बुधवार, 15 फ़रवरी 2012

चाउर वाले बाबा के सामने चुनौतियां

पिछले सात-आठ महीनों से विश्व समुदाय खाद्य सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे पर गंभीरता से मंथन कर रहा है। दुनिया के गरीब देश धनी देशों से अपील कर रहे हैं कि वे गरीबों की भोजन व्यवस्था पर ध्यान दें। अभी हाल ही में दुनिया के अल्प विकसित देशों के नई दिल्ली में हुए सम्मेलन में भी गरीब देशों के लिए जारी घोषणा -पत्र मेंं खाद्य सुरक्षा का प्रमुखता से जिक्र किया गया है। उधर, केन्द्र सरकार भी खाद्य सुरक्षा विधेयक लाने की तैयारी में है, ताकि देश के गरीबों को भरपेट भोजन मिल सके। सब कुछ ठीक रहा तो जल्द ही संप्रग सरकार इस बिल को संसद में पेश करेगी। विधेयक के कानून बन जाने के बाद देश की सत्तर प्रतिशत जनता को सस्ते दाम पर अनाज मिल सकेगा।
इन कवायदों के बीच छत्तीसगढ़ सरकार ने कुपोषण से मुक्ति के लिए जो पहल की है, वह काबिले तारीफ है। प्रदेश के36 लाख गरीब परिवारों को हर माह एकरुपए किलो चावल बंटवाने वाले 'चाउर वाले बाबाÓ अब आदिवासियों और गरीबों को सस्ती दर पर अगले महीने से देशी चना बंटवाने जा रहे हैं। मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह की योजना सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के तहत प्रदेश की राशन दुकानों से गरीबी रेखा के नीचे जीवन-यापन करने वाले हर परिवार को पांच रुपए में एक किलो चना देने की है। सरकार खुले बाजार से ३० रुपए प्रति किलो के हिसाब से चना खरीदेगी और इसमें अपनी ओर से २५ रुपए प्रति किलो की सब्सिडी देगी। यह योजना फिलहाल राज्य के सबसे पिछड़े इलाके बस्तर संभाग में लागू होने जा रही है। इससे क्षेत्र के लगभग पांच लाख परिवारों को लाभ मिलेगा। उधर, केंद्र सरकार भी गरीबी रेखा के नीचे जीवन-यापन करने वाले बीपीएