल दे रही है। यह अच्छी बात है। लेकिन, इन सहूलियतों के बाद भी भुखमरी और गरीबी कम नहीं हो रही। भूख से मरने वालों का सिलसिला जारी है और राशन के गेहू़ं, चावल में भी लूटखसोट बढ़ती ही जा रही है। वोट बैंक और सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के चक्कर में सरकारें चावल, चना तो बंटवा देती हैं, लेकिन सब्सिडी का पूरा खाद्यान्न सही तरीके से गरीबों को नहीं मिलता। जिन्हें सब्सिडी का गेहंू, चीनी, चावल और केरोसिन चाहिए उनके पास राशन कार्ड ही नहीं हैं। यदि राशन कार्ड है तो राशन की दुकानें ही नहीं खुलतीं। गरीबों के राशन उठाने से पहले ही शक्कर, केरोसिन धन्नासेठों के गोदामों में चला जाता है। इस तरफ सरकारों का ध्यान नहीं है। राज्य में चावल वितरण में भारी भ्रष्टाचार हो रहा है। बताया जाता है कि पिछले साल अकेले बस्तर संभाग में ही सब्सिडी का 50 करोड़ रुपए का चावल राशन दुकानों को भेजा गया, लेकिन यह चावल धमतरी और जगदलपुर के राइस मिलों में खप गया। यह स्थिति केवल छत्तीसगढ़ की है, ऐसा नहीं है। देशभर में सार्वजनिक वितरण प्रणाली में भ्रष्टाचार हावी है। इसका खुलासा उच्चतम न्यायालय द्वारा नियुक्त सतर्कता समिति भी कर चुकी है। केंद्र सरकार सार्वजनिक वितरण प्रणाली में सब्सिडी पर सालाना 28000 करोड़ रुपए से ज्यादा की राशि खर्च करती है। पर वास्तव में यह पैसा कुछ अनुचित लोगों की जेब में चला जाता है। यही हाल राज्य सरकारों द्वारा दी जाने वाली सब्सिडी का भी है। बहरहाल, छत्तीसगढ़ की सार्वजनिक वितरण प्रणाली देशभर में एक प्रेरणादायक मिसाल के रूप में देखी जा रही है। ऐसे में रमन सरकार के लिए यह चुनौती है कि वह सब्सिडी के राशन को बिचौलियों के हाथों से बचाकर वास्तविक गरीबों तक पहुंचाने की व्यवस्था करें। गरीबी से जूझ रही जनता को तभी खाद्य सुरक्षा  सुनिश्चित हो सकेगी। यदि ऐसा हुआ तो चाउर वाले बाबा को चना-चबैना वाले बाबा की उपाधि मिलते देर न लगेगी।

रविवार, 12 फ़रवरी 2012

वरदान ही अभिशाप

छत्तीसगढ़ के औद्योगिक शहर कोरबा, रायगढ़ व रायपुर के लाखों लोग परेशान हैं। इनमें से हजारों लोगों को आंखों में जलन, कफ, सांस लेने की बीमारी और खांसी की शिकायत है। मरीजों में बूढ़े, जवान और बच्चे सभी शामिल हैं। ये सब औद्योगिक विकास की कीमत चुका रहे हैं। वातावरण में घुली फ्लाई एश और बिजलीघरों व इस्पात संयंत्रों की चिमनियों से निकलता विषाक्त काला धुंआ संयंत्रों के आसपास के लोगों को असमय बूढ़ा और बीमार बना रहा है। किसानों का शिकायत है कि धुएं के कारण कृषि ठप हो रही है। जब से उद्योग लगे हैं, सब कुछ काला हो रहा है। खेत काले हैं। उसमें धान उगाएं तो वह भी काला ही दिखता है। घरों की खुली छतों पर बैठना मुश्किल है। सबसे ज्यादा कोरबा के धनराश, घोरापाठ, लोतलोता, छुरीखुर्द व झोरा गांव के लोगों की हालत खराब है। यहां पिछले चार-पांच दिनों से राखड़ की बारिश हो रही है। राख के गुबार से धुंध छाई है। घरों में भी जहरीला धुंआ भर गया है। ग्रामीण इसकी शिकायत कर थक चुके हैं। दुनिया भर में भले ही ग्लोबल वार्मिंग पर चिंता जताई जा रही हो लेकिन, राज्य सरकार के लिए यह कोई मुद्दा ही नहीं है। वायु प्रदूषण में कोरबा देश में नित नए रिकार्ड बना रहा है। लेकिन, राज्य के अधिकतर उद्योग धुएं में कोयले और लोहे के कण को रोकने के लिए लगाई जाने वाली मशीन इलेक्ट्रोस्टैटिक प्रेसिपिटेटर (ईएसपी) का उपयोग नहीं कर रहे हैं। लगभग सभी उद्योगों में शाम सात बजे के बाद सुबह छह -सात बजे तक ईएसपी चलता ही नहीं। सूबे का पर्यावरण संरक्षण मंडल सब कुछ जान कर भी अनजान है। अफसर और जनप्रतिनिधि उद्योगपतियों से मैनेज हैं। इसलिए प्रदूषण के शोर में गरीबों की आवाज गुम है। पूरे देश में उद्योगों के खिलाफ जितने मुकदमें नहीं हुए उससे ज्यादा अकेले छत्तीसगढ़ में दायर किए गए हैं। इसमें भी सबसे ज्यादा पर्यावरण मानकों के उल्लंघन के हैं। फिर भी सरकार बेफ्रिक है।

अकेले कोरबा शहर में इस समय साढ़े चार हजार से ज्यादा मेगावाट बिजली का उत्पादन हो रहा है। एनटीपीसी में ही करीब २६ सौ मेगावाट बिजली पैदा होती है। इसके लिए हर दिन हजारों टन कोयला जलता है। इस कोयले से काले धुएं के अलावा सफेद राख या राखड़ भी निकलती है। सिर्फ एनटीपीसी ही करीब बीस हजार मीट्रिक टन राख उत्सर्जित करती है। इस राख को इक त्र करने के लिए बड़े बांध बनाए गए हैं। एनटीपीसी संयंत्र ने धनरास में एक हजार एकड़ का राखड़ बांध बनाया है। प्रबंधन का दावा था कि यह पच्चीस साल में भरेगा। लेकिन, यह आधे समय में ही भर गया। अब तक चार बार बांध की ऊंचाई बढ़ाई जा चुकी है। आज बांध धरातल से करीब ४० मीटर ऊपर हो गया है। राख ढकी रखी रहे, इसलिए प्रबंधन संग्रहीत राखड़ को हर रोज गीला करता है। लेकिन, जैसे-जैसे धूप तेजी होती है और गरमी बढ़ती है अंधड़ चलने पर राख उड़कर आबादी वाले इलाकों में गिरती है। पूरा कोरबा शहर इस राख से ढंक जाता है। यही नहीं राख का रिसाव हसदेव नदीं में भी हो रहा है। इस राख में हेवी मेटल्स हैं और ये धीरे-धीरे जमीन के नीचे पानी में जा रहे हैं। इस प्रदूषण से विकलांग बच्चा पैदा होने से लेकर गर्भपात तक कई बीमारियां हो रही हैं। लेकिन एनटीपीसी प्रबंधन को इसकी चिंता नहीं। छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण मंडल राख के नियंत्रण के संबंध में एनटीपीसी को आए दिन चेतावनी देता है। ग्रामीण शोर मचाते हैं तो आसपास के गांवों को अन्यत्र बसाने के अलावा नए राखड़ बांध के निर्माण के प्रस्ताव की फाइल की धूल एक बार फिर साफ की जाती है। राखड़ बांध पर ज्यादा पानी की बौछार की जाती है। उधर, राखड़ की धूल जमती है। इधर, फिर फाइलों पर फिर धूल की परत मोटी होने लगती है। यह सिलसिला कई वर्षों से जारी है। एनटीपीसी ने अब तक क्षेत्र में एक हजार एकड़ से ज्यादा बंजर जमीन का टुकड़ा तैयार कर दिया है। हवा में जहरीली गैसें और ठोस कणों-जिसमें कोयला, लोहा और धूल शामिल हैं, को घोल दिया है। लगता है उसे तो उस दिन का इंतजार है जब इस जहरीली धूल की परत लोगों के हलक पर पूरी तरह जम जाएगी और वे शोर मचाना बंद कर देंगे। विकास की कीमत किसी न किसी को तो चुकानी ही होगी। गरीब, अनपढ़ ग्रामीणों और आदिवासियों की नियति शायद यही है। राज्य सरकार की चुप्पी और पर्यावरण विभाग की घालमेल की नीति से तो यही परिलक्षित हो रहा है।

शुक्रवार, 20 जनवरी 2012

गुरुजन भी रिश्वतखोर

भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी के लिए बदनाम प्रदेश में गुरुजन भी रिश्वतखोरी में पीछे नहीं है। इसका ताजा उदाहरण हैं आरंग के ग्राम चपरीद के प्रभारी प्रधानपाठक। कहने के लिए प्रदेश में शिक्षा का अधिकार कानून लागू है। इसके तहत बच्चों को नि:शुल्क शिक्षा देनी है। लेकिन, विकास के नाम पर स्कूल में बच्चों से उगाही की जा रही थी। इसकी सजा हेडमास्टर को मिली। उसे निलंबित कर दिया गया। करनी की सजा मिलनी ही चाहिए, इसलिए यह कार्रवाई स्वागतयोग्य है। बशर्ते की सरकार की नीति, नीयत और कार्रवाई में फर्क न हो। क्योंकि, बड़े नेताओं व उच्चाधिकारियों को बचाने के लिए छुटभैय्ये नेताओं और छोटे कर्मियों को बलि का बकरा बनाना जगजाहिर है। प्रधानपाठक द्वारा शाला विकास शुल्क के नाम पर राशि वसूलने की घटना ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि प्रदेश में शिक्षा के मंदिरों में भी भ्रष्टाचार घुन तेजी से लगता जा रहा है। यहां शिक्षा के अधिकार अधिनियम की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। बहरहाल, सरकार के लिए  कानून बनाने से ज्यादा महत्वपूर्ण कानून का पालन करवाना है। ऐसा नहीं होता तो शिक्षा के अधिकार  अधिनियम 2009 में लागू होने के बावजूद हेडमास्टर धन की उगाही न करता। सवाल यह है कि आरटीई का पालन कराने के लिए सरकार के नुमाइंदे और नौकरशाह सक्रिय क्यों नहीं हैं? वे प्रत्येक स्कूल में जाकर बच्चों और अभिभावकों से वस्तुस्थिति की जानकारी क्यों नहीं लेते? जब स्कूलों पर सरकार की निगरानी नहीं होगी तो संस्था प्रमुख मनमानी तो करेंगे ही। प्रदेश के अधिकतर सरकारी और निजी स्कूलों में अवैध वसूली तो सर्वविदित है।
बहरहाल, सरकार को स्कूलों में आरटीई एक्ट का पालन कराने के लिए और भ्रष्टाचार को रोकने के लिए न केवल समय-समय पर कड़े कदम उठाने होंगे, बल्कि सतत निगरानी भी रखनी होगी। क्योंकि, ईमानदार अध्यापक ही भविष्य की नींव रखता है। यदि वह रिश्वतखोरी में लिप्त होगा तो शिक्षण संस्थानों के हजारों छात्र-छात्राओं का भविष्य अंधकार में पड़ सकता है।

नीति नहीं नीयत जरूरी

जिस बात अंदेशा था आखिर वही हो रहा है। केंद्र सरकार ने जब बड़े जोर-शोर से शिक्षा का अधिकार कानून (आरटीई) लागू करने की घोषणा की थी,तब ऐसा लगा था मानों देश में एक नए युग का सूत्रपात होगा। अमीर-गरीब सभी के बच्चों को पढ़ाई का कानूनी हक मिलेगा। कहा गया कि नामी और बड़े स्कूलों में गरीबों के बच्चे बिना फीस के पढ़ेंगे। लेकिन, यह क्या। छत्तीसगढ़ राज्य के अधिकतर निजी स्कूलों को तो पता ही नहीं कि आरटीई क्या बला है। जिन्हें कानून के बारे में मालूम है वे खुद को कानून से ऊपर समझ रहे हैं। दरअसल, राज्य में आरटीई कानून के माखौल बनने की बड़ी वजह राज्य सरकार की दिलचस्पी न होना है। शुरुआत के कुछ माह तक तो आरटीई को लेकर खूब उत्साह देखने को मिला। इसके बाद जहां केंद्रीय मंत्रालय ने संसाधनों की कमी की दुहाई देनी शुरू कर दीं वहीं, राज्य सरकार अपनी असमर्थता सिद्ध करने में जुट गई। एक्ट के लागू होने के छह माह के भीतर राज्य को आदर्श नियम बनाकर इसकी अधिसूचना जारी करनी थी, विद्यालयों में स्कूल प्रबंध समिति का निर्माण किया जाना था। लेकिन, हकीकत यह है कि साल भर बाद भी सरकार ने स्कूल मैनेजमेंट कमेटी बनाने की जहमत नहीं उठायी। जबकि, इसी कमेटी को स्कूल जाने योग्य बच्चों की पहचान, उनका नामांकन और स्कूल में बच्चों के बने रहने की जिम्मेदारी निभानी थी। यही नहीं, स्कूल विकास योजना बनाने की कवायद भी अभी तक शुरू नहीं हुई है। प्रदेश में करीब १७ लाख बच्चे ऐसे हैं, जिनका भविष्य अप्रशिक्षित शिक्षकों के हवाले है। राज्य में पहली से बारहवीं तक के करीब ८८०८ स्कूल हैं। स्कूल शिक्षा विभाग के सेटअप के अनुसार इन स्कूलों में ६१ हजार से अधिक शिक्षक होने चाहिए। लेकिन, इनमें ज्यादातर शिक्षकों के पास बीएड-डीएड की डिग्री ही नहीं है। प्रदेश के निजी स्कूलों के साथ-साथ सरकारी स्कूलों में ट्रेंड टीचर्स की काफी कमी बनी हुई है। शासन के लाख प्रयास के बावजूद प्रदेश के सरकारी स्कूलों में शिक्षक प्रतिशत ६६.४६ ही है। निजी स्कूलों की स्थिति तो इससे भी ज्यादा खराब है। दो से तीन हजार रुपए देकर १२वीं और कॉलेज उत्तीर्ण विद्यार्थियों से अध्यापन कार्य कराया जा रहा है। इस पर सरकार का किसी भी प्रकार से नियंत्रण नहीं है। हालत यह है कि स्कूल शिक्षा विभाग अभी तक निजी स्कूलों के लिए न तो आदर्श आचार संहिता बना पाया है और न ही सरकारी स्कूलों के संचालन के लिए समितियों का गठन हो सका है। इसी वजह से निजी स्कूल मनमानी फीस बढ़ा रहे हैें। निजी स्कूल संचालकों की यह दलील कि बैठकों में आरटीई कानून के पालन की तो बात होती है। लेकिन इस संबंध में कोई परिपत्र न मिलना गंभीर चिंता की बात है। सभी को शिक्षा का हक मिले इसके लिए कानून की नहीं, बल्कि उचित वातावरण की भी जरूरत है । राज्य में अभी शिक्षा का अधिकार एक नारे से अधिक कुछ नहीं है। सभी को शिक्षा मिले, इसके लिए नीति नहीं नीयत की जरूरत है। राज्य का हर बच्चा स्कूल जाए इसके लिए सरकार को अपनी प्राथमिकता समझनी होगी। इसके लिए जनता को भी सचेत होना होगा तभी 'आओ पढ़ाएं, सबको बढ़ाएं का नारा साकार होगा।

