शुक्रवार, 30 दिसंबर 2011

मैं चाहे ये करूं ,मैं चाहे जो करूं...

यह छत्तीसगढ़ में ही संभव है। जिसे जो काम करना चाहिए वह वो नहीं कर रहा। नाम के अनुरूप यहां काम को लेकर भी ३६ का आंकड़ा है। इतिहासकार का काम ऐतिहासिक तथ्यों की जांच-पड़ताल और इतिहास लेखन करना है। लेकिन, छत्तीसगढ़ सरकार ऐसा नहीं मानती। उसके लिए विषय विशेषज्ञता का कोई मतलब नहीं। शायद इसीलिए यहां के स्वास्थ्य महकमे ने इतिहासकारों को महामारी विशेषज्ञ बना दिया है। वह भी एक दो नहीं, बल्कि राज्य के १८ जिलों में। राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन(एनएचआरएम)के तहत प्रदेश के सभी जिलों में इपिडेमोलोजिस्ट (महामारी विशेषज्ञ) के पद पर एमबीबीएस या पब्लिक हेल्थ डिग्रीधारी की जगह इतिहास और समाजशास्त्र के पोस्ट ग्रेजुएट महामारी विशेषज्ञ के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। जबकि, केंद्र सरकार ने इस पद के लिए न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता एमबीबीएस तय की है। कल्पना कीजिए, जिस राज्य में इतिहासकार महामारी की रोक थाम के उपाय सुझाएंगे वहां की स्वास्थ्य योजनाओं का क्या हश्र होगा।
राज्य के स्वास्थ्य विभाग का एक और कारनामा कवर्धा में उजागर हुआ है। यहां के जिला अस्पताल में पदस्थ ईएनटी विशेषज्ञ डॉ. एनके यदु की नियुक्ति इसलिए हुई कि वे नाक, कान और गले के मरीजों का इलाज करेंगे। लेकिन, यदु पिछले २१ सालों से नसबंदी कर रहे हैं। वह भी महिलाओं की। उन्हें इसका फक्र भी है। तभी तो अभी तक उनके द्वारा किए गए तकरीबन ८२० नसबंदी आपरेशनों का लेखा-जोखा बतौर उपलब्धि उनके नाम दर्ज है। हालांकि, डॉ. यदु एमबीबीएस डिग्रीधारी हैं। इसलिए नसबंदी आपरेशन की अर्हता वे रखते हैं। लेकिन, नसबंदी आपरेशन के लिए नियमानुसार उन्हें कम से कम छह माह का प्रशिक्षण हासिल करना चाहिए था। यह इनके पास नहीं है। शर्मनाक तथ्य यह है कि यदु ने नसबंदी प्रशिक्षण के फर्जी प्रमाणपत्र बटोरे हैं। विशेषज्ञ चिकित्सकों की राय में कोई भी ईएनटी स्पेशलिस्ट किसी महिला या पुरुष की नसबंदी नहीं कर सकता। यह मेडिकल इथिक्स के खिलाफ है। डॉ. यदु की अज्ञानता और लापरवाही ने एक महिला की जान ले ली। तब मामला प्रकाश में आया। जांच हुई तो तो यदु के कारनामे उजागर हुए। इस फर्जीवाड़े के पहले इसी तरह का एक और मामला पकड़ में आया। रायपुर के आमापारा में एक फर्जी डॉक्टर ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना के तहत दो महीने में तीन सौ से अधिक मोतियाबिंद के आपरेशन कर डाले। इसके पास चिकित्सीय योग्यता के नाम पर सिर्फ एक साल के पैरा मेडिकल सर्टीफिकेट कोर्स, नेत्र सहायक का डिप्लोमा है। लेकिन, नेत्र मरीजों की मरहम पट्टी की योग्यता रखने वाला यह व्यक्ति स्वास्थ्य विभाग के अफसरों की कृपा से एमबीबीएस,एमएस डिग्रीधारी डॉक्टर के कार्य को अंजाम दे रहा था। इस तरह की अनियमिताएं सिर्फ स्वास्थ्य विभाग में ही हैं, ऐसा नहीं है।
नगर निगम में भी जिसके जिम्मे जो काम है वह उसे अंजाम नहीं दे रहा। नगर निगम की जिम्मेदारी है कि वह यह सुनिश्चित करे कि नगर की सीमा में बन रहे मकान नक्शे के अनुरूप सुरक्षित और सही ढंग से बनेंं। इसलिए हर जोन में सिविल और आर्कीटेक्ट इंजीनियरों की भर्ती की गई है। लेकिन, रायपुर नगर निगम के तीन जोन में मैकनिकल इंजीनियर और सर्वेयर स्तर के लोग नक्शा पास कर रहे हैं। जबकि, छत्तीसगढ़ भूमि विकास अधिनियम1984 के नियम 26 के मुताबिक सिविल इंजीनियर ही टाउन प्लानिंग का काम देख सकते हैं। जब अपात्र लोग नक्शे पास करेंगे तो मकानों की गुणवत्ता क्या होगी? यह आसानी से समझा जा सकता है। यही हाल गृह निर्माण सहकारी समितियों का भी है। यहां नियुक्त ओआईसी अपना मूल काम नहीं कर रहे हैं। इनका काम गृह निर्माण सहकारी समितियों का चुनाव कराना और संचालक मंडल की नियुक्ति करना है, ताकि जरुरतमंदों को विवाद रहित मकान बनाने के लिए प्लॉट मिल सके। लेकिन, ओआईसी खुद प्लॉट बेचने में जुटे हैं। यानी रक्षक ही लूट रहे हैं घर का सपना। इस तरह की गड़बडिय़ां केवल निचले स्तर पर ही हैं, ऐसा नहीं है। छत्तीसगढ़ विधानसभा के सचिव का काम रिसर्च ऑफिसर देख रहे हैं। इस पद पर काबिज देवेन्द्र वर्मा के खिलाफ राज्य वित्त आयोग के पूर्व अध्यक्ष विरेन्द्र पाण्डेय ने कई आरोप लगाए हैं। लेकिन, सरकार ने सचिव के पद कि योग्यता से तीन पद नीचे वाले अनुसंधान अधिकारी को अभी तक नहीं हटाया है।
 छत्तीसगढ़ सरकार की लचर कार्य प्रणाली के ये चंद नमूने हैं। हर विभाग की फाइल पलट लीजिए सब जगह भ्रष्टाचार है। नियमों का कहीं पालन नहीं हो रहा है। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के दस सालों के भीतर अपात्र नियुक्तियों के हजारों ऐसे मामले हैं जिनकी पड़ताल की जरूरत है। परदर्शी और जवाबदेह शासन का नारा देने वाली भाजपा सरकार के लिए नौकरशाही के ये भ्रष्ट उदाहरण यह समझने के लिए काफी हैं कि वाकई छत्तीसगढ़ में कितना स्वच्छ व पारदर्शी प्रशासन है। बहरहाल, सरकार हर उस कर्मचारी से वही काम ले जिनके लिए वे सुयोग्य हैं। नहीं तो हर रोज गलत आपरेशन से किसी महिला की कहीं मौत होगी तो कोई कहीं अपनी आंखों की रोशनी गवांएगा।

शनिवार, 17 दिसंबर 2011

तेल कंपनियों को फूटी आंख नहीं सुहाते दलित

डीलरशिप की राह में खड़ी करती हैं तमाम मुश्किले
मध्यप्रदेश के चंदला में रहने वाले देवेन्द्र अहिरवार को पेट्रोल पंप डीलरशिप लेने में ज्यादा मुश्किलें पेश नहीं आईं, लेकिन उनके समुदाय के हजारों लोगों को इस काम के लिए काफी पापड़ बेलने पड़ते हैं। इसका अंदाजा उन्हें अच्छी तरह से है। अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों के कल्याण संबंधी संसदीय समिति की मानें तो सरकारी क्षेत्र की तेल कंपनियों को दलित फूटी अंाखों नहीं सुहाते। समिति ने अपनी ताजा रिपोर्ट में कहा है कि तेल क ंपनियां अनुसूचित जातियों के आर्थिक एवं सामाजिक उन्नयन के संविधान के उद्देश्य को ही समाप्त करने पर तुली हुई हैं। डीलरशिप के विज्ञापन इस तरह प्रसारित किए जाते हैं कि दलितों के बड़े हिस्से को उसकी जानकारी ही नहीं मिल पाती। भेदभाव की इंतिहा तब हो जाती है जब दलितों को ऐसे स्थान आरक्षित किए जाते हैं जहां बिक्री बेहद कम होती है कि उससे तेल कंपनियों का बकाया भरना भी दूभर हो जाता है। समिति ने सुझाव दिया है कि  वंचित तबके के  लोगों की वित्तीय मदद के लिए बैंक ब्याज दर १४ प्रतिशत के बजाय ४ फीसदी हो और दलितों को समस्याओं से बचाने के लिए तगड़ा मैकेनिज्म बनाया जाए  तभी इसका फायदा उन्हें मिल पाएगा।

अभी आसान नहीं है दलितों की राह

ताजा रिपोर्ट के मुताबिक इस वित्तीय वर्ष में दलित उद्यमियों को दिए गए कज्रे में 33ण्8 फीसद की कमी आई हैण्वे सभी जिन्होंने पिछले दिनों डिक्की अर्थात दलित चेम्बर आफ कामर्स एंड इंडस्ट्रीज के दिल्ली चैप्टर के उद्घाटन की रिपोर्ट पढ़ी होगी या जो केन्द्र सरकार के इस फैसले से अवगत हुए होंगे कि उसने तय किया है कि वह छोटे एवं मध्यम दज्रे के दलित उद्यमियों से अपनी खरीदारी का 20 प्रतिशत लिया करेगीए उन सभी के लिए एक बुरी खबर हैण् मीडिया में प्रकाशित एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक इस वित्तीय वर्ष में दलित उद्यमियों को दिए गए कज्रे में 33ण्8 फीसद की कमी आई हैए जो सैकड़ों ष्दलित उद्यमियों द्वारा सामाजिक आर्थिक बाधाओं को लांघने एवं मुख्यधारा के बिजनेस में पैर जमाने की कोशिशों मेंष् अड़ंगा  बन सकती हैंण्
लाजिमी है कि बिना कज्रे के ऐसे उद्यमियों को उस अवसर से वंचित होना पड़ सकता हैए जो केन्द्र सरकार की नई नीति ने प्रदान किया है जिसका ऐलान हाल में हुआ हैण् यह अनुमान लगाया गया था कि हर साल केन्द्र सरकार छोटे उद्यमियों से 35 हजार करोड़ रुपए की खरीदारी करती हैए उसमें से सात हजार करोड़ की खरीदारी अब वह दलितों.आदिवासियों की मिल्कीयत वाले उद्यमों से किया करेगी
अगर हम सरकारी घोषणाओं के बरक्स दलितों.आदिवासियों के साथ बैंकों के अन्तक्र्रिया पर नजर डालें तो यही पाते हैं कि वहां चित्र बहुत रमणीय नहीं हैण् रिजर्व बैंक आफ इंडिया द्वारा जारी किए गए आंकड़ों के मुताबिक अप्रैल से अक्तूबर माह के बीच सामाजिक न्याय मंत्रालय की बीस विभिन्न योजनाओं के लिए प्रदत्त कज्रे की मात्रा 1ए670 करोड़ तक पहुंची है जो एक तरह से विगत तिमाही से 33ण्8 फीसद कम हैण् अगर पिछले साल के इसी कालखंड को देखें तो मंत्रालय ने 2ए524 करोड़ रुपए की राशि कज्रे के तौर पर प्रदान की थी
दलित एवं आदिवासी तबके से आनेवाले उद्यमियों को सरकारी खरीद में एक निश्चित हिस्सा प्रदान किया जाएय यह चर्चा आज से लगभग दस साल पहले  शुरू हुई थीए जब तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह की अगुआई में मध्यप्रदेश सरकार ने ष्दलित एजेंडाष् पर केन्द्रित एक आयोजन किया थाण् बताया गया था कि अमेरिका की तरह हमें भी व्यापार आदि में विविधता सिद्धांत का पालन करना चाहिएए जहां सरकार अपनी सकारात्मक नीतियों ;एफम्रेटिव एक्शनद्ध के तहत अफ्रो.अमेरिकन एवं अन्य अल्पसंख्यक समुदायों से संबद्ध बिजनेस समूहों से अपनी जरूरत की 30 फीसद सामग्री खरीदती है
हम इसे अमेरिका के अनुभव की चर्चा करके समझ सकते हैंण् अमेरिका में पचास.साठ के दशक में नागरिक अधिकारों के लिए चले आंदोलन के बाद. जिसने अेतों और अन्य अल्पसंख्यक तबकों के साथ ेत समुदाय द्वारा किए जाते भेदभाव को उजागर किया था. अमेरिकी सरकार को ऐसी नीति बनाने के लिए मजबूर होना पड़ा कि अेतों का अनुपात शिक्षा संस्थानों से लेकर रोजगार के विभिन्न क्षेत्रों ही नहीं बल्कि बिजनेस लीडर्स की फेहरिस्त में भी बढ़ेण् इन नीतियों को एफम्रेक्टिव एक्शन अर्थात सकारात्मक नीतियां कहा गयाए जिसके अंतर्गत उद्योगपतियों को इस बात के लिए प्रोत्साहित किया गया कि वे अपने यहां इन तबकों को स्थान देंण्
भारत में वंचितध्उत्पीड़ित तबकों के साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय को दूर करने के लिए उनके लिए स्थानों का निश्चित प्रतिशत सुरक्षित करने की जो पण्राली कायम की गईए उससे यह पण्राली थोड़ी अलग किस्म की थीण् किसी भी संस्थान में अगर विविधता सूचकांक ;डाइवर्सिटी इंडेक्सद्ध अच्छा है अर्थात विभिन्न तबकों को ठीक स्थान दिया गया है तो उपरोक्त संस्थान सरकार की तरफ से विशेष छूटोंए सुविधाओं का लाभ उठा सकता थाए इसके विपरीत यदि किसी संस्थान में यह मन माफिक नहीं है तो अपने आप ऐसी सुविधाओंए छूटों में कटौती होती थीण् वर्ष 1964 में कायम हुई इन नीतियों ने अमेरिकी उद्योगों की सामाजिक संरचना को विविधतापूर्ण बनाने में अहम भूमिका अदा कीण् 
अगर हम खरीदारी में दलितों.आदिवासियों की अगुआई वाले उद्यमों के लिए सरकारी खरीदारी में निश्चित हिस्सा सुरक्षित रखने के सामाजिक प्रभाव की बात करें तो कह सकते हैं कि इस कदम कोए बकौल प्रोफेसर सुखदेव थोरात.  ष्आरक्षण की तर्ज पर सार्वजनिक रोजगारए शिक्षा एवं रोजगार के प्रावधानों में अवसर प्रदान करने की तर्ज पर ऐतिहासिक कदम कहा जा सकता हैण्ष् खुद डॉण् अम्बेडकर ने 25 जनवरी 1919 को साउथबरो आयोग के सामने इसका उल्लेख किया थाण् अपनी प्रस्तुति में उन्होंने उस ष्महारष् महिला का उल्लेख किया था जो फल बेच रही थीण् उनके मुताबिक पुलिस ने तत्काल इस महिला को गिरफ्तार किया क्योंकि उसने इस रिवाज का उल्लंघन किया थाए जिसके अंतर्गत दलित तबके का कोई भी व्यक्ति दूषित करने वाले उद्यम को ही अपना सकता थाण् वर्ष 1947 में संविधान सभा को सौंपे गए ज्ञापन में भी इसका विशेष उल्लेख थाण् उसके मुताबिक ष्फैक्टरियों और व्यावसायिक उद्यमों में निजी उद्यमियों द्वारा जातीय आधार पर किए जानेवाले भेदभाव को भी अपराध समझा जाना चाहिएण्ष् कुछ समय पहले की बात है जब अमेरिका के प्रिंस्टन विविद्यालय और भारत की ष्इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ दलित स्टडीजष् के तत्वावधान में एक अलग किस्म का अध्ययन किया गया थाण् अमेरिका में अेतों एवं अन्य अल्पसंख्यक तबकों के साथ होने वाले भेदभाव को नापने के लिए बनाई गई टेक्नीक का इस्तेमाल करते हुए प्रस्तुत अध्ययन में लगभग पांच हजार आवेदन पत्र भारत की अग्रणी कम्पनियों को 548 विभिन्न पदों के लिए भेजे गएण्योग्यताएं एक होने के बावजूद कुछ आवेदन पत्रों के आवेदकों के नाम से स्पष्ट हो रहा था कि वह दलित समुदायों से सम्बधित हैंण् गौरतलब था कि कम्पनियों की तरफ से ज्यादातर उन्हीं प्रत्याशियों से वापस संपर्क किया गया जिनके नाम उच्च वर्णीय तबके से आते प्रतीत होते थेण् दलित सदृश्य नामों वाले ष्प्रत्याशीष् नौकरी की पहली ही सीढ़ी पर छांट दिए गए थेण् भारत के प्रतिष्ठित ष्इकोनोमिक एंड पोलिटिकल वीकलीष् नामक जर्नल में इस अध्ययन का समूचा विवरण प्रकाशित भी हुआ थाण्इसे विडम्बना ही कहा जाएगा कि सामाजिक तौर पर उत्पीड़ितध्वंचित रहे तबकों को अपने यहां तैनात करने हेतु आरक्षण जैसी किसी पण्राली को लागू करने के केन्द्र सरकार के प्रस्ताव को खारिज करते हुए ष्मेरिटष् की वरीयता की बात करनेवाले कॉरपोरेट क्षेत्र को बेपर्दा करने वाले प्रस्तुत अध्ययन के निष्कषरें पर कभी चर्चा नहीं हुईण् बात आई गई हो गई

