बुधवार, 15 फ़रवरी 2012

कब तक छले जाएंगे किसान

छत्तीसगढ़ की खुशहाली खेती से है, लेकिन यहां के अन्नदाता बेहाल हैं। वेलेंटाइन के दिन राजधानी रायपुर में सैकड़ों किसानों का फूलगोभी और शिमला मिर्च के साथ अनूठा प्रदर्शन यह बताने के लिए पर्याप्त है कि राज्य के किसानों की हालत कैसी है। हाड़तोड़ मेहनत के बाद भी इनके श्रम का मूल्य नहीं मिल पा रहा है। कभी प्रकृति तो कभी सरकार, किसानों के साथ छल करती रहती है।  पिछले साल प्रदेश के १३ जिलों के हजारों किसानों ने हाईब्रिड बीज मामले में धोखा खाया। २०६ टन हाईब्रिड  बीज राष्ट्रीय बीज विकास निगम से खरीदा गया था। इसे महंगे दामों पर यह कहकर किसानों को बेचा गया कि इस बीज से प्रति हेक्टेयर ६० क्ंिवटल धान का उत्पादन होगा, लेकिन पैदावार प्रति हेक्टेयर ३४ क्ंिवटल से भी कम हुई। इतनी कम उपज की वजह से किसानों की लागत भी नहीं निकल पाई। वे सालभर से मुआवजे की मांग कर रहे हैं। मामला केन्द्र राज्य के बीच अटका है। किसान इस संकट से उबर भी नहीं पाए थे कि नवम्बर-दिसम्बर माह में हुई अतिवृष्टि ने इनकी कमर फिर से तोड़ दी। बेमौसम बारिश से सैकड़ों एकड़ खेत में खड़ी धान की फसल बर्बाद हो गई। खलिहानों में रखा धान भी भीग गया। इससे उसकी गुणवत्ता प्रभावित हुई। यह खराब धान अभी तक किसानों के घर पड़ा है, इसका कोई खरीदार नहीं मिल रहा। धान की खेती के लिए किसानों ने कर्ज लेकर बीज और खाद खरीदा था। अब इसकी भरपाई कैसे होगी, अन्नदाताओं को यह चिंता सता रही है। बहरहाल, किसानों ने हिम्मत नहीं हारी। जी-जान से सब्जी की खेती की। मेहनत रंग लाई और सब्जी की बंपर पैदावार हुई। इससे आस बंधी थी कि सब्जियों की बिक्री से सिर से कर्ज का बोझ उतर जाएगा। लेकिन, यहां भी धोखा हुआ। फूलगोभी, शिमला मिर्च, टमाटर और अन्य हरी सब्जियों को जब बाजार में बेचने की बारी आई तो इनके दाम अचानक गिर गए। दो हफ्ते पहले एक फूलगोभी दस-बारह रुपए में बिक रही थी। अब इसे एक-दो रुपए में भी कोई नहीं पूछ रहा। आढ़तिए टमाटर का भाव चार रुपए किलो भी नहीं लगा रहे। भिंडी, लौकी और मूली-गाजर के भी भाव नहीं लग रहे।  किसान हैरान और परेशान हैं। सिंचाई, खाद, बीज और जुताई की लागत कैसे निकले। एक ही साल में दो- दो फसली कर्ज लद गया। इसकी चिंता में रात-दिन की नींद गायब है। 
महाराष्ट्र के एग्रीकल्चर प्रोड्यूसर मार्केट कमेटी की तरह छत्तीसगढ़ में किसानों का कोई सशक्त संगठन भी नहीं है जो सरकार को यह मजबूर करे कि वह फसलों के नुकसान की भरपाई करे या फिर कर्ज माफ हों। न ही, यहां किसानों के लिए आंध्र प्रदेश की तरह ग्रीन हाउस और कोल्ड स्टोरेज हैं , जहां हरी सब्जियों को संरक्षित रखा जा सके। राज्य में हरी सब्जियों की पैकिंग और मार्केटिंग की भी कोई व्यवस्था नहीं है कि किसान हिमाचल प्रदेश की तरह जरूरत से ज्यादा उत्पाद को अन्य राज्यों को आसानी से बेच सकें। कहने के लिए राज्य में कृषि विपणन बोर्ड है। लेकिन, यह किसानों का कितना हितैषी है, जगजाहिर है। बोर्ड को किसानों की नहीं विधायकों की चिंता है। इसीलिए वह अन्नदाता की कमाई के पैसों से माननीयों को वाशिंग मशीन और अन्य उपहार बांट रहा है। ऐसे में बेचारे किसान या तो औने-पौने दामोंं  अपने खून-पसीने की कमाई को बेचें या फिर खेतों में खड़ी फसल को सडऩे के लिए छोड़ दें। इन हालातों में किसानों के पास के मरने के अलावा कोई और विकल्प नहीं है। सरकार की उपेक्षा की वजह से ही पिछले एक साल में १८०२ किसानों ने आत्महत्या कर ली। सरकार अब भी नहीं चेती तो न जाने कितने और किसान मरने को मजबूर होंगे। सरकार किसानों की खुशहाली चाहती है तो उसे न केवल कृषि पर ज्यादा ध्यान देना होगा बल्कि, केंद्र सरकार की तर्ज पर कर्ज माफी योजना लागू करनी होगी। तभी किसानों की हालत सुधरेगी।

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