शुक्रवार, 20 जनवरी 2012

गुरुजन भी रिश्वतखोर

भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी के लिए बदनाम प्रदेश में गुरुजन भी रिश्वतखोरी में पीछे नहीं है। इसका ताजा उदाहरण हैं आरंग के ग्राम चपरीद के प्रभारी प्रधानपाठक। कहने के लिए प्रदेश में शिक्षा का अधिकार कानून लागू है। इसके तहत बच्चों को नि:शुल्क शिक्षा देनी है। लेकिन, विकास के नाम पर स्कूल में बच्चों से उगाही की जा रही थी। इसकी सजा हेडमास्टर को मिली। उसे निलंबित कर दिया गया। करनी की सजा मिलनी ही चाहिए, इसलिए यह कार्रवाई स्वागतयोग्य है। बशर्ते की सरकार की नीति, नीयत और कार्रवाई में फर्क न हो। क्योंकि, बड़े नेताओं व उच्चाधिकारियों को बचाने के लिए छुटभैय्ये नेताओं और छोटे कर्मियों को बलि का बकरा बनाना जगजाहिर है। प्रधानपाठक द्वारा शाला विकास शुल्क के नाम पर राशि वसूलने की घटना ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि प्रदेश में शिक्षा के मंदिरों में भी भ्रष्टाचार घुन तेजी से लगता जा रहा है। यहां शिक्षा के अधिकार अधिनियम की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। बहरहाल, सरकार के लिए  कानून बनाने से ज्यादा महत्वपूर्ण कानून का पालन करवाना है। ऐसा नहीं होता तो शिक्षा के अधिकार  अधिनियम 2009 में लागू होने के बावजूद हेडमास्टर धन की उगाही न करता। सवाल यह है कि आरटीई का पालन कराने के लिए सरकार के नुमाइंदे और नौकरशाह सक्रिय क्यों नहीं हैं? वे प्रत्येक स्कूल में जाकर बच्चों और अभिभावकों से वस्तुस्थिति की जानकारी क्यों नहीं लेते? जब स्कूलों पर सरकार की निगरानी नहीं होगी तो संस्था प्रमुख मनमानी तो करेंगे ही। प्रदेश के अधिकतर सरकारी और निजी स्कूलों में अवैध वसूली तो सर्वविदित है।
बहरहाल, सरकार को स्कूलों में आरटीई एक्ट का पालन कराने के लिए और भ्रष्टाचार को रोकने के लिए न केवल समय-समय पर कड़े कदम उठाने होंगे, बल्कि सतत निगरानी भी रखनी होगी। क्योंकि, ईमानदार अध्यापक ही भविष्य की नींव रखता है। यदि वह रिश्वतखोरी में लिप्त होगा तो शिक्षण संस्थानों के हजारों छात्र-छात्राओं का भविष्य अंधकार में पड़ सकता है।

नीति नहीं नीयत जरूरी

जिस बात अंदेशा था आखिर वही हो रहा है। केंद्र सरकार ने जब बड़े जोर-शोर से शिक्षा का अधिकार कानून (आरटीई) लागू करने की घोषणा की थी,तब ऐसा लगा था मानों देश में एक नए युग का सूत्रपात होगा। अमीर-गरीब सभी के बच्चों को पढ़ाई का कानूनी हक मिलेगा। कहा गया कि नामी और बड़े स्कूलों में गरीबों के बच्चे बिना फीस के पढ़ेंगे। लेकिन, यह क्या। छत्तीसगढ़ राज्य के अधिकतर निजी स्कूलों को तो पता ही नहीं कि आरटीई क्या बला है। जिन्हें कानून के बारे में मालूम है वे खुद को कानून से ऊपर समझ रहे हैं। दरअसल, राज्य में आरटीई कानून के माखौल बनने की बड़ी वजह राज्य सरकार की दिलचस्पी न होना है। शुरुआत के कुछ माह तक तो आरटीई को लेकर खूब उत्साह देखने को मिला। इसके बाद जहां केंद्रीय मंत्रालय ने संसाधनों की कमी की दुहाई देनी शुरू कर दीं वहीं, राज्य सरकार अपनी असमर्थता सिद्ध करने में जुट गई। एक्ट के लागू होने के छह माह के भीतर राज्य को आदर्श नियम बनाकर इसकी अधिसूचना जारी करनी थी, विद्यालयों में स्कूल प्रबंध समिति का निर्माण किया जाना था। लेकिन, हकीकत यह है कि साल भर बाद भी सरकार ने स्कूल मैनेजमेंट कमेटी बनाने की जहमत नहीं उठायी। जबकि, इसी कमेटी को स्कूल जाने योग्य बच्चों की पहचान, उनका नामांकन और स्कूल में बच्चों के बने रहने की जिम्मेदारी निभानी थी। यही नहीं, स्कूल विकास योजना बनाने की कवायद भी अभी तक शुरू नहीं हुई है। प्रदेश में करीब १७ लाख बच्चे ऐसे हैं, जिनका भविष्य अप्रशिक्षित शिक्षकों के हवाले है। राज्य में पहली से बारहवीं तक के करीब ८८०८ स्कूल हैं। स्कूल शिक्षा विभाग के सेटअप के अनुसार इन स्कूलों में ६१ हजार से अधिक शिक्षक होने चाहिए। लेकिन, इनमें ज्यादातर शिक्षकों के पास बीएड-डीएड की डिग्री ही नहीं है। प्रदेश के निजी स्कूलों के साथ-साथ सरकारी स्कूलों में ट्रेंड टीचर्स की काफी कमी बनी हुई है। शासन के लाख प्रयास के बावजूद प्रदेश के सरकारी स्कूलों में शिक्षक प्रतिशत ६६.४६ ही है। निजी स्कूलों की स्थिति तो इससे भी ज्यादा खराब है। दो से तीन हजार रुपए देकर १२वीं और कॉलेज उत्तीर्ण विद्यार्थियों से अध्यापन कार्य कराया जा रहा है। इस पर सरकार का किसी भी प्रकार से नियंत्रण नहीं है। हालत यह है कि स्कूल शिक्षा विभाग अभी तक निजी स्कूलों के लिए न तो आदर्श आचार संहिता बना पाया है और न ही सरकारी स्कूलों के संचालन के लिए समितियों का गठन हो सका है। इसी वजह से निजी स्कूल मनमानी फीस बढ़ा रहे हैें। निजी स्कूल संचालकों की यह दलील कि बैठकों में आरटीई कानून के पालन की तो बात होती है। लेकिन इस संबंध में कोई परिपत्र न मिलना गंभीर चिंता की बात है। सभी को शिक्षा का हक मिले इसके लिए कानून की नहीं, बल्कि उचित वातावरण की भी जरूरत है । राज्य में अभी शिक्षा का अधिकार एक नारे से अधिक कुछ नहीं है। सभी को शिक्षा मिले, इसके लिए नीति नहीं नीयत की जरूरत है। राज्य का हर बच्चा स्कूल जाए इसके लिए सरकार को अपनी प्राथमिकता समझनी होगी। इसके लिए जनता को भी सचेत होना होगा तभी 'आओ पढ़ाएं, सबको बढ़ाएं का नारा साकार होगा।

कायराना हरकत

आमामोरा की पहाडिय़ों पर नक्सलियों के बारूदी विस्फोट में एएसपी समेत दस पुलिस जवानों का शहीद हो जाना दुखद घटना है। चिंता की बात यह है कि राजधानी रायपुर से महज १६० किमी दूर शाम सात बजे के करीब हुई इस वारदात की पुष्टि पुलिस देर तक नहीं कर पाई। राज्य के अधिकारी शहीदों की संख्या और घटना के बारे में कुछ भी बताने से बचते रहे। इससे यह जाहिर होता है कि प्रदेश सरकार नक्सल अभियान के प्रति कितनी गंभीर है। पिछले तीन-चार महीनों से सरकार को यह सूचनाएं मिल रही थीं कि नक्सली एकजुट हो रहे हैं और वे किसी बड़ी वारदात को अंजाम दे सकते हैं। फिर भी सरकार ने इस ओर गंभीरता नहीं दिखाई। केरल और आंध्र प्रदेश में सक्रिय नक्सली गुटों ने राजधानी और गरियाबंद के जंगलों में बैठकें कर लीं और हमारा खुफिया तंत्र सोता रहा।  जिस तरह सौ की संख्या में एकजुट नक्सलियों ने यह वारदात की इससे साफ है कि गरियाबंद के जंगलों में इनका संजाल फैल चुका है। हाल के महीनों में नक्सली वारदात बढऩे और सुरक्षा बलों के लगातार निशाना बनने से यह सवाल उठता है कि 'आपरेशन ग्रीन हंटÓ सुरक्षा बल चला रहे हैं या फिर नक्सली ? यह जानते हुए भी कि उड़ीसा की सीमा से लगा हुआ गरियाबंद का इलाका घने जंगलों और पहाडिय़ों से घिरा हुआ है, जवानों ने सुरक्षा की अनदेखी की। पुलिस के पास ऐसी खबरें थीं की नक्सलियों ने इलाके में अपना बड़ा बेस कैंप बना रखा है और तमाम क्षेत्रों में बारूदी सुरंगों का जाल बिछा रखा है। फिर भी केवल दस जवान इस खतरनाक इलाके में गश्त करने गए। जबकि, नक्सली अभियान के तहत इन इलाकों में बिना पर्याप्त बलों के नहीं जाया जाता है। हमारे जवानों से सुरक्षा में इस तरह की चूक कोई पहली बार नहीं हुई है। ऐसे में सवाल यह  है कि आखिर हमारे सुरक्षा बल नियमों की अनदेखी क्यों करते हैं। नक्सली तो कायर हैं ही। वे न केवल जवानों पर घात लगाकर हमला करते हैं बल्कि इस बार तो उन्होंने मानवता को शर्मशार करने वाले कृत्य को भी अंजाम दिया। हर मजहब में शव को सम्मान दिया जाता है। दुश्मन देश के सैनिकों के शव के साथ भी सेनाएं बुरा सलूक नहीं करतीं। लेकिन, सामाजिक सरोकारों की वकालत करने वाले नक्सलियों का न कोई धर्म है और न मजहब। शायद इसीलिए उन्होंने जाबांज सिपाहियों को गोलियों से मारने के बाद शवों पर कुल्हाडिय़ों से भी वार किया। शव कई जगह से कटे पाए गए। नक्सलियों के इस घिनौने कृत्य से जाहिर है कि वे बढ़ती सुरक्षा चौकसी से हताश हैं। इसलिए इस तरह की घटना को अंजाम दे रहे हैं। बहरहाल, नक्सली वारदात के बाद शहीद जवानों के प्रति सरकार के नुमाइंदों का संवेदना व्यक्त करने, सैन्य अफसरों का फोर्स व अन्य साजोसामान बढ़ाने की मांग करने और विपक्ष का सरकार को कोसने मात्र से ही 'नक्सल समस्या का समाधान नहीं निकलेगा। इस घटना के बाद सरकार के नुमाइंदों और नक्सलियों से निपटने के लिए रणनीति बनाने वाले पुलिस व सेना के अफसरों को सचेत हो जाना चाहिए कि नक्सलवाद की कोई विचारधारा नहीं रह गई है।लाल आंतक के खिलाफ अब हर स्तर पर  लडऩे की जरूरत है। साथ ही नक्सलवाद से निपटने में लगे राज्यों के पुलिस बल और सुरक्षाबलों में समन्वय बनाना होगा तभी खून के प्यासों के हौसलों को पस्त किया जा सकता है।

बाघिन की मौत पर स्यापा

बाघिन की निर्मम मौत पर अब स्यापा हो रहा है। कई वन अधिकारी तो छाती पीट-पीटकर रो रहे हैं। उन्हें पछतावा है, वे बेबस बाघिन को हजारों उन्मादियों की भीड़ से बचा न सके। कुछ वन्य जीव रक्षक इसलिए घडिय़ाली आंसू बहा रहे हैं कि जाल में फंसाने के बाद भी वे उसे सही-सलामत पकड़ न सके। संरक्षित जीवों की सूची 'शेड्यूल-ए में दर्ज बाघिन की हत्या कुछ वन अधिकारियों की मौजूदगी में हुई। उन पर मौत का ठीकरा न फूटे और नौकरी पर न बन आए, इसलिए वे भी रुआंसा चेहरा बनाए बयान देते फिर रहे हैं। कह रहे हैं, बाघिन गर्भवती थी, बीमार और घायल थी। सुबह से भागते-भागते थक चुकी थी। जान बचाने के लिए दुबककर झाड़ की ओट में बैठ गई। तभी उस पर कहर टूट पड़ा। हम बेबस थे, नहीं बचा पाए। अन्य मामलों की तरह बेजुबान जीव की मौत पर भी सियासत शुरू हो गई है। भाजपा और कांग्रेस इस मौत को अपने-अपने चश्मे से देख रहे हैं, तो राज्य सरकार के दो मंत्री आपस में ही भिड़ गए हैं। मौत की आंच उनके विभाग तक न आए इसलिए आरोपों-प्रत्यारोपों का दौर शुरू हो गया है। वनमंत्री विक्रम उसेंडी कह रहे हैं कि पुलिस महकमे ने अपेक्षित सहयोग दिया होता तो आक्रोशित ग्रामीणों से बाघिन को बचाया जा सकता था। गृहमंत्री ननकीराम कंवर का बयान आया है कि वन विभाग इस मामले में निष्क्रिय था। उसने पहले से कोई सुनियोजित तैयारी नहीं की। वन अमले को जब मालूम था कि ग्रामीणों में आक्रोश है तो पर्याप्त पुलिस बल की मांग की जानी चाहिए थी। वे सीधे तौर पर वन अफसरों को मौत के लिए जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। पछतावा तो धर्मभीरु ग्रामीण जनता को भी है। पखवारे भर पहले बाघिन को भगाने और पकडऩे के लिए 'तिहारÓ मनाने वाले ग्रामीण अब मां दुर्गा की सवारी बाघ की हत्या पर बड़े पाप की आशंका से सहमे हैं। बाघिन को पकडऩे के लिए यज्ञ की सलाह देने वाले तथाकथित पंडित अब बाघिन की हत्या को गोहत्या से भी बड़ा पाप बता रहे हैं। कह रहे हैं नवरात्रि से चंद दिनों पहले बाघिन की हत्या घोर अनिष्टकारी है। कुल मिलाकर एक और यज्ञ की तैयारी है अब। तैयारी तो वन विभाग भी कर रहा है ताकि, उसके भी 'पाप धुल सकें। घटना की फिल्म देखकर आरोपियों की पहचान की जाएगी। हत्या करने वालों पर केस दर्ज होगा।
लेकिन, सवाल यह है कि बाघिन की मौत के बाद यह स्यापा क्यों? जब महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ दोनों राज्यों के वन महकमे को यह पता था कि बाघिन आदमखोर हो गई है, आबादी के पास रहने की आदी हो चुकी है तो आखिर इसके प्रबंधन की योजना क्यों नहीं बनाई गई ? सवाल तो महाराष्ट्र के वन विभाग की कार्यप्रणाली पर भी उठ रहे हैं। यहां के राष्ट्रीय पार्क की यह तीन महीने तक मेहमान थी। पिंजरे में रहने की इसे आदत हो चुकी थी। वंशवृद्वि के लिए इसे रोका गया था। आखिर यह पिंजरे से आजाद कैसे हो गई। गढ़चिरौली के ब्रह्मपुरी क्षेत्र में अप्रैल माह में किसने इस पर कुल्हाड़ी से वार किया। फिर यह कैसे पकड़ी गई और इसका तीन महीने तक इलाज चला। चिरचारी डिपो में हुई पोस्टमार्टम रिपोर्ट बताती है कि उसकी आंख के ऊपर गहरे घाव के निशान अब भी नहीं भरे थे। तब उसमें पांच टांके लगे थे। घाव अभी तरह सूखा नहीं थे। पता चला है कि उसके पेट में ट्यूमर भी था। इतनी सारी जानकारियां बाघिन की मौत के २४ घंटे के भीतर ही उजागर करने वाले अधिकारी इस बात का खुलासा क्यों नहीं कर रहे हैं कि इलाज के दौरान बाघिन भटक कैसे गई। और इसे पकडऩे के सार्थक प्रयास क्यों नहीं किए गए? प्रश्नचिन्ह तो बाघिन को रात्रि के अंधेरे में दफनाने पर भी खड़ा हो रहा है। आखिर, किस डर की आशंका से आनन-फानन में यह सब किया गया। साल भर के भीतर दो बाघों की मौत प्रदेश में वन्य प्राणियों के लचर संरक्षण की पोल खोल दी है। रिपोर्ट तो इस पर भी तलब की जानी चाहिए। 

संघ की चिंता

ऐसे समय में जब पूरे देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ एक सकारात्मक माहौल बना है, उस वक्त भाजपा शासित राज्यों में बढ़ते भ्रष्टाचार को लेकर राष्ट्रीय स्वयं संघ का चिंतित होना लाजिमी है। इसमें कोई दो राय नहीं कि राष्ट्रीय अस्मिता, सुचिता और पारदर्शी व भ्रष्टाचारमुक्त शासन का दावा करने वाली भाजपा सरकारों में भी भ्रष्टाचार का घुन अन्य सरकारों की ही तरह लग चुका है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि  सत्ता सुख में भाजपा अपना चाल-चरित्र और सांगठनिक अनुशासन धीरे-धीरे खोती जा रही है। संघ की सबसे बड़ी चिंता भी यही है। भ्रष्टाचार के मुद्दे पर पार्टी के शीर्ष नेतृत्व का जिस तरह का ढुलमुल रवैया रहा है, उससे उसका दोहरा चरित्र उजागर हो गया है। भ्रष्टाचार के मामले में महीनेभर संसद में हंगामा करने वाली पार्टी की खुद की राज्य सरकारों पर जब भ्रष्टाचार के दाग लगे तो वह बगले झांकतें नजर आयी। आकंठ भ्रष्टाचार में डूबी कर्नाटक की येदियुरप्पा सरकार को लेकर कई दिनों तक जो नाटक हुआ उसे देश की जनता ने देखा। येदि सरकार के शर्मनाक पतन के बाद अब उत्तराखंड में आसीन भाजपा सरकार के मुखिया रमेश पोखरियाल 'निशंकÓ सरकार के कुशासन और भ्रष्टाचार के खिलाफ  पार्टी में ही व्यापक असंतोष की खबरें आ रही हैं। भले ही निशंक के मीडिया मैनेजमेंट के कारण सटर्जिया जैसे बड़े घोटाले की खबर देश की मीडिया में स्थान हासिल न कर पाई हो लेकिन, इससे भाजपा मठाधीशों की नींद उड़ी है। भाजपा का शीर्ष नेतृत्व भौचक्का है कि उत्तराखंड भाजपा के कई वरिष्ठ नेता इस भ्रष्टाचार के खिलाफ  प्रदेशव्यापी खुली जंग पर उतारू हैं। सरकार और पार्टी में भ्रष्टाचार के खिलाफ  इस लड़ाई का नेतृत्व भाजपा के पूर्व सांसद रहे ले.जनरल तेजपाल सिंह रावत कर रहे हैं। पार्टी के दो वरिष्ठ नेता पूर्व मुख्यमंत्री भुवनचंद खंडूडी व भगतसिंह कोश्यारी भी पोखरियाल सरकार के भ्रष्टाचार के कृत्यों से असंतुष्ट हैं। वे दिल्ली दरबार में कई बार अपनी वेदना प्रकट कर चुके हैं। लेकिन, पार्टी कार्यकर्ता और प्रदेश की आम जनता हैरान है कि सटर्जिया सहित कई अन्य भ्रष्टाचारों में पूरी तरह से घिरी उत्तराखंड सरकार के मुखिया रमेश पोखरियाल को तलब करने के बजाय केन्द्रीय नेतृत्व न जाने किस लोभ में उनको संरक्षण देने को उतारू है। यहां स्थिति कर्नाटक से ज्यादा शर्मनाक होने के बाबजूद शायद भाजपा कर्नाटक सी फजीहत होने देने का इंतजार कर रही है। छत्तीसगढ़ की डा.रमन सरकार का भी यही हाल है। यहां के कई मंत्रियों पर भ्रष्टाचार में लिप्त होने की पुख्ता खबरों के बावजूद पार्टी का शीर्ष नेतृत्व भ्रष्ट मंत्रियों पर किसी तरह की कार्रवाई से कतरा रहा है। मध्यप्रदेश में शिवराज सरकार में भी मंत्री से संत्री तक, अधिकारी से चपरासी तक सभी भ्रष्टाचार और कालेधन की चासनी से लबरेज हैं। यही हाल भाजपा शासित अन्य राज्यों का भी है। लेकिन, पार्टी संगठन भ्रष्टाचार पर नकेल कसने के मामले में असहाय ही नजर आ रहा है। पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी को अपने ही घर में लगी आग को पहले बुझाना होगा। उन्हें यह याद रखना चाहिए कि भ्रष्टाचार का अंत राजनैतिक प्रक्रिया से ही होगा। केवल हो-हल्ला मचाने से कुछ नहीं होगा। पार्टी की साख बचानी है तो अपनी सरकारों के भ्रष्ट मंत्रियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई कर स्वच्छ प्रशासन का उदाहरण पेश करना होगा। संघ की चिंता का निदान भी इसी से होगा।

सोमवार, 16 जनवरी 2012

सीमेंट कंपनियों की मनमानी

व स्तुओं की कीमतों पर नियंत्रण रखना सरकार का काम है। लेकिन, जब यह काम जनता खुद करने लगे तो सरकार के लिए यह खतरनाक संकेत है। उसे सचेत हो जाना चाहिए। अपनी प्रशासनिक मशीनरी की समीक्षा करनी चाहिए। लेकिन, अफसोस। सत्तामद में चूर राज्य सरकार आंखें बंद किए बैठी है। दिसंबर २०१० में छत्तीसगढ़ में सीमेंट की बोरी १६०-१७५ रुपए के बीच बिक रही थी। फिर क्या हुआ कि सितंबर २०११ के बाद से एकाएक दाम बढऩे शुरू हो गए ?१८० रुपए की बोरी २१५ रुपए में बिकने लगी। अगस्त में यह २५० रुपए में जा पहुंची। डीलर्स, भू संपत्ति कारोबारी और ग्राहक चिल्लाते रहे, लेकिन कीमतें बढ़ती ही गईं। स्थिति यह हो गई कि दिसंबर,११ के अंतिम हफ्ते तक २८५ रु पए प्रति बोरी तक दाम जा पहुंंचे। भू संपत्ति कारोबार की शीर्ष संस्था नेशनल रीयल एस्टेट डेवलपमेंट काउंसिल और बिल्डरों की नियामक संस्था, क्रेडाई को भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग और राज्य सरकार से अनुरोध करना पड़ा कि वह सीमेंट कंपनियों की मनमानी पर रोक लगाए। सत्तासीन पार्टी के विधायक को भी ग्रामीणों के साथ आंदोलन करना पड़ा। लेकिन, औद्योगिक घरानों के अहसानों से दबी सरकार ने एक बार भी यह जानने की कोशिश नहीं कि आखिर सीमेेंट के दाम क्यों बढ़ रहे हैं। कंपनियों ने मुनाफा कमाने के बाद अपने हिसाब से दाम घटाए।
दरअसल, दाम घटाने और बढ़ाने के इस खेल के पीछे सीमेंट कंपनियों की सोची समझी रणनीति थी। लार्फाज, अंबुजा और एसीसी समेत अन्य कंपनियों की दिसंबर में क्लोजिंग होती है। उन्हें शेयरधारकों को दिखाना होता है कि कंपनी ने अच्छा प्रदर्शन किया है। बैलेंस शीट ठीक करने के लिए दाम बढ़ाए गए। एक बात और। अमूमन अगस्त के बाद आम ग्राहकों में सीमेंट की डिमांड अपेक्षाकृत कम हो जाती है, तब नवंबर-दिसंबर तक कंपनियां सरकारी खरीद पर निर्भर रहती हैं। इस बीच साल के बजट की राशि को खर्च करने के लिए सरकारी खरीद ज्यादा होती है। इसलिए भी दामों में बेतहाशा इजाफा होता है। क्योंकि, राशि सरकारी खजाने से खर्च होनी होती है।
  बहरहाल, सेंचुरी सीमेंट के खिलाफ ग्रामीणों की आर्थिक नाकेबंदी के बाद यह संदेश गया कि कंपनी ग्रामीणों के दबाव में दाम घटाने के लिए मजबूर हुई। जबकि, सचाई यह है कि जनवरी के पहले सप्ताह में ही सीमेंट के दाम कम से कम ५० रुपए प्रति बोरी कम हो चुके थे। रही बात कंपनी की तरफ से ग्रामीणों की मांगें मान लेने की तो, ऐसा करके कंपनी ने कोई एहसान नहीं किया। ग्राम पंचायतों में विकास कार्य के लिए बाजार भाव से २० रुपए कम पर सीमेंट उपलब्ध कराकर भी कंपनी ने कोई सहूलियत नहीं दी। यह तो पहले से तय उसकी सामाजिक जिम्मेदारी का हिस्सा है। सीएसआर के तहत विकास कार्य कराना कानूनी बाध्यता भी है। कंपनी ग्रामीणों को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराने के नाम पर बरगला रही है। वास्तविकता यह है कि सीमेंट संयंत्रों से निकलने वाले प्रदूषण की वजह से दस किमी के दायरे में आने वाले लोग अस्थमा, टीबी जैसी घातक बीमारियों के मरीज हो रहे हैं। अपनी जमीन, संसाधन और स्वास्थ्य खोने वाले ग्रामीणों का तो यह हक बनता है कि उन्हें बेहतर जीवन, अच्छा स्वास्थ्य और आजीविका की गारंटी मिले। पिछले तीन महीने में अल्ट्राटेक ने २७८ करोड़, अंबुजा ने १७६ करोड़ और सेंचुरी ने करीब ३०० करोड़ प्रदेश से कमाए हैं। पिछले पांच साल में राज्य में सीमेंट उत्पादन ८० मीट्रिक टन से बढ़कर १४० मीट्रिक टन हो गया है। महंगाई और उत्पादन लागत बढऩे के बाद भी आज कंपनियों की उत्पादन लागत १२५ रुपए प्रति बोरी पड़ रही है। इस तरह कंपनियां प्रति बोरी दोगुने से भी ज्यादा लाभ कमा रही हैं। ऐसे में यह कहना नाइंसाफी होगा कि कंपनियों ने ग्रामीणों के हित के लिए नुकसान उठाया है।