कायराना हरकत

आमामोरा की पहाडिय़ों पर नक्सलियों के बारूदी विस्फोट में एएसपी समेत दस पुलिस जवानों का शहीद हो जाना दुखद घटना है। चिंता की बात यह है कि राजधानी रायपुर से महज १६० किमी दूर शाम सात बजे के करीब हुई इस वारदात की पुष्टि पुलिस देर तक नहीं कर पाई। राज्य के अधिकारी शहीदों की संख्या और घटना के बारे में कुछ भी बताने से बचते रहे। इससे यह जाहिर होता है कि प्रदेश सरकार नक्सल अभियान के प्रति कितनी गंभीर है। पिछले तीन-चार महीनों से सरकार को यह सूचनाएं मिल रही थीं कि नक्सली एकजुट हो रहे हैं और वे किसी बड़ी वारदात को अंजाम दे सकते हैं। फिर भी सरकार ने इस ओर गंभीरता नहीं दिखाई। केरल और आंध्र प्रदेश में सक्रिय नक्सली गुटों ने राजधानी और गरियाबंद के जंगलों में बैठकें कर लीं और हमारा खुफिया तंत्र सोता रहा।  जिस तरह सौ की संख्या में एकजुट नक्सलियों ने यह वारदात की इससे साफ है कि गरियाबंद के जंगलों में इनका संजाल फैल चुका है। हाल के महीनों में नक्सली वारदात बढऩे और सुरक्षा बलों के लगातार निशाना बनने से यह सवाल उठता है कि 'आपरेशन ग्रीन हंटÓ सुरक्षा बल चला रहे हैं या फिर नक्सली ? यह जानते हुए भी कि उड़ीसा की सीमा से लगा हुआ गरियाबंद का इलाका घने जंगलों और पहाडिय़ों से घिरा हुआ है, जवानों ने सुरक्षा की अनदेखी की। पुलिस के पास ऐसी खबरें थीं की नक्सलियों ने इलाके में अपना बड़ा बेस कैंप बना रखा है और तमाम क्षेत्रों में बारूदी सुरंगों का जाल बिछा रखा है। फिर भी केवल दस जवान इस खतरनाक इलाके में गश्त करने गए। जबकि, नक्सली अभियान के तहत इन इलाकों में बिना पर्याप्त बलों के नहीं जाया जाता है। हमारे जवानों से सुरक्षा में इस तरह की चूक कोई पहली बार नहीं हुई है। ऐसे में सवाल यह  है कि आखिर हमारे सुरक्षा बल नियमों की अनदेखी क्यों करते हैं। नक्सली तो कायर हैं ही। वे न केवल जवानों पर घात लगाकर हमला करते हैं बल्कि इस बार तो उन्होंने मानवता को शर्मशार करने वाले कृत्य को भी अंजाम दिया। हर मजहब में शव को सम्मान दिया जाता है। दुश्मन देश के सैनिकों के शव के साथ भी सेनाएं बुरा सलूक नहीं करतीं। लेकिन, सामाजिक सरोकारों की वकालत करने वाले नक्सलियों का न कोई धर्म है और न मजहब। शायद इसीलिए उन्होंने जाबांज सिपाहियों को गोलियों से मारने के बाद शवों पर कुल्हाडिय़ों से भी वार किया। शव कई जगह से कटे पाए गए। नक्सलियों के इस घिनौने कृत्य से जाहिर है कि वे बढ़ती सुरक्षा चौकसी से हताश हैं। इसलिए इस तरह की घटना को अंजाम दे रहे हैं। बहरहाल, नक्सली वारदात के बाद शहीद जवानों के प्रति सरकार के नुमाइंदों का संवेदना व्यक्त करने, सैन्य अफसरों का फोर्स व अन्य साजोसामान बढ़ाने की मांग करने और विपक्ष का सरकार को कोसने मात्र से ही 'नक्सल समस्या का समाधान नहीं निकलेगा। इस घटना के बाद सरकार के नुमाइंदों और नक्सलियों से निपटने के लिए रणनीति बनाने वाले पुलिस व सेना के अफसरों को सचेत हो जाना चाहिए कि नक्सलवाद की कोई विचारधारा नहीं रह गई है।लाल आंतक के खिलाफ अब हर स्तर पर  लडऩे की जरूरत है। साथ ही नक्सलवाद से निपटने में लगे राज्यों के पुलिस बल और सुरक्षाबलों में समन्वय बनाना होगा तभी खून के प्यासों के हौसलों को पस्त किया जा सकता है।