शनिवार, 10 दिसंबर 2011

नालंदा से भी पुराना सिरपुर का शिक्षा केंद्र

उत्खनन में मिली ईसा पूर्व तीसरी सदी की वैदिक पाठशाला मिली
पुरातात्विक स्थल, सिरपुर का शिक्षा केंद्र बिहार के नालंदा विश्वविद्यालय से भी पुराना था। यहां उत्खनन में मिली ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी की वैदिक पाठशाला की कार्बन डेटिंग से पता चलता है कि एक हजार वर्ष पहले सिरपुर पूरी तरह से शिक्षाकेंद्र के रूप में विकसित हो चुका था। सातवीं सदी में जब यहां चीनी पर्यटक व विद्वान ह्वेनसांग आया था तब यहां करीब 100 संघाराम थे, जिनमेें महायान संप्रदाय के दस हजार से ज्यादा भिक्षु विद्यार्जन करते थे। लेकिन, सिरपुर के पुरातात्विक स्थलों का उत्खनन न होने से यहां की ऐतिहासिकता समय पर उजागर नहीं हो पाई। और इसका ज्यादा प्रचार-प्रसार नहीं हो सका।
स्तूप का संबंध भगवान बुद्ध से 
महासमुंद जिले में स्थित सिरपुर में पिछले कई सालों से उत्खनन कार्य करा रहे पुरातत्ववेत्ता और राज्य सरकार के पुरातत्व सलाहकार डॉ अरुण कुमार शर्मा के मुताबिक यहां खुदाई में एक स्तूप मिला है जिसका सीधा संबंध भगवान बुद्ध से है। यह स्तूप सांची के स्तूप से अलग है और पत्थर निर्मित है। पत्थर के स्तूपों के बारे में कहा जाता है कि ऐसे स्तूप भगवान बुद्ध के निर्देशन में ही बनते थे। बौद्ध ग्रंथों में उल्लेख है कि बुद्ध ईसा पूर्व छठीं सदी में सिरपुर आए थे। तब यहां बौद्ध विहारों की स्थापना शुरू हुई। ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में सम्राट अशोक ने इस क्षेत्र में कई स्तूपों का निर्माण कराया। सिरपुर आए ह्वेनसांग केकई लेखों में यहां की अध्ययन प्रणाली, अभ्यास और मठवासी जीवन की पवित्रता का उत्कृ ष्ट वर्णन मिलता है। यह स्थल दीर्घकाल तक ज्ञान-विज्ञान और कला का केन्द्र बना रहा। बारहवीं शताब्दी में आए भीषण भूकंप के बाद यहां की पूरी सभ्यता और विरासत तहस-नहस हो गई।
देश की पहली वैदिक पाठशाला
सिरपुर में उत्खनन के दौरान ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी की वैदिक पाठशाला व शिक्षकों के कमरे मिले हैं। इसे डॉ अरुण कुमार शर्मा के निर्देशन में खोजा गया।10 मीटर लंबे व 1.5 मीटर चौड़े कमरों के बीचो बीच विष्णु की मूर्ति मिली है। इस कमरे में 60 विद्यार्थियों के पढऩे की व्यवस्था थी। डॉ शर्मा के अनुसार यह भारत में खोजी गई सबसे प्राचीन और पहली पाठशाला है। इस तरह की यहां कई पाठशालाओं के होने के प्रमाण मिले हैं।
अब तक का सबसे बड़ा विहार
तीवरदेव महाविहार दक्षिण कोसल में मिला अब तक का सबसे बड़ा विहार है। यह कसडोल जाने वाले मार्ग पर दाहिनी ओर लक्ष्मण मंदिर से एक किमी पूर्व स्थित है। इस क्षेत्र में और कई विहार मिले हैं, जहां छात्रों और अध्यापकों के रहने के अलग-अलग कमरे थे। वस्तुत:यह पूरा क्षेत्र एक बौद्ध सांस्कृतिक संकुल था। क्योंकि, इसी परिसर में अन्य विहार भी स्थित हैं।
प्राचीन चिकित्सा केंद्र भी
उत्खनन में एक महत्वपूर्ण बात यह भी सामने आई है कि सिरपुर एक पूर्ण विकसित नगर होने के साथ ही एक बड़ा आयुर्वेदिक केन्द्र भी था। पूर्णत: वास्तु के अनुरूप बने इस नगर में कई आर्युेदिक स्नानागार भी मिले हैं। जिनमें विभिन्न रोगियों का उपचार किया जाता था। स्नानागारों में जड़ी-बूटियों के अवशेष, आयुर्वेदिक दवाओं के निर्माण में प्रयुक्त पत्थरों के औजार भी पाए गए हैं। एक स्नानागार से व्यक्ति के हाथ का एक अस्थि पंजर मिला है। जिसमें टूटी हड्डी को लोहे की राड से जोड़ा गया है। खास बात यह है कि आज भी यह राड जंगरहित है। इससे पता चलता है कि यहां का आयुर्वेदिक चिकित्सा विज्ञान कितना उन्नत था।
और नालंदा विश्वविद्यालय एक नजर में
प्राचीन भारत में उच्च शिक्षा के सर्वाधिक महत्वपूर्ण इस केन्द्र में महायान व हीनयान बौद्ध धर्म के साथ अन्य धर्मों के तथा अनेक देशों के छात्र पढ़ते थे। बिहार राज्य के पटना से 88.5 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व में इस विश्वविद्यालय के भग्नावशेष मिले। सातवीं शताब्दी में यहां भी भ्रमण पर आए चीनी यात्री ह्वेनसांग तथा इत्सिंग के यात्रा विवरणों में इसका जिक्र है। इस विश्वविद्यालय की स्थापना गुप्त शासक कुमारगुप्त प्रथम (सन् 450-470ई) ने की थी। यहां भी करीब 10,000 विद्यार्थी पढ़ते थे और अध्यापकों की संख्या 2000 के आसपास थी। ११९९ ई में तुर्क आक्रमणकारी बख्तियार खिलजी ने इसे जलाकर नष्ट कर दिया था।

सिरपुर: बुद्व की पावन धरती

यह गौतम बुद्व की पावन धरती है। लोग कहते हैं, उन्होंने यहां की आबोहवा को बनाया।
लंबे समय से यहां के 184 टीलों के नीचे स्वणरिाम इतिहास दबा है। यहां ईसा पूर्व छह सौ साल पहले का इतिहास सोया है। अभी दस-पंद्रह साल पहले तक इस वैभवशाली विरासत के बारे में छत्तीसगढ़ सरकार भी लगभग अनजान थी। उतना ही जानती थी, जितना अंग्रेज पुरातत्वविदों और बाद में एक विश्वविद्यालय ने बताया। छत्तीसगढ़ राज्य के रूप में नए राज्य के सृजन के बाद सरकार जगी, तो इतिहास भी जग गया। सिरपुर की धरती में फिर से उजाला पसर गया। अब नित नई जानकारियां उजागर हो रहीं हैं। पता चल रहा है, ईसा की 6वीं शताब्दी से 10वीं शताब्दी के बीच यहां बौद्ध धर्म काफी फला-फूला। प्रसिद्ध चीनी यात्री व्हेनसांग भी 643 वीं शताब्दी में सिरपुर आया था। उसने यहां के वैभव का अपने यात्रा वृतांत में उल्लेख किया है। उसने लिखा है कि मध्य भारत का यह भाग बौद्ध धर्म का स्तम्भ था। यहां का राजा सभी धर्मों का आदर करने वाला था। वह हिन्दू, बौद्ध और जैन धर्म को समान रूप से राजकीय संरक्षण प्रदान करता था। व्हेनसांग ने यह भी लिखा है कि यहां बहुत बड़ा शिक्षा का केंद्र था। दक्षिणी-पूर्व एशिया से दूर-दूर के शिक्षार्थी उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए सिरपुर आते थे। दो मंजिला बौद्ध विहारों में एक समय 10,000 से अधिक विद्यार्थी विद्याध्ययन करते थे, आदि आदि....।
कैसे बनी सिरपुर जाने की योजना
पिछले एक-डेढ़ सालों से जब से रायपुर में प्रवास कर रहा हूँ, सिरपुर के बारे में कुछ न कुछ सुनता रहा हूं। हाल ही यह भी पता चला, अयोध्या मामले में ऐतिहासिक तथ्यों को रखने वाले डॉ अशोक कुमार शर्मा जी ही पिछले दस सालों से सिरपुर में उत्खनन कार्य करवा रहे हैं। वर्षों पहले एक बार जब वे रायबरेली में चल रहे अयोध्या प्रकरण के मुकदमे में गवाही देने पहुंचे तब उनसे मुलाकात हुई थी। पत्रकारीय पेशे के दायित्व को निभाने के लिए तब शर्मा जी का एक साक्षात्कार लिया था। शर्मा जी के गुणों और कार्यों से तभी से प्रभावित हूं। एक तो सिरपुर को देखने-समझने, दूसरे शर्मा से मिलने की उत्कं ठा मेंमैंने यहां के भ्रमण की योजना बना ली। छह दिसंबर को बाबरी ध्वंस की बरसी  पर सिरपुर भ्रमण और शर्मा जी के साथ यादेंं ताजा करने के लिए महासमुंद चल पड़ा। अपने सहकर्मी और छोटे भाई समान राजेंद्र शाहू जी के संग। साथ हो लिए संतराम शाहू जी भी।
हम तीनों जन रायपुर से सुबह दस बजे दो मोटरसाइकिलों पर सवार होकर सिरपुर के लिए निकले। रायपुर से सिरपुर करीब ८४ किमी दूर नेशनल हाइवे ६ पर महासमुंद जिले में स्थित है। करीब साठ किमी की यात्रा हाइवे पर करने के बाद सिरपुर पहुंचने के लिए लगभग बीस किमी का सफर घने जंगलों के बीच से होकर जाने वाली सड़क से करनी पड़ती है। यहां का दृश्य बहुत मनोरम है। चिडिय़ों की चहचहाहट के बीच साठ किमी के सफर की थकान छूमंतर हो गई। और कब हम सिरपुर पहुंच गए पता ही नहीं चला।
महानदी के तट पर बसा एक छोटा कस्बा
सिरपुर महानदी के तट पर बसा एक छोटा सा कस्बा है। जहां पुरातात्विक महत्व के कई स्मारक मौजूद हैं। किसी समय सिरपुर भी दक्षिण कोसल की राजधानी रह चुका है। तब यह श्रीपुर नाम का एक समृद्ध नगर था। सातवीं आठवीं शताब्दी में यहां शरभपुरी पांडुवंशीय राजाओं का शासन था। जिन्होंने यहां कई मंदिर और विहार बनवाए थे। 7वीं शताब्दी में यहां आए चीनी यात्री ह्वेनसांग ने श्रीपुर में 70 मंदिरों व 100 विहारों का उल्लेख किया है। वह श्रीपुर का स्वर्णकाल था। कालांतर में कई मंदिर एवं विहार काल के गर्त में समा गए। अब यहां गिने चुने मंदिर तथा विहारों के अवशेष बचे हैं।
लक्ष्मण मंदिर
सिरपुर के प्राचीन मंदिरों में लक्ष्मण मंदिर प्रमुख है। स्थापत्य कला का यह अनूठा शिल्प ईटों से निर्मित है। प्राचीन मंदिरों में ईटों से बने मंदिर कम ही होते थे। यह देश का दूसरा प्राचीनतम मंदिर है जो ईटों से बना है। यह भगवान विष्णु को समर्पित है। मंदिर के शिखर में एक से अधिक निर्माण शैलियों की झलक दिखती है, विशेषकर उड़ीसा शैली की। इसका निर्माण पंचरथ शैली में किया गया है। जिसमें मंडप, अंतराल एवं गर्भगृह है। इसकी दीवारों पर चैत्य, गवाक्ष, वातायन, कीर्तिमुख, कर्ण आमलक आदि प्रभावशाली लगते हैं। प्रवेशद्वार पर विष्णु के शेषशायी रूप के साथ कुछ अवतारों का मोहक चित्रण है। तीन ओर की दीवारों पर तीन छोटे-छोटे दरवाजे बने हैं। ईटों के बने ये दरवाजे मंदिर की शोभा बढ़ाते हैं। लक्ष्मण मंदिर से कुछ दूर एक अन्य मंदिर के अवशेष पाए गए हैं। एक टीले के नीचे दबा रहा यह मंदिर अभी पूरी तरह अनावृत्त नहीं हुआ है। पुरातत्व विभाग द्वारा इसके संरक्षण का कार्य अभी चल रहा है। लक्ष्मण मंदिर के पीछे एक संग्रहालय भी है। जहां हमें उत्खनन में प्राप्त कई मूर्तियां देखने को मिलीं।

बौद्ध विहार
सिरपुर में अब दो बड़े विहारों के खंडहर शेष हैं। इनमें से एक है आनंद प्रभु कुटी विहार। विहार में पद्मासन मुद्रा में स्थित भगवान बुद्ध की प्रतिमा वास्तव में दर्शनीय है। बौद्धभिक्षु आनंद प्रभु के लिए बना मंडप भी यहां सुरक्षित है। दूसरा स्वस्तिक विहार कहलाता है। स्वस्तिक आकार में निर्मित इस विहार में ध्यान मुद्रा में भगवान बुद्ध की प्रतिमा स्थित है। सिरपुर के विहार भी ईटों से ही निर्मित हैं। आसपास के क्षेत्र में कुछ और छोटे ऐतिहासिक मंदिर और विहारों के अवशेष मिले हैं।
गंधेश्वर मंदिर
महानदी के तट पर गंधेश्वर मंदिर स्थित है। कहते हैं इस मंदिर का वातावरण प्राकृतिक रूप से सुगंधित बना रहता है। इसीलिए इसे गंधेश्वर मंदिर कहा जाता है। मान्यता है कि यह सुगंध शिवलिंग से आती है, जो प्राकृतिक रूप से प्रकट हुआ है। गर्भगृह के द्वार पर शिव परिवार, कैलाश पर्वत, रावण द्वारा पर्वत हिलाने का प्रयास तथा कुछ अन्य मूर्तियां उकेरी गई हैं। स्तंभों पर पालि भाषा में कुछ शिलालेख भी मौजूद हैं। मुख्य मंदिर के सामने कुछ छोटे मंदिर भी हैं।
पुण्य सलिला महानदी
गंधेश्वर मंदिर से पुण्य सलिला महानदी का विस्तृत क्षेत्र काफी मनोरम लगता है। लेकिन अब नदी में बहुत कम मात्रा में ही पानी रहता है। डॉ शर्मा ने बताया कि इसरो के सेटलाइट से मिले चित्रों के मुताबिक कभी महानदी में बारहों महीने बीस-बीस फीट तक पानी रहता था। तब महानदी में बड़े बड़े जहाज चला करते थे। उत्खनन में मिले बाजार क्षेत्र में बंदरगाह के भी प्रमाण मिले हैं। इससे इस बात की पुष्टि होती है कि दूर देश के व्यापारी यहां अपने माल लेकर आया करते थे। 
मानव संस्कृति की अमूल्य धरोहर खतरे में
हमारी आंखों के सामने ही धीरे-धीरे विलुप्त होता जा रहा है सिरपुर का समृद्व इतिहास ।  समुचित सुरक्षा के अभाव में यह अहसास बरबस पैदा होता है कि आखिर कैसे बचेगी यहंा की धरोहर। पर्यटक बिना किसी नियंत्रण के हर कहीं आ-जा सकते हैं। संस्कृति को कैमरे में कैद करने की ललक के साथ वे ऐतिहासिक बनावटों पर मनमाने ढंग से घूमते हैं, अमूल्य मूर्तियों और नक्काशियों को नंगी उंगलियों से परखते हैं। प्राचीन पत्थर से बनी मूर्तियां वैसे भी अपनी चमक खो चुकी हैं। क्या यह समय की थपेड़ है या राज्य के पर्यटन विभाग की उपेक्षा। बहरहाल, इन स्मारकों के बीच चलते हुए इतिहास की गोद में होने का अनोखा और सुखद अनुभव होता है लेकिन, कुछ सालों में इनकी क्या हालत हो जाएगी। ये खंडहर, भग्नावशेष हजारों साल तक पुराने हैं। इन्हें बचाना है तो पर्यटन से इनकी रक्षा करनी पड़ेगी। लक्ष्मण मंदिर में तो लोग अक्सर कैंपिंग के लिए आते हैं और कूड़ा छोड़ जाते हैं। क्या यह अभी अभी जन्में इतिहास के सिमटने की दास्तान है...। ईश्वर करें ऐसा न हो क्योंकि, सिरपुर को तो अभी अंतरराष्ट्रीय क्षितिज पर पहचान बनानी बाकी है।

शनिवार, 3 दिसंबर 2011

वन्य जीवों को बचाइए

छत्तीसगढ़ में बाघिन, तेंदुआ, हाथी और बायसन के बाद अब भालू व लकड़बघ्घे की मौत। राज्य के विभिन्न हिस्सों में निरीह बेजुबानों की संदिग्ध मौतों का सिलसिला जारी है। लेकिन, हर मौत को वन अधिकारी स्वाभाविक बता रहे हैं। राजनांदगांव के अंधागढ़ चौकी इलाके में दुर्लभ वन्यजीव गौर (बायसन) को मारा गया। भालू और लकड़बग्घे को करंट से तड़पा तड़पाकर मौत दी गई। बायसन ने तो दो महिलाओं पर हमला किया था। इसलिए ग्रामीणों ने उसे अपने तरीके से सजा दी। भालू और लकड़बग्घा अपनी झुधा की आग बुझाने के लिए खेत में घुसने की कोशिश की और मारे गए। इन दोनोंं ही मौतों पर वन अफसरों के बयान पर गौर करें। कहीं से नहीं लगता इन्हें बेजुबानों की मौत का दर्द है। ये तो वन्यजीवों की मौत के लिए किसी को दोषी भी नहीं मानते। राजनांदगांव के डीएफओ ने बयान दिया, गौर पेड़ के नीचे बैठा, फिर उठा ही नहीं। जबकि, उसके शरीर पर गंभीर चोट के निशान मिले थे। जिस इलाके में गौर की हत्या हुई वह इनका स्वाभाविक रहवास नहीं है। इसके पहले इस प्रजाति के वन्य जीव को यहां कभी देखा नहीं गया। ग्रामीणों का कहना है कि महाराष्ट्र के जंगलों से भटकते हुए तीन बायसन छत्तीसगढ़ की सीमा में आ गए थे। इसकी जानकारी वन महकमे को थी। लेकिन, वन विभाग ने न तो ग्रामीणों और न ही इस दुर्लभ वन्यजीव की सुरक्षा की पहल की। बायसन का भी वही हश्र जो सितंबर २०११ में छुरिया के बखरूटोला में महाराष्ट्र के जंगलों से भटकर आई बाघिन का हुआ था। भालू और लकड़बग्घे की मौत पर सरोना रेंज के डिप्टी रेंजर का बयान है कि फसल बचाने के लिए किसान खेतों के चारो ओर गैर कानूनी ढंग से करंट दौड़ा रखे हैं। यानि, विभाग को जानकारी है फिर भी अपराध होने दिया जा रहा है। अब मामले की जांच होगी। इसके पहले भी कई हाथियों और तंदुए को भी बर्बरता से मारा गया। बार नवापारा के लवन परिक्षेत्र में इसी अक्टूबर महीने में शिकारियों ने तेंदुए का शिकार कर लिया। इसी हप्ते घरघोड़ा परिक्षेत्र में हथिनी की संदिग्ध मौत हुई। इसके पहले महासमुंद में एक हाथी को करंट लगाकर मार डाला गया। सरगुजा और कोरबा इलाके में तो भालुओं को करंट से मारने की सालभर के भीतर दर्जनों घटनाएं हुई हैं। ये वे मामले हैं जो उजागर हुए और अखबारों की सुर्खियां बनें। इनकी जांच चल रही है। लेकिन, लेकिन वन्य जीवों को मारने वालों के खिलाफ  साक्ष्य न मिलने की वजह से किसी पर अभी तक सीधे कार्रवाई नहीं हुई। इसीलिए शिकारी और ग्रामीण बेखौफ हैं। और हर रोज बेजुबान बेमौत मारे जा रहे हैं। राज्य में वन्यजीवों की हत्या के नित नए रिकार्ड बन रहे हैं लेकिन, वन अमला चुप है। राज्य से दुलर्भ सांपों, अजगरों से लेकर बाघ, हाथी तक की हड्डियों, दांतों और खालों की तस्करी हो रही है। सवाल है कि प्रदेश का भारी भरकम वन अमला,राज्य जीव जंतु कल्याण बोर्ड और जिला पशु क्रूरता निवारण समिति समेत अन्य विभाग बेजुबानों को बचाने के लिए क्या कर रहे हैं। बिजली परियोजनाओं और कोयला खनन के लिए रोज जंगल कट रहें तो आखिर वन्य जीव कहां जाएं। उनका पेट कैसे भरे। वे बस्ती में आएंगे ही। ऐसे में नागरिकों विशेषकर ग्रामीणों और वन क्षेत्रों में रहने वाले लोगों में यह जागरूकता क्यों नहीं लाई जा रही कि उनके क्षेत्र में आने वाले वन्य प्राणी निरीह, भोले व अनजान हैं, जो  दया व संरक्षण के अभिलाषी हैं और अनजाने में भटकते हुए बस्ती में आ जाते हैं। ये डरे हुए प्राणी आहार, पानी और सुरक्षित स्थान की तलाश में होते हैं। इसलिए इन पर दया करें। इसके साथ ही विभाग को वन्यप्राणियों की हत्या करने वालों के साथ सख्ती से पेश आना होगा। लेकिन, यह कौन करेगा जो शिकारियों से मिला हो उससे क्या उम्मीद की जा सकती है।

यह कैसा प्रशासन ?

भारतीय संविधान देश के सभी नागरिकों के लिए व्यक्तिगत और सामूहिक रूप से बुनियादी स्वतंत्रता देता है। मौलिक अधिकारों की रक्षा की भी संवैधानिक गारंटी है। इनकी रक्षा करना राज्य सरकार का दायित्व है। लेकिन खेद है, छत्तीसगढ़ सरकार नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करने में विफल रही है। उसे कोर्ट की फटकार सुनने की आदत सी पड़ गई है। राज्य के नागरिकों को न साफ हवा मिल रही है, न स्वच्छ वातावरण। और न ही पीने के लिए साफ पानी। बात चाहे बिलासपुर की हो राजधानी रायपुर की या फिर राज्य के किसी और शहर की। बजबजाती नालियां, सड़कों और गलियों में पसरी गंदगी ने नागरिकों का जीना मुहाल कर दिया है। राज्य की सड़कों की हालत ऐसी है कि सही-सलामत घर पहुंच जाएं तो यह राहगीर की किस्मत। परिवहन व्यवस्था तो और भी चौपट है। सड़कों पर जगह-जगह आड़े-तिरछे खड़ी गाडिय़ां, हर पल ट्रैफिक रूल्स की धज्जियां उड़ाते फर्राटा भरते वाहन शहर की पहचान बनते जा रहे हैं। राज्य निर्माण के एक दशक हो चुके हैं लेकिन, लोगों में अभी तक ट्रैफिक सेंस डेवलप नहीं हो पाया है। राज्य का परिवहन महकमा भी नहीं चाहता कि लोग नियमों का पालन करें। इसीलिए अफसर ट्रैफिक व्यवस्था सुधारने के बजाय खुलेआम वसूली में मस्त हैं। इसी तरह हर शहर में कहीं सीवर लाइन, कहीं वाटर सप्लाई तो कहीं बिजली, टेलीफोन के तार बिछाने के लिए सड़कें खोदकर छोड़ दी गई हैं।नियम है कि सड़क काटने के लिए नगर निगम की अनुमति ली जाए। सड़क काटने के बाद सड़क की मरम्मत के लिए नगर निगम संबंधित विभाग से निर्माण राशि वसूलता है। लेकिन, यह राशि निगम अफसरों की जेबों के गड्ढे भरने में खप रही है। नगर निगम अधिनियम की धारा ६६ में प्रावधान है कि वह नागरिकों को बेहतर वातावरण, बेहतर चिकित्सा सुविधाएं, सड़क-पानी समेत जन सुविधाओं का ख्याल रखे। इसके लिए निगम नागरिकों से टैक्स भी वसूलता है। लेकिन, जब राज्य सरकार को ही जनता के मौलिक अधिकारों का ख्याल नहीं तो नगर निगम कुशल और जवाबदेह प्रशासन की उम्मीद कैसे की जा सकती है? मौलिक अधिकारों के हनन और जन सुविधाओं की अवहेलना पर बिलासपुर उच्च न्यायालय आए दिन राज्य सरकार को फटकार लगा रहा है। लेकिन, राज्य सरकार कहीं भी राज्य के नीति निर्देशक तत्वों को पूरा करती नहीं दिखती। ऐसा लगता है,राज्य के मुखिया कागजों में और आंकड़ों के सहारे प्रदेश की किस्मत चमकाने में विश्वास रखते हैं। इसलिए कोर्ट फटकारे या प्रदेश की जनता चिल्लाए उन्हें इसकी परवाह नहीं। अफसर भी अपने हिसाब से कोर्ट को याचिकाओं का जवाब पेश कर देगें। लेकिन कब तक?

सरप्लस कट

रमन सरकार कहती है बिजली छत्तीसगढ़ की ताकत है। देश का यह इकलौता जीरो पावर कट राज्य है। बिजली उत्पादन और वितरण के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य के लिए राष्ट्रीय स्तर पर राज्य को पावर एक्सीलेंस एवार्ड मिला है। यहां सरप्लस बिजली थी, इसलिए सरकार बिजली बेचती थी। यह सारी बातें सही हैं। लेकिन, इन उपलब्धियों के बावजूद सचाई यह है कि इधर राज्यभर में अंधाधुंध बिजली कटौती हो रही है। शहरवासियों को बिजली की आंख मिचौनी के कारण पानी के लिए तरसना पड़ रहा है। ग्रामीणों को बिजली मांगने पर लाठियां खानी पड़ रही हैं। उद्योगपति पावर कट से परेशान हैं। उनका व्यवसाय चौपट हो रहा है। सरप्लस बिजली वाले प्रदेश में बिजली कटौती होना और जनता को बिजली के लिए डंडे खाना सरकार के लिए शर्म की बात है। अपनी नाक बचाने के लिए सरकार अरबों रुपए की बिजली खरीद रही है। बिजली काट रही है। प्रदेश में 2744 मेगावॉट की मांग के अनुरूप मात्र 1930 मेगावॉट बिजली उपलब्ध है। मांग और आपूर्ति का यह गणित एक दिन में नहीं गड़बड़ाया। सरप्लस बिजली वाले राज्य की हालत धीरे-धीरे बिगड़ी है। पिछले साल सरकार ने जम्मू-कश्मीर और तमिलनाडु जैसे राज्यों से बिजली खरीदी थी। तब  खराब मानसून को बहाना बनाया गया था। इस साल तो भरपूर बारिश हुई है। कोयले की मांग में भी कोई कमी नहीं आई है। आखिर फिर बिजली का संकट क्यों? दरअसल, बिजली संकट का बड़ा कारण छत्तीसगढ़ राज्य पावर जनरेशन कंपनी के संयंत्रों का आए दिन खराब हो जाना है। मौजूदा संकट इसी से उपजा है। एक नहीं पांच-पांच यूनिटें खराब पड़ी हैं। इससे विपक्ष के इस आरोप को बल मिल रहा है कि बिजली उपकरणों की खरीदी में बड़ा घोटाला हुआ है। संयत्रों में घटिया उपकरण खरीदकर लगाए गए हैं। इसी वजह से बिजली का उत्पादन आए दिन प्रभावित हो रहा है। आरोप तो यह भी लग रहे हैं कि बिजली अफसर निजी उत्पादकों को लाभ पहुंचाने के लिए और महंगी बिजली खरीदी में कमीशनखोरी के चक्कर में संयंत्रों के समुचित रखरखाव में लापरवाही बरत रहे हैं। यदि इन आरोपों में थोड़ी भी सचाई है तो यह बहुत ही गंभीर बात है। छत्तीसगढ़ के अफसरों पर वैसे ही भ्रष्टाचार के कई आरोप लगे हैं। इसलिए इन आरोपों की जांच होनी चाहिए। क्योंकि,अफसर कत्र्तव्यों के प्रति ईमानदार नहीं होगें तो चाहे जितने संयंत्र लगा लें बिजली की कमी दूर नहीं होगी राज्य में वर्तमान में १९२४ मेगावाट बिजली का उत्पादन हो रहा है। दिसंबर २०१२ तक ३४२४ मेगावाट बिजली पैदा होगी। इतनी बिजली आत्मनिर्भरता के लिए पर्याप्त है। जरूरत है इसके समुचित उपयोग और सही ढंग से वितरण की। लेकिन, लगता है सरकार को सिर्फ बिजली उत्पादन बढ़ाने की चिंता है। इसीलिए वह जांजगीर चांपा की ४०,००० एकड़ उपजाऊ जमीन को ३४ निजी बिजली कंपनियों को बेचकर ४०,००० मेगावाट बिजली पैदा करने का दिवास्वप्र दिखा रही है। हो सकता है इससे रमन सरकार के खाते में एक और रिकार्ड जुड़ जाए। लेकिन, इसके लिए भी किसानों को तो लाठियां खानी ही होंगी? उनके घर फिर भी उजियारा नहीं होगा। क्योंकि,अफसर तो वही रहेंगे ना।

गुरुवार, 1 दिसंबर 2011

रोड मैनेजमेंट से ही रुकेंगे हादसे

नेशनल क्राइम रिकॉड्र्स ब्यूरो के अनुसार देश में हर घंटे तेरह लोग सड़क हादसे में अपनी जान से हाथ धो बैठते हैं। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में पिछले दस महीने में बेकाबू ट्रकों ने ४५६ लोगों की जान ले ली। तकरीबन हर रोज अकेले रायपुर में एक व्यक्ति सड़क हादसे में अपंग हो रहा है। बावजूद इसके सड़क सुरक्षा हमारे नीति-निर्धारकों की नजर में नहीं है । और न ही सड़क सुरक्षा सड़क इंजीनियरिंग का हिस्सा ही बन पाई है। सड़क दुर्घटनाओं की ऑडिटिंग, उपयुक्त जांच और राज्य के हालात के मुताबिक अनुसंधान कर सड़क इंजीनियरिंग को सुधारने और यातायात के नियमों को सख्ती से लागू करने के बारे में कोई सुविचारित नीति भी सरकारों के पास नहीं है। राज्य सरकारंे एड्स और कैंसर पीडि़तों के लिए हर साल लंबा-चौड़ा बजट बनाती हैं, लेकिन सड़क दुर्घटनाओं पर नियंत्रण के लिए साल में एक बार यातायात सप्ताह की रस्म अदायगी के सिवाय कुछ नहीं किया जाता। नीति-निर्धारकों के लिए पैदल चलने वाले या फिर दुपहिया वाहन चालकों के सुरक्षा उपाय अमूूमन सबसे निम्न प्राथमिकता में होते हैं। जब भी शहरी क्षेत्रों में कहीं सड़कों की क्षमता बढ़ाई जाती है या फिर नई सड़कें बनती हैं, सरकार की प्राथमिकता महज सड़क जाम से निपटने की होती है। कई बार ऐसा होता है कि फ्लाईओवर बनाकर एक क्रॉसिंग का जाम खत्म करने की कोशिश की जाती है, लेकिन सड़क इंजीनियरिंग और यातायात प्रबंधन के अभाव में यह जाम उस क्रॉसिंग से हटकर उससे अगली क्रॉसिंग पर पहुंच जाता है। कहीं भी देख लीजिए। पैदल चलने वालों को सड़कों के किनारे की पटरी नहीं मिलती। बड़े शहरों को छोड़ दें तो कहीं भी सड़क क्रास करने के लिए स्थान तय नहीं होते। इसकी वजह से पैदल चलने वाले और दोपहिया चालक कहीं से भी सड़क पार करने की कोशिश करते हैं और दुर्घटना का शिकार होते हैं। सड़क दुर्घटनाओं में मरने वाले या घायल होने वालों में निम्न और मध्य वर्ग के लोग ही ज्यादा होते हैं। मरने वालों में पैदल यात्रियों और दुपहिया वाहन चालकों की संख्या अधिक होती है। क्योंकि अमीर वर्ग न तो पैदल चलता है और न ही टू-व्हीलर का अधिक इस्तेमाल करता है। अमूूमन गरीब तबका यह मान लेता है कि व्यक्ति की मौत आई थी, इसलिए वह दुर्घटना का शिकार हो गया। बहुत कम मामलों में खराब रोड मैनेजमेंट के लिए सरकार को कटघरे में खड़ा किया जाता है। शायद यही वजह है कि सड़क दुर्घटना रोकने के लिए सरकार की प्राथमिकता में सड़क सुरक्षा उपाय है ही नहीं। यह बात ड्राइविंग लाइसेंस जारी करने की प्रक्रिया से देखी-समझी जा सकती है। कोई ऐसा जिला नहीं, जहां परिवहन कार्यालयों में ट्रांसपोर्ट दलाल सक्रिय न हों। लोगों के ड्राइविंग लाइसेेंस पैसे के बल पर बिना ड्राइविंग टेस्ट लिए ही बन जाते हैं। लाइसेंस जारी करने में कहीं भी योग्यता की पूरी जांच नहीं की जाती। लोगों में यातायात समझ भी नहीं है। यातायात पुलिस भी इतनी भ्रष्ट हो चुकी है कि वह चंद नोटों की खातिर ट्रैफिक नियमों को तोडऩे की खुली छूट दे देती है। पुलिस की मिलीभगत से हर  रोज नो एंट्री जोन में भारी वाहनों की बेरोकटोक आवाजाही लगी रहती है। यातायात भावना न होने से लोग बेतरतीब ड्राइविंग करते हैं। दुर्घटनाएं बताती हैं कि कितने लोग ट्रैफिक संकेतों का पालन करते हैं। कई बार जब संकेत लाल होता है, लोग देखते हैं कि यातायात सिपाही मौजूद नहीं है, तो वे नियम तोडऩे से परहेज नहीं करते। जीवन की सुरक्षा के लिए एक मिनट की भी प्रतीक्षा लोगों को गंवारा नहीं। जगह-जगह लिखा होता है यहां किस गति से गाड़ी चलाएं या फिर हार्न न बजाएं , लेकिन कितने लोग सड़क पर गति सीमा का पालन करते हैं। एक लेन से दूसरी लेन को पार करने से पहले 10 बार सोचने की जरूरत होती है। कितने लोग दाएं-बाएं देखकर लेन बदलते हैं। नियम तोडऩे पर कितनों को सजा मिलती है। यह कुछ ऐसे सवाल हैं जिनके जवाब हमें और आपको ही तलाशने होंगे। सड़क हादसों को रोकना है तो जितनी जरूरत पुख्ता रोड मैनेजमेंट को लागू करने की है उतनी ही लोगों में यातायात सिविक सेंस विकसित करने की भी है। तभी हम और आप अपने घरों को सुरक्षित लौट पाएंगे।

'लाल' की काली कमाई

प़ बंगाल के दार्जिलिंग में १९६७ में सीपीआई(एम)के कुछ  कार्यकर्ताओं ने नक्सलबाड़ी के जमींदारों के खिलाफ इसलिए बगावत की थी कि वे गरीब किसानों से न केवल बेगारी करवाते थे, बल्कि चाय की खेती की आड़ में अफीम और पोस्ता की गैरकानूनी खेती कर किसानों का शोषण करते थे। तब लाल झंडे के नीचे कसमें खाई गईं कि जब-तक किसानों और गरीबों का शोषण खत्म नहीं होगा, वे चैन से नहीं बैठेंगे। लेकिन, किसी को क्या पता था कि २००४ में भाकपा (माले) के गठन के बाद ये गरीब जनता के हित की बात करने वाले 'लाल आतंकवादीÓ बन जाएंगे और सामाजिक वातावरण ठीक करने के बजाए देश को अंदर से खोखला करने लगेंगे। इससे बड़ी विडंबना और क्या हो सकती है कि अत्याचार का बदला लेने के नाम पर अब तक हजारों निर्दोष ग्रामीणों और जवानों की जान लेने वाले ये लाल आतंकी ४४ सालों के सफर में खुद वही काम करने लगे हैं, जिसके विरोध में ये खड़े हुए थे। उद्योगपतियों, व्यापारियों, डाक्टरों और ठेकेदारों से अवैध वसूली करने वाले नक्सलियों ने अब पैसों के लिए अपना नार्कोटिक्स नेटवर्क खड़ा कर लिया है। ये छत्तीसगढ़ के बीजापुर और नारायणपुर जिले में किसानों को डरा-धमकाकर  गांजे की खेती करवा रहे हैं। इनका वार्षिक बजट १५००० करोड़  से ज्यादा का हो गया है और ये अवैध कमाई से वसूली राशि को शेयर बाजार, रियल इस्टेट, प्रापर्टी, सोना और बड़े शिक्षण संस्थानों में निवेश कर रहे हैं। राज्य पुलिस और गृह विभाग के पास इस बात के पुख्ता सबूत हैं कि नक्सली संगठन अवैध खनन, कोयला तस्करी से डेढ़ से दो करोड़ और राज्य के तेंदूपत्ता ठेकेदारों से हर साल ५५ से ६० करोड़ की काली कमाई कर रहे हैं। विकास कार्यों में बजट के हिसाब से ये २० से ३० फीसदी कमीशन वसूल रहे हैं। कभी तीर-कमान से आदिवासियों के हक की लड़ाई लडऩे वाले नक्सली आज राकेट लांचर जैसे अत्याधुनिक हथियारों से लैस हैं। विकास के नाम पर विनाश के रास्ते पर बढ़ चुके इन खतरनाक नक्सलियों से सावधान रहने की जरूरत है। ये आतंकी तालिबान बनें, इसके पहले इनके नेटवर्क को ध्वस्त करना होगा। तभी सही मायने में लोगों को विकास का लाभ मिलेगा।

बैराज के नुकसान भी गिनाइए

छत्तीसगढ़ की जीवदायिनी महानदी की निर्मल धारा अब अविरल प्रवाहित नहीं होगी। इसके पानी को जगह-जगह रोकने तैयारी की जा रही है। जांजगीर-चांपा, रायगढ़ और रायपुर जिले में स्थापित होने वाली दर्जनों बिजली कंपनियों को भरपूर पानी मिले, इसके लिए राज्य सरकार  महानदी पर एक नहीं, सात-सात बैराज बनाएगी। इन बैराजों का पानी जिंदल, लेंको, जीएमआर, एस्सार, एनटीपीसी, लाड्र्स, भूषण, मोजरबेयर, टोरंटो और सोना पावर जैसी तमाम कंपनियों बेचा जाएगा। पानी की बिक्री से जलसंसाधन विभाग की तिजोरी में सालाना ६२८ करोड़ रुपए आएंगे। महानदी का पानी बेचने से पहले राज्य काजल संसाधन विभाग रोगदा बांध की भी बिक्री का सौदा केएसके पॉवर कंपनी के साथ कर चुका है और गंगरेल बांध को बेचने की तैयारी है। बहरहाल, सरकार बांध बनने से कमाई होने के साथ इसके अनेक अन्य फायदे भी  गिना रही है। कहा जा रहा है कि बांधों के बनने से आसपास के क्षेत्रों का जलस्तर बढ़ेगा ,  कुंओं और तालाबों का पानी जल्दी नहीं सूखेगा और क्षेत्र के ग्रामीणों को सालभर निस्तारी पानी मिलेगा। सवाल यह है कि बांधों के फायदे तो बताए जा रहे हैं, लेकिन इनसे होने वाले नुकसान पर हुक्मरानों के मुंह बंद हैं। जगह-जगह बांधों के बनने से बांध जलभराव क्षेत्र से कितने गांवों का विस्थापन होगा, कितनी उपजाऊ जमीन जलमग्न हो जाएगी और कितना खाद्यान्न उत्पादन घटेगा! सरकार इसका खुलासा क्यों नहीं कर रही। जलप्रवाह को रोके जाने से पारिस्थिकीय संतुलन पर जो बुरा असर पड़ेगा क्या जलसंसाधन विभाग ने इसका आंकलन किया है! रोगदा बांध को बेचे अभी ज्यादा दिन नहीं हुआ है। बांध पाटकर यहां पॉवर प्लांट लगाने की तैयारी का किसान पुरजोर विरोध कर रहे हैं, पर शासन-प्रशासन कम्पनी पर पूरी तरह मेहरबान हैं। प्राकृतिक जल स्रोत को राज्य शासन ने जिस तरह से बेचा है, उससे ग्रामीणों में आक्रोश है। बांध पाटे जाने के बाद आसपास के गांवों का भूजल स्रोत १५-२० मीटर नीचे चला गया है। बहरहाल, राज्य की जमीन, खनिज-वन संपदा और अन्य प्राकृतिक संसाधनों की सौदागर सरकार अब पानी बेचने पर उतारू है। नदी और बांध बेचने के ये सौदे तो उजागर हो गए हैं, लेकिन क्या पता, यह सरकार पानी के बाद हवा, रोशनी और रात की चांदनी का भी सौदा न कर चुकी हो और कल को हम से सांस की कीमत भी वसूली जाय। यह नौबत आए इससे पहले हमें सचेत होना होगा। लेकिन चिंता की बात यह है कि इस गंभीर विषय पर न सरकार चेत रही है, न जनता जाग रही है। छोटी-छोटी बातों पर बवाल मचाने वाले समाजसेवी और स्वयंसेवी संस्थाएं भी मूकदर्शक बनी हुई हैं। खनिज,वन संपदा,नदी, नाले और पानी के प्राकृतिक स्रोत पर सभी का समान हक है। ऐसे में यह गंभीर मामला है कि आखिर सरकार अकेले नदियों का सौदा कैसे कर सकती है! उद्योगपति भूगर्भ जल और नदी के पानी का अंधाधुंध दोहन करें और प्रदूषित जल नदी में प्रवाहित करें, इसके पहले हमें जागना होगा। अन्यथा बैराजों के बनने से पर्यावरण असंतुलन तो गड़बड़ाएगा ही, बिजली कंपनियों से निकलने वाले प्रदूषित जल से कैंसर जैसी विभिन्न घातक बीमारियों के शिकार भी होंगे। महानदी का विषैला जल मछलियों और अन्य जलजीवों के लिए अभिशाप साबित होगा।

रिपोर्टर और सब एडीटर का दंभ

प्रिंट मीडिया के दो स्तंभ हैं- रिपोर्टर और सब एडीटर। इन्हीं के कंधों पर होता है न्यूज का दारोमदार। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में रिपोर्टर (एंकर) और प्रोड्यूसर यह जिम्मेदारी निभाते हैं। मीडिया के बदलते परिवेश में आज दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। कभी रिपोर्टर सब एडीटर की भूमिका में होता है तो कभी सब एडीटर रिपोर्टर की। जिस अखबार में सब एडीटर और रिपोट्र्स में अच्छे संबंध होते हैं, वहां खबरें बोलती हैं, चमकती-दमकती दिखती हैं। लेकिन, दुर्भाग्यवश आज बहुत कम अखबारों में ही रिपोट्र्स और सब एडीटर्स के बीच तालमेल दिखता है। प्राय: दोनों में अहम की लड़ाई चलती रहती है। उप संपादक समझता है, संवाददाता को कुछ नहीं आता। तो संवाददाता को लगता है कि उप संपादक अल्पज्ञ है। न केवल भारत बल्कि समूची दुनिया की मीडिया में दोनों के बीच यही भाव देखने को मिलता है। यही हाल इलैक्ट्रॉनिक मीडिया का भी है। यहां भी रिपोट्र्स और प्रोड्यूसर के बीच शीतयुद्ध जारी रहता है। खबर फाइल करने के साथ ही सब एडीटर्स और संवाददाता के बीच शीतयुद्ध शुरू हो जाता है। खासकर ब्यूरो और लोकल ब्यूरो से जुड़ी सिटी डेस्क और सेंट्रल डेस्क के सब एडीटर्स के बीच ज्यादा तनातनी रहती है। इन्हीं दोनों डेस्कों के उप संपादकों के बीच ज्यादा मिस अंडरस्टैडिंग और इनटॉलरेंस भी पैदा होता है।
छोटी-छोटी बातों पर मनमुटाव कई बार रिपोटर्स को यह लगता है कि खबर की जो हेडिंग और प्लेसिंग होनी चाहिए वह नहीं मिली। शीर्षक और स्थान को लेकर अक्सर बहस होती है। संवाददाता की शिकायत होती है, खबर ज्यादा पठनीय थी उसे प्रथम पृष्ठ पर या अमुक पृष्ठ पर अमुक स्थान मिलना चाहिए था। विशेष इफेक्ट के साथ छापा जाना चाहिए था। रिपोट्र्स कहते हैं, उनकी खबर के अमुक अंश ज्यादा महत्वपूर्ण थे उन्हें हाईलाइट होना चाहिए था, या अमुक तथ्य जरूरी था लेकिन, उसे काट दिया गया। डबल कालम की खबर को सिंगल कर दिया गया या संक्षिप्त कर दिया गया। कई बार संवाददाता किसी खास पक्ष को उजागर करने के लिए या फिर किसी व्यक्ति विशेष को उपकृत करने के लिए खबरें लिखते हैं। उनकी अपेक्षा होती है कि खबर हू-ब-हू छप जाए। दूसरे दिन अखबार से खबर नदारद देख झगड़ा शुरू होता है। रिपोट्र्स को अपने लिखे हर वाक्य, हर शब्द से प्यार होता है लेकिन सब एडीटर्स पर ज्यादा से ज्यादा खबरें पेज पर लेने का दबाव होता है। इसीलिए वह खबरों से अनावश्यक तथ्य हटाकर संपादित अंश प्रकाशित करता है। प्राय: रिपोट्र्स बिना तथ्यों की पुष्टि किए या खबर से जुड़े व्यक्ति का पक्ष लिए बिना अधूरी और एकपक्षीय खबरें लिखते हैं। सब एडीटर्स खबर की गुणवत्ता और विश्वसनीयता के लिए इन तथ्यों की मांग करते हैं, तो दोनों में मनमुटाव पैदा होता है। रिपोट्र्स की इच्छा हर उस खबर पर बाईलाइन लेने की होती है जो रूटीन से हटकर होती है, या जिसमें अतिरिक्त जानकारी होती है। कई बार मूल खबर के कुछ अंशों को घुमा-फिराकर बाईलाइन के चक्कर में स्पेशल स्टोरी लिखी जाती है। सब एडीट्र्स इसे खबर का दोहराव मानता है तो रिपोर्टर अपनी एक्सक्ल्यूसिव स्टोरी। इसको लेकर भी बहस होती है।
अक्सर रिपोट्र्स को घर जाने की जल्दी होती है क्योंकि, वह दिन भर फील्ड में रहता है। इसलिए वह जल्दी-जल्दी खबरें निपटाता है। ऐसे में कई बार महत्वपूर्ण तथ्य छूट जाते हंै, वह जल्दी में गलत एंगिल पर स्टोरी की शुरुआत करता है, या खबर में व्याकरण की दृष्टि से तमाम अशुद्धियां करता है। छोटी-छोटी गलतियां, कामा, विराम और मात्राओं की त्रुटियां सब एडीटर्स को इरीटेट करती हैं। केयरलेस होकर लिखी गयी खबर या डंपिग इन्फारमेशन उप संपादकों पर मनोवैज्ञानिक दबाव डालती हैं। रिपोट्र्स को अपने बीट की एक-दो खबरें लिखनी होती हैं, जबकि उप संपादक के पास तमाम रिपोट्र्स की खबरों को तय समय में संपादित करने का टास्क होता है। ऐसे में खबर का इंट्रो और स्टोरी की बॉडी चेंज करनी पड़ी तो सब एडीट्र्स अपनी झल्लाहट रिपोट्र्स पर उतारता है।
क्या करें रिपोर्टर कुशल रिपोर्टर को चाहिए कि वह खबर लिखने के पहले न्यूज वैल्यू, न्यूज सेन्स के बारे में विचार कर सेंट्रल आइडिया पर ध्यान केंद्रित करे। चंूकि, अखबार पाठकों के लिए निकलता है इसलिए हर खबर में पाठकों के हित को उसके पक्ष को ध्यान में रखें। सेंसेन पैदा करना या फिर हो-हल्ला मचाना खबर का मकसद नहीं होना चाहिए। किसी खबर को लेकर संशय हो तो खूब चर्चा करें। सब एडीट्र्स या अपने कुलीग्स से बात करें। इससे खबर का बेहतर इण्ट्रो और अच्छा बॉडी स्ट्रक्चर बनता है। खबर लिखने के बाद एक बार स्वयं खबरों की स्क्रूटनी करने का नियम बना लें। तथ्यों का मिलान कर लें तो न गल्तियां होंगी और न ही एक दूसरे को नीचा दिखाने की नौबत आएगी।
क्या करें उप संपादक एक अच्छा सब एडीटर वही है जिसमें संयम हो। भाषा का संयम,लेखन का संयम और संपादन का संयम। व्यवहार में संयम तो जरूरी है ही। उसे चाहिए कि वह अपने ईगो और ज्ञान को संभालकर रखें। अच्छे साहित्य पढ़े, ताकि भाषाई ज्ञान में अभिवृद्धि होती रहे। कई बार अच्छे रिपोट्र्स की स्टोरी खराब सब एडीटर को बनाने के लिए मिल जाती है। नासमझी में वह खबर के भाव को ही उलट देता है। इसलिए न्यूज एडीटर को चाहिए कि वह उपयुक्त उपसंपादक को ही उपयुक्त कार्य सौंपे।
                                                                                                                               महेन्द्र प्रताप सिंह

अच्छी पहल

स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने के लिए चिकित्सकों, पैरामेडिकल स्टॉफ और मितानिनों को पुरस्कृत कर छत्तीसगढ़ सरकार ने अच्छी शुरुआत की है। इस नेक पहल से न केवल स्वास्थ्य विभाग के अन्य डॉक्टर और कर्मचारी बेहतर कार्य करने के लिए प्रेरित होंगे बल्कि, राज्य के और विभागों में भी बेहतर कार्यशैली विकसित करने में मदद मिलेगी। खुशी की बात यह है कि मानव संसाधनों और अन्य बुनियादी सुविधाओं की कमी के बावजूद हमारे चिकित्सकों और सरकारी अमले ने न केवल राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रमों, बल्कि अन्य स्वास्थ्य सेवाओं के क्रियान्वयन में उल्लेखनीय कार्य किया। इससे यह बात साबित होती है कि यदि कार्य करने का जज्बा और जुनून हो तो कठिन से भी कठिन राह भी आसान हो जाती है। सीमित संसाधनों में भी राष्ट्रीय सूचकांकों की तुलना में छत्तीसगढ़ राज्य पुरुष और महिला नसबंदी, संपूर्ण टीकाकरण और स्तनपान आदि कार्यों में प्रशस्ति योग्य स्थिति में है तो इसका श्रेय उन कर्मचारियों और डॉक्टरों को जाता है, जिन्होंने संसाधनों का दुखड़ा रोए बिना सिर्फ और सिर्फ लक्ष्य पर नजर रखी। बहरहाल, जनसामान्य के स्वास्थ्य की बेहतरी और स्वास्थ्य सेवाओं को बहुआयामी स्वरूप देने के लिए अभी और सजगता व क्रियाशीलता की जरूरत है। इसके लिए प्रशासनिक कसावट के साथ स्वास्थ्य सुविधाओं को जनोन्मुखी बनाने के लिए सरकार को गंभीरता से सोचना होगा। स्वास्थ्य सूचकांक के मामले में अन्य राज्यों की तुलना में हम अभी बहुत पीछे हैं। राज्य में विशेषज्ञ चिकित्सकों के ८६६ पद स्वीकृत हैं लेकिन, कार्यरत हैं २१५, चिकित्साधिकारियों के कुल २३६५ पदों के मुकाबले सिर्फ १०१४ ही भरे गए हैं। यही हाल नर्सिंग श्रेणी के पदों का है। यहां भी डेढ़ हजार से अधिक पद खाली हैं। ग्रामीण इलाकों के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों का बुरा हाल है। दवाएं हैं तो डाक्टर नहीं, बेड है तो इन्हें रखने के लिए अस्पताल भवन नहीं। इन हालातों में महज उत्कृष्ट कर्मचारियों के भरोसे ही छत्तीसगढ़ देश में रोल मॉडल नहीं बन सकता है। इसके लिए सरकार को हर विभाग में उत्कृष्ट कार्य संस्कृति विकसित करनी होगी। संसाधन उपलब्ध कराने होंगे और योग्य कर्मचारियों को पुरस्कृत करने की परंपरा डालनी होगी। भ्रष्ट और बेईमान कर्मचारियों को दंड मिले इसकी भी ठोस व्यवस्था करनी होगी। दंड, सम्मान और पुरस्कार का यह सिलसिला जब हर विभाग में चल पड़ेगा तो विकास का कारवां खुद-ब-खुद आगे बढ़ता रहेगा। तब हमें रोल मॉडल बनने में देर न लगेगी।

विकास का नया मॉडल तलाशें

छत्तीसगढ़ की खुशहाली खेती से है, लेकिन यहां के अन्नदाता बेहाल हैं। औद्योगिक विकास के लिए उनकी जमीनें छीनी जा रही हैं। इससे उनमे आक्रोश बढ़ रहा है। जांजगीर चांपा जिले के तो हर गांव में आग सुलग रही है। यहां छत्तीसगढ़ सरकार ने एक-दो नहीं, बल्कि 34 पावर प्लांट लगाने के लिए देश भर की नामी कंपनियों से एमओयू हस्ताक्षरित किए हैं। बड़ी संख्या में पावर प्लांट लगाए जाने से 70 प्रतिशत से अधिक सिंचाई और कृषि प्रधान भूमि खत्म हो गयी है। किसानों की हालत इतनी खराब है कि ओड़केरा गांव समेत कई गांवों के तो सभी किसान भूमिहीन हो गए हैं। इनके पास एक एकड़ तक जमीन नहीं बची है। यहां एथेना छत्तीसगढ़ पावर कंपनी लिमिटेड १२०० मेगावाट का पावर प्लांट लगा रही है। इस कंपनी पर भी वही आरोप हैं जो अन्य पावर प्लांट कंपनियों पर लगे हैं। जमीन खरीदी में बड़े पैमाने पर धोखाधड़ी की जा रही है। ग्रामीण प्लांट प्रबंधन, दलालों, अधिकारियों और नेताओं की चौकड़ी की कुटिल रणनीति में फंसकर अपनी दो फ सली जमीन बेच रहे हैं। एथेना पावर प्लांट प्रबंधन का साथ तो प्रशासन भी दे रहा है। अफसरों की मदद से भूअर्जन एक्ट की धारा 2 के तहत भूमि अधिग्रहण की कार्रवाई की जा रही है। जबकि, पावर प्लांट निजी है। इसलिए उसे भूअर्जन अधिनियम की धारा 7 के तहत जमीन अधिग्रहीत करनी चाहिए। धारा 2 के तहत तो सिर्फ शासकीय प्रमोशन के लिए जमीन अधिग्रहीत की जाती है। इसलिए ग्रामीणों का विरोध जायज है। बड़ी बात यह है कि भूमिहीन होने वाले गरीब आदिवासी हैं। इसलिए सरकार को इस समस्या की तरफ शिद्दत से ध्यान देगा होगा। विनाश की कीमत पर विकास नहीं चाहिए। इसका समाधान यह नहीं है कि किसी के साथ हिंसा हो या अग्रिम मुआवजे की राशि को बार-बार बढ़ाते हुए उस स्तर तक पहुंचा दिया जाए जिसके बाद परियोजनाओं को लगाना ही अव्यावहारिक हो जाए। इस समस्या का समाधान उन आदिवासियों के लिए प्लांट में हिस्सेदारी का कोई ऐसा फार्मूला पेश करना है, जिन्हें नुकसान हो रहा है। इस फार्मूले में दो तत्व शामिल होने चाहिए, निश्चितता और निष्पक्षता। जमीन के बदले आजीविका का कोई निश्चित विकल्प और निष्पक्ष व सर्वमान्य मुआवजा दिए बगैर जमीन छीनने से औद्योगिक विकास भले सुधर जाए, लेकिन आदिवासियों की तकदीर तो बिल्कुल ठीक नहीं होगी। धान का कटोरा कहीं राख का कटोरा न बन जाए, इसलिए समय रहते सुलगती आग को बुझाना बहुत जरूरी है।

गैर जिम्मेदार जवाब...!

छत्तीसगढ़ में मोतियाबिंद के आपरेशन के बाद आंखों की रोशनी गवांने के हर रोज नए मामले सामने आ रहे हैं। जिम्मेदारी से बचने के लिए हर कोई अलग-अलग कारण गिना रहा है। अब बालोद नेत्रकांड हादसे में डॉक्टरों ने नई वजह बतायी है। वे कह रहे हैं हमारे ऊपर गलत कार्रवाई की गई है। आपरेशन में गड़बड़ी तो लक्ष्य पूरा करने के चक्कर में हुई है। वे आरोप लगा रहे हैं, विभाग टारगेट तो देता है लेकिन इसके लिए पर्याप्त सुविधाएं मुहैय्या नहीं करवाता। बालौद में मरीजों का जहां आपरेशन हुआ वह जगह उपयुक्त नहीं थी। मौसम भी अनुकूल नहीं था। चिकित्सक तो आपरेशन में उपयोग किए गए उपकरणों और सामग्री की गुणवत्ता पर भी सवाल उठा रहे हैं। इनका कहना है, कम से कम तीन प्रयोगशालाओं में उपकरणों का परीक्षण होना चाहिए। डॉक्टर जो भी कह रहे हैं, वह गलत नहीं है। सवाल यह है कि चिकित्सक जब अपनी हर सुख-सुविधा का ख्याल रखते हैं तो मरीजों की सुविधाओं की अनदेखी क्यों? अस्पतालों में काम के घंटे तय हैं। कभी ज्यादा काम करना पड़ा तो वे हो-हल्ला मचाते हैं। लेकिन, ज्यादा मरीजों की आंखों के आपरेशन का लक्ष्य मिला तो विरोध क्यों नहीं जताया? जब आपरेशन के लिए उपयुक्त मौसम और स्थान नहीं था तो आखिर आपरेशन क्यों किए गए? आम आदमी भी जानता है कि बारिश के मौसम में संक्रमण ज्यादा फैलता है। आपरेशन करने वाले तो डॉक्टर थे, आखिर फिर इन्होंने एहतियात क्यों नहीं बरता? कम दोषी तो आला अधिकारी भी नहीं हैं। स्वस्थ्य छत्तीसगढ़ की छवि के चक्कर में इन्होंने दर्जनों गरीबों के बदले रोशनी के बदले अंधेरा दे दिया। इसलिए लक्ष्य तय करते समय यह तो देखना चाहिए कि पर्याप्त सुविधाएं हैं कि नहीं, स्टॉफ है या नहीं। सरकार आए दिन परिवार नियोजन,टीवी उन्मूलन,तो कही कुष्ठ निवारण जैसे लक्ष्य तय करती रहती है। चिकित्सकों पर इन लक्ष्यों को पूरा करने का दबाव रहता है। लेकिन इसके लिए सरकार प्रोत्साहन राशि व अन्य सुविधाएं भी देती है। किसने कितना आपरेशन किया। इसका जिक्र डॉक्टर अपनी प्रोफाइल में भी करते हैं। और इसका लाभ भी लेते हैं। इसलिए जांच तो इस बात की भी होनी चाहिए कि कहीं प्रति आपरेशन मिलने वाली अतिरिक्त प्रोत्साहन राशि की वजह से तो डॉक्टरों ने लापरवाही नहीं बरती। जब जांच चल ही रही तो सरकार को यह मानक भी तय कर देना चाहिए कि कौन डॉक्टर कितने समय में कितने आपरेशन कर सकता है। तभी लक्ष्यों को पूरा करने की सार्थकता सिद्व होगी। और स्वस्थ छत्तीसगढ़ का सपना भी साकार होगा।