छत्तीसगढ़ के औद्योगिक शहर कोरबा, रायगढ़ व रायपुर के लाखों लोग परेशान हैं। इनमें से हजारों लोगों को आंखों में जलन, कफ, सांस लेने की बीमारी और खांसी की शिकायत है। मरीजों में बूढ़े, जवान और बच्चे सभी शामिल हैं। ये सब औद्योगिक विकास की कीमत चुका रहे हैं। वातावरण में घुली फ्लाई एश और बिजलीघरों व इस्पात संयंत्रों की चिमनियों से निकलता विषाक्त काला धुंआ संयंत्रों के आसपास के लोगों को असमय बूढ़ा और बीमार बना रहा है। किसानों का शिकायत है कि धुएं के कारण कृषि ठप हो रही है। जब से उद्योग लगे हैं, सब कुछ काला हो रहा है। खेत काले हैं। उसमें धान उगाएं तो वह भी काला ही दिखता है। घरों की खुली छतों पर बैठना मुश्किल है। सबसे ज्यादा कोरबा के धनराश, घोरापाठ, लोतलोता, छुरीखुर्द व झोरा गांव के लोगों की हालत खराब है। यहां पिछले चार-पांच दिनों से राखड़ की बारिश हो रही है। राख के गुबार से धुंध छाई है। घरों में भी जहरीला धुंआ भर गया है। ग्रामीण इसकी शिकायत कर थक चुके हैं। दुनिया भर में भले ही ग्लोबल वार्मिंग पर चिंता जताई जा रही हो लेकिन, राज्य सरकार के लिए यह कोई मुद्दा ही नहीं है। वायु प्रदूषण में कोरबा देश में नित नए रिकार्ड बना रहा है। लेकिन, राज्य के अधिकतर उद्योग धुएं में कोयले और लोहे के कण को रोकने के लिए लगाई जाने वाली मशीन इलेक्ट्रोस्टैटिक प्रेसिपिटेटर (ईएसपी) का उपयोग नहीं कर रहे हैं। लगभग सभी उद्योगों में शाम सात बजे के बाद सुबह छह -सात बजे तक ईएसपी चलता ही नहीं। सूबे का पर्यावरण संरक्षण मंडल सब कुछ जान कर भी अनजान है। अफसर और जनप्रतिनिधि उद्योगपतियों से मैनेज हैं। इसलिए प्रदूषण के शोर में गरीबों की आवाज गुम है। पूरे देश में उद्योगों के खिलाफ जितने मुकदमें नहीं हुए उससे ज्यादा अकेले छत्तीसगढ़ में दायर किए गए हैं। इसमें भी सबसे ज्यादा पर्यावरण मानकों के उल्लंघन के हैं। फिर भी सरकार बेफ्रिक है।
अकेले कोरबा शहर में इस समय साढ़े चार हजार से ज्यादा मेगावाट बिजली का उत्पादन हो रहा है। एनटीपीसी में ही करीब २६ सौ मेगावाट बिजली पैदा होती है। इसके लिए हर दिन हजारों टन कोयला जलता है। इस कोयले से काले धुएं के अलावा सफेद राख या राखड़ भी निकलती है। सिर्फ एनटीपीसी ही करीब बीस हजार मीट्रिक टन राख उत्सर्जित करती है। इस राख को इक त्र करने के लिए बड़े बांध बनाए गए हैं। एनटीपीसी संयंत्र ने धनरास में एक हजार एकड़ का राखड़ बांध बनाया है। प्रबंधन का दावा था कि यह पच्चीस साल में भरेगा। लेकिन, यह आधे समय में ही भर गया। अब तक चार बार बांध की ऊंचाई बढ़ाई जा चुकी है। आज बांध धरातल से करीब ४० मीटर ऊपर हो गया है। राख ढकी रखी रहे, इसलिए प्रबंधन संग्रहीत राखड़ को हर रोज गीला करता है। लेकिन, जैसे-जैसे धूप तेजी होती है और गरमी बढ़ती है अंधड़ चलने पर राख उड़कर आबादी वाले इलाकों में गिरती है। पूरा कोरबा शहर इस राख से ढंक जाता है। यही नहीं राख का रिसाव हसदेव नदीं में भी हो रहा है। इस राख में हेवी मेटल्स हैं और ये धीरे-धीरे जमीन के नीचे पानी में जा रहे हैं। इस प्रदूषण से विकलांग बच्चा पैदा होने से लेकर गर्भपात तक कई बीमारियां हो रही हैं। लेकिन एनटीपीसी प्रबंधन को इसकी चिंता नहीं। छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण मंडल राख के नियंत्रण के संबंध में एनटीपीसी को आए दिन चेतावनी देता है। ग्रामीण शोर मचाते हैं तो आसपास के गांवों को अन्यत्र बसाने के अलावा नए राखड़ बांध के निर्माण के प्रस्ताव की फाइल की धूल एक बार फिर साफ की जाती है। राखड़ बांध पर ज्यादा पानी की बौछार की जाती है। उधर, राखड़ की धूल जमती है। इधर, फिर फाइलों पर फिर धूल की परत मोटी होने लगती है। यह सिलसिला कई वर्षों से जारी है। एनटीपीसी ने अब तक क्षेत्र में एक हजार एकड़ से ज्यादा बंजर जमीन का टुकड़ा तैयार कर दिया है। हवा में जहरीली गैसें और ठोस कणों-जिसमें कोयला, लोहा और धूल शामिल हैं, को घोल दिया है। लगता है उसे तो उस दिन का इंतजार है जब इस जहरीली धूल की परत लोगों के हलक पर पूरी तरह जम जाएगी और वे शोर मचाना बंद कर देंगे। विकास की कीमत किसी न किसी को तो चुकानी ही होगी। गरीब, अनपढ़ ग्रामीणों और आदिवासियों की नियति शायद यही है। राज्य सरकार की चुप्पी और पर्यावरण विभाग की घालमेल की नीति से तो यही परिलक्षित हो रहा है।
अकेले कोरबा शहर में इस समय साढ़े चार हजार से ज्यादा मेगावाट बिजली का उत्पादन हो रहा है। एनटीपीसी में ही करीब २६ सौ मेगावाट बिजली पैदा होती है। इसके लिए हर दिन हजारों टन कोयला जलता है। इस कोयले से काले धुएं के अलावा सफेद राख या राखड़ भी निकलती है। सिर्फ एनटीपीसी ही करीब बीस हजार मीट्रिक टन राख उत्सर्जित करती है। इस राख को इक त्र करने के लिए बड़े बांध बनाए गए हैं। एनटीपीसी संयंत्र ने धनरास में एक हजार एकड़ का राखड़ बांध बनाया है। प्रबंधन का दावा था कि यह पच्चीस साल में भरेगा। लेकिन, यह आधे समय में ही भर गया। अब तक चार बार बांध की ऊंचाई बढ़ाई जा चुकी है। आज बांध धरातल से करीब ४० मीटर ऊपर हो गया है। राख ढकी रखी रहे, इसलिए प्रबंधन संग्रहीत राखड़ को हर रोज गीला करता है। लेकिन, जैसे-जैसे धूप तेजी होती है और गरमी बढ़ती है अंधड़ चलने पर राख उड़कर आबादी वाले इलाकों में गिरती है। पूरा कोरबा शहर इस राख से ढंक जाता है। यही नहीं राख का रिसाव हसदेव नदीं में भी हो रहा है। इस राख में हेवी मेटल्स हैं और ये धीरे-धीरे जमीन के नीचे पानी में जा रहे हैं। इस प्रदूषण से विकलांग बच्चा पैदा होने से लेकर गर्भपात तक कई बीमारियां हो रही हैं। लेकिन एनटीपीसी प्रबंधन को इसकी चिंता नहीं। छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण मंडल राख के नियंत्रण के संबंध में एनटीपीसी को आए दिन चेतावनी देता है। ग्रामीण शोर मचाते हैं तो आसपास के गांवों को अन्यत्र बसाने के अलावा नए राखड़ बांध के निर्माण के प्रस्ताव की फाइल की धूल एक बार फिर साफ की जाती है। राखड़ बांध पर ज्यादा पानी की बौछार की जाती है। उधर, राखड़ की धूल जमती है। इधर, फिर फाइलों पर फिर धूल की परत मोटी होने लगती है। यह सिलसिला कई वर्षों से जारी है। एनटीपीसी ने अब तक क्षेत्र में एक हजार एकड़ से ज्यादा बंजर जमीन का टुकड़ा तैयार कर दिया है। हवा में जहरीली गैसें और ठोस कणों-जिसमें कोयला, लोहा और धूल शामिल हैं, को घोल दिया है। लगता है उसे तो उस दिन का इंतजार है जब इस जहरीली धूल की परत लोगों के हलक पर पूरी तरह जम जाएगी और वे शोर मचाना बंद कर देंगे। विकास की कीमत किसी न किसी को तो चुकानी ही होगी। गरीब, अनपढ़ ग्रामीणों और आदिवासियों की नियति शायद यही है। राज्य सरकार की चुप्पी और पर्यावरण विभाग की घालमेल की नीति से तो यही परिलक्षित हो रहा है।
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