बाघिन की मौत पर स्यापा

बाघिन की निर्मम मौत पर अब स्यापा हो रहा है। कई वन अधिकारी तो छाती पीट-पीटकर रो रहे हैं। उन्हें पछतावा है, वे बेबस बाघिन को हजारों उन्मादियों की भीड़ से बचा न सके। कुछ वन्य जीव रक्षक इसलिए घडिय़ाली आंसू बहा रहे हैं कि जाल में फंसाने के बाद भी वे उसे सही-सलामत पकड़ न सके। संरक्षित जीवों की सूची 'शेड्यूल-ए में दर्ज बाघिन की हत्या कुछ वन अधिकारियों की मौजूदगी में हुई। उन पर मौत का ठीकरा न फूटे और नौकरी पर न बन आए, इसलिए वे भी रुआंसा चेहरा बनाए बयान देते फिर रहे हैं। कह रहे हैं, बाघिन गर्भवती थी, बीमार और घायल थी। सुबह से भागते-भागते थक चुकी थी। जान बचाने के लिए दुबककर झाड़ की ओट में बैठ गई। तभी उस पर कहर टूट पड़ा। हम बेबस थे, नहीं बचा पाए। अन्य मामलों की तरह बेजुबान जीव की मौत पर भी सियासत शुरू हो गई है। भाजपा और कांग्रेस इस मौत को अपने-अपने चश्मे से देख रहे हैं, तो राज्य सरकार के दो मंत्री आपस में ही भिड़ गए हैं। मौत की आंच उनके विभाग तक न आए इसलिए आरोपों-प्रत्यारोपों का दौर शुरू हो गया है। वनमंत्री विक्रम उसेंडी कह रहे हैं कि पुलिस महकमे ने अपेक्षित सहयोग दिया होता तो आक्रोशित ग्रामीणों से बाघिन को बचाया जा सकता था। गृहमंत्री ननकीराम कंवर का बयान आया है कि वन विभाग इस मामले में निष्क्रिय था। उसने पहले से कोई सुनियोजित तैयारी नहीं की। वन अमले को जब मालूम था कि ग्रामीणों में आक्रोश है तो पर्याप्त पुलिस बल की मांग की जानी चाहिए थी। वे सीधे तौर पर वन अफसरों को मौत के लिए जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। पछतावा तो धर्मभीरु ग्रामीण जनता को भी है। पखवारे भर पहले बाघिन को भगाने और पकडऩे के लिए 'तिहारÓ मनाने वाले ग्रामीण अब मां दुर्गा की सवारी बाघ की हत्या पर बड़े पाप की आशंका से सहमे हैं। बाघिन को पकडऩे के लिए यज्ञ की सलाह देने वाले तथाकथित पंडित अब बाघिन की हत्या को गोहत्या से भी बड़ा पाप बता रहे हैं। कह रहे हैं नवरात्रि से चंद दिनों पहले बाघिन की हत्या घोर अनिष्टकारी है। कुल मिलाकर एक और यज्ञ की तैयारी है अब। तैयारी तो वन विभाग भी कर रहा है ताकि, उसके भी 'पाप धुल सकें। घटना की फिल्म देखकर आरोपियों की पहचान की जाएगी। हत्या करने वालों पर केस दर्ज होगा।
लेकिन, सवाल यह है कि बाघिन की मौत के बाद यह स्यापा क्यों? जब महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ दोनों राज्यों के वन महकमे को यह पता था कि बाघिन आदमखोर हो गई है, आबादी के पास रहने की आदी हो चुकी है तो आखिर इसके प्रबंधन की योजना क्यों नहीं बनाई गई ? सवाल तो महाराष्ट्र के वन विभाग की कार्यप्रणाली पर भी उठ रहे हैं। यहां के राष्ट्रीय पार्क की यह तीन महीने तक मेहमान थी। पिंजरे में रहने की इसे आदत हो चुकी थी। वंशवृद्वि के लिए इसे रोका गया था। आखिर यह पिंजरे से आजाद कैसे हो गई। गढ़चिरौली के ब्रह्मपुरी क्षेत्र में अप्रैल माह में किसने इस पर कुल्हाड़ी से वार किया। फिर यह कैसे पकड़ी गई और इसका तीन महीने तक इलाज चला। चिरचारी डिपो में हुई पोस्टमार्टम रिपोर्ट बताती है कि उसकी आंख के ऊपर गहरे घाव के निशान अब भी नहीं भरे थे। तब उसमें पांच टांके लगे थे। घाव अभी तरह सूखा नहीं थे। पता चला है कि उसके पेट में ट्यूमर भी था। इतनी सारी जानकारियां बाघिन की मौत के २४ घंटे के भीतर ही उजागर करने वाले अधिकारी इस बात का खुलासा क्यों नहीं कर रहे हैं कि इलाज के दौरान बाघिन भटक कैसे गई। और इसे पकडऩे के सार्थक प्रयास क्यों नहीं किए गए? प्रश्नचिन्ह तो बाघिन को रात्रि के अंधेरे में दफनाने पर भी खड़ा हो रहा है। आखिर, किस डर की आशंका से आनन-फानन में यह सब किया गया। साल भर के भीतर दो बाघों की मौत प्रदेश में वन्य प्राणियों के लचर संरक्षण की पोल खोल दी है। रिपोर्ट तो इस पर भी तलब की जानी चाहिए। 

संघ की चिंता

ऐसे समय में जब पूरे देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ एक सकारात्मक माहौल बना है, उस वक्त भाजपा शासित राज्यों में बढ़ते भ्रष्टाचार को लेकर राष्ट्रीय स्वयं संघ का चिंतित होना लाजिमी है। इसमें कोई दो राय नहीं कि राष्ट्रीय अस्मिता, सुचिता और पारदर्शी व भ्रष्टाचारमुक्त शासन का दावा करने वाली भाजपा सरकारों में भी भ्रष्टाचार का घुन अन्य सरकारों की ही तरह लग चुका है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि  सत्ता सुख में भाजपा अपना चाल-चरित्र और सांगठनिक अनुशासन धीरे-धीरे खोती जा रही है। संघ की सबसे बड़ी चिंता भी यही है। भ्रष्टाचार के मुद्दे पर पार्टी के शीर्ष नेतृत्व का जिस तरह का ढुलमुल रवैया रहा है, उससे उसका दोहरा चरित्र उजागर हो गया है। भ्रष्टाचार के मामले में महीनेभर संसद में हंगामा करने वाली पार्टी की खुद की राज्य सरकारों पर जब भ्रष्टाचार के दाग लगे तो वह बगले झांकतें नजर आयी। आकंठ भ्रष्टाचार में डूबी कर्नाटक की येदियुरप्पा सरकार को लेकर कई दिनों तक जो नाटक हुआ उसे देश की जनता ने देखा। येदि सरकार के शर्मनाक पतन के बाद अब उत्तराखंड में आसीन भाजपा सरकार के मुखिया रमेश पोखरियाल 'निशंकÓ सरकार के कुशासन और भ्रष्टाचार के खिलाफ  पार्टी में ही व्यापक असंतोष की खबरें आ रही हैं। भले ही निशंक के मीडिया मैनेजमेंट के कारण सटर्जिया जैसे बड़े घोटाले की खबर देश की मीडिया में स्थान हासिल न कर पाई हो लेकिन, इससे भाजपा मठाधीशों की नींद उड़ी है। भाजपा का शीर्ष नेतृत्व भौचक्का है कि उत्तराखंड भाजपा के कई वरिष्ठ नेता इस भ्रष्टाचार के खिलाफ  प्रदेशव्यापी खुली जंग पर उतारू हैं। सरकार और पार्टी में भ्रष्टाचार के खिलाफ  इस लड़ाई का नेतृत्व भाजपा के पूर्व सांसद रहे ले.जनरल तेजपाल सिंह रावत कर रहे हैं। पार्टी के दो वरिष्ठ नेता पूर्व मुख्यमंत्री भुवनचंद खंडूडी व भगतसिंह कोश्यारी भी पोखरियाल सरकार के भ्रष्टाचार के कृत्यों से असंतुष्ट हैं। वे दिल्ली दरबार में कई बार अपनी वेदना प्रकट कर चुके हैं। लेकिन, पार्टी कार्यकर्ता और प्रदेश की आम जनता हैरान है कि सटर्जिया सहित कई अन्य भ्रष्टाचारों में पूरी तरह से घिरी उत्तराखंड सरकार के मुखिया रमेश पोखरियाल को तलब करने के बजाय केन्द्रीय नेतृत्व न जाने किस लोभ में उनको संरक्षण देने को उतारू है। यहां स्थिति कर्नाटक से ज्यादा शर्मनाक होने के बाबजूद शायद भाजपा कर्नाटक सी फजीहत होने देने का इंतजार कर रही है। छत्तीसगढ़ की डा.रमन सरकार का भी यही हाल है। यहां के कई मंत्रियों पर भ्रष्टाचार में लिप्त होने की पुख्ता खबरों के बावजूद पार्टी का शीर्ष नेतृत्व भ्रष्ट मंत्रियों पर किसी तरह की कार्रवाई से कतरा रहा है। मध्यप्रदेश में शिवराज सरकार में भी मंत्री से संत्री तक, अधिकारी से चपरासी तक सभी भ्रष्टाचार और कालेधन की चासनी से लबरेज हैं। यही हाल भाजपा शासित अन्य राज्यों का भी है। लेकिन, पार्टी संगठन भ्रष्टाचार पर नकेल कसने के मामले में असहाय ही नजर आ रहा है। पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी को अपने ही घर में लगी आग को पहले बुझाना होगा। उन्हें यह याद रखना चाहिए कि भ्रष्टाचार का अंत राजनैतिक प्रक्रिया से ही होगा। केवल हो-हल्ला मचाने से कुछ नहीं होगा। पार्टी की साख बचानी है तो अपनी सरकारों के भ्रष्ट मंत्रियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई कर स्वच्छ प्रशासन का उदाहरण पेश करना होगा। संघ की चिंता का निदान भी इसी से होगा।

सोमवार, 16 जनवरी 2012

सीमेंट कंपनियों की मनमानी

व स्तुओं की कीमतों पर नियंत्रण रखना सरकार का काम है। लेकिन, जब यह काम जनता खुद करने लगे तो सरकार के लिए यह खतरनाक संकेत है। उसे सचेत हो जाना चाहिए। अपनी प्रशासनिक मशीनरी की समीक्षा करनी चाहिए। लेकिन, अफसोस। सत्तामद में चूर राज्य सरकार आंखें बंद किए बैठी है। दिसंबर २०१० में छत्तीसगढ़ में सीमेंट की बोरी १६०-१७५ रुपए के बीच बिक रही थी। फिर क्या हुआ कि सितंबर २०११ के बाद से एकाएक दाम बढऩे शुरू हो गए ?१८० रुपए की बोरी २१५ रुपए में बिकने लगी। अगस्त में यह २५० रुपए में जा पहुंची। डीलर्स, भू संपत्ति कारोबारी और ग्राहक चिल्लाते रहे, लेकिन कीमतें बढ़ती ही गईं। स्थिति यह हो गई कि दिसंबर,११ के अंतिम हफ्ते तक २८५ रु पए प्रति बोरी तक दाम जा पहुंंचे। भू संपत्ति कारोबार की शीर्ष संस्था नेशनल रीयल एस्टेट डेवलपमेंट काउंसिल और बिल्डरों की नियामक संस्था, क्रेडाई को भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग और राज्य सरकार से अनुरोध करना पड़ा कि वह सीमेंट कंपनियों की मनमानी पर रोक लगाए। सत्तासीन पार्टी के विधायक को भी ग्रामीणों के साथ आंदोलन करना पड़ा। लेकिन, औद्योगिक घरानों के अहसानों से दबी सरकार ने एक बार भी यह जानने की कोशिश नहीं कि आखिर सीमेेंट के दाम क्यों बढ़ रहे हैं। कंपनियों ने मुनाफा कमाने के बाद अपने हिसाब से दाम घटाए।
दरअसल, दाम घटाने और बढ़ाने के इस खेल के पीछे सीमेंट कंपनियों की सोची समझी रणनीति थी। लार्फाज, अंबुजा और एसीसी समेत अन्य कंपनियों की दिसंबर में क्लोजिंग होती है। उन्हें शेयरधारकों को दिखाना होता है कि कंपनी ने अच्छा प्रदर्शन किया है। बैलेंस शीट ठीक करने के लिए दाम बढ़ाए गए। एक बात और। अमूमन अगस्त के बाद आम ग्राहकों में सीमेंट की डिमांड अपेक्षाकृत कम हो जाती है, तब नवंबर-दिसंबर तक कंपनियां सरकारी खरीद पर निर्भर रहती हैं। इस बीच साल के बजट की राशि को खर्च करने के लिए सरकारी खरीद ज्यादा होती है। इसलिए भी दामों में बेतहाशा इजाफा होता है। क्योंकि, राशि सरकारी खजाने से खर्च होनी होती है।
  बहरहाल, सेंचुरी सीमेंट के खिलाफ ग्रामीणों की आर्थिक नाकेबंदी के बाद यह संदेश गया कि कंपनी ग्रामीणों के दबाव में दाम घटाने के लिए मजबूर हुई। जबकि, सचाई यह है कि जनवरी के पहले सप्ताह में ही सीमेंट के दाम कम से कम ५० रुपए प्रति बोरी कम हो चुके थे। रही बात कंपनी की तरफ से ग्रामीणों की मांगें मान लेने की तो, ऐसा करके कंपनी ने कोई एहसान नहीं किया। ग्राम पंचायतों में विकास कार्य के लिए बाजार भाव से २० रुपए कम पर सीमेंट उपलब्ध कराकर भी कंपनी ने कोई सहूलियत नहीं दी। यह तो पहले से तय उसकी सामाजिक जिम्मेदारी का हिस्सा है। सीएसआर के तहत विकास कार्य कराना कानूनी बाध्यता भी है। कंपनी ग्रामीणों को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराने के नाम पर बरगला रही है। वास्तविकता यह है कि सीमेंट संयंत्रों से निकलने वाले प्रदूषण की वजह से दस किमी के दायरे में आने वाले लोग अस्थमा, टीबी जैसी घातक बीमारियों के मरीज हो रहे हैं। अपनी जमीन, संसाधन और स्वास्थ्य खोने वाले ग्रामीणों का तो यह हक बनता है कि उन्हें बेहतर जीवन, अच्छा स्वास्थ्य और आजीविका की गारंटी मिले। पिछले तीन महीने में अल्ट्राटेक ने २७८ करोड़, अंबुजा ने १७६ करोड़ और सेंचुरी ने करीब ३०० करोड़ प्रदेश से कमाए हैं। पिछले पांच साल में राज्य में सीमेंट उत्पादन ८० मीट्रिक टन से बढ़कर १४० मीट्रिक टन हो गया है। महंगाई और उत्पादन लागत बढऩे के बाद भी आज कंपनियों की उत्पादन लागत १२५ रुपए प्रति बोरी पड़ रही है। इस तरह कंपनियां प्रति बोरी दोगुने से भी ज्यादा लाभ कमा रही हैं। ऐसे में यह कहना नाइंसाफी होगा कि कंपनियों ने ग्रामीणों के हित के लिए नुकसान उठाया है।