भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी के लिए बदनाम प्रदेश में गुरुजन भी रिश्वतखोरी में पीछे नहीं है। इसका ताजा उदाहरण हैं आरंग के ग्राम चपरीद के प्रभारी प्रधानपाठक। कहने के लिए प्रदेश में शिक्षा का अधिकार कानून लागू है। इसके तहत बच्चों को नि:शुल्क शिक्षा देनी है। लेकिन, विकास के नाम पर स्कूल में बच्चों से उगाही की जा रही थी। इसकी सजा हेडमास्टर को मिली। उसे निलंबित कर दिया गया। करनी की सजा मिलनी ही चाहिए, इसलिए यह कार्रवाई स्वागतयोग्य है। बशर्ते की सरकार की नीति, नीयत और कार्रवाई में फर्क न हो। क्योंकि, बड़े नेताओं व उच्चाधिकारियों को बचाने के लिए छुटभैय्ये नेताओं और छोटे कर्मियों को बलि का बकरा बनाना जगजाहिर है। प्रधानपाठक द्वारा शाला विकास शुल्क के नाम पर राशि वसूलने की घटना ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि प्रदेश में शिक्षा के मंदिरों में भी भ्रष्टाचार घुन तेजी से लगता जा रहा है। यहां शिक्षा के अधिकार अधिनियम की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। बहरहाल, सरकार के लिए कानून बनाने से ज्यादा महत्वपूर्ण कानून का पालन करवाना है। ऐसा नहीं होता तो शिक्षा के अधिकार अधिनियम 2009 में लागू होने के बावजूद हेडमास्टर धन की उगाही न करता। सवाल यह है कि आरटीई का पालन कराने के लिए सरकार के नुमाइंदे और नौकरशाह सक्रिय क्यों नहीं हैं? वे प्रत्येक स्कूल में जाकर बच्चों और अभिभावकों से वस्तुस्थिति की जानकारी क्यों नहीं लेते? जब स्कूलों पर सरकार की निगरानी नहीं होगी तो संस्था प्रमुख मनमानी तो करेंगे ही। प्रदेश के अधिकतर सरकारी और निजी स्कूलों में अवैध वसूली तो सर्वविदित है।
बहरहाल, सरकार को स्कूलों में आरटीई एक्ट का पालन कराने के लिए और भ्रष्टाचार को रोकने के लिए न केवल समय-समय पर कड़े कदम उठाने होंगे, बल्कि सतत निगरानी भी रखनी होगी। क्योंकि, ईमानदार अध्यापक ही भविष्य की नींव रखता है। यदि वह रिश्वतखोरी में लिप्त होगा तो शिक्षण संस्थानों के हजारों छात्र-छात्राओं का भविष्य अंधकार में पड़ सकता है।
बहरहाल, सरकार को स्कूलों में आरटीई एक्ट का पालन कराने के लिए और भ्रष्टाचार को रोकने के लिए न केवल समय-समय पर कड़े कदम उठाने होंगे, बल्कि सतत निगरानी भी रखनी होगी। क्योंकि, ईमानदार अध्यापक ही भविष्य की नींव रखता है। यदि वह रिश्वतखोरी में लिप्त होगा तो शिक्षण संस्थानों के हजारों छात्र-छात्राओं का भविष्य अंधकार में पड़ सकता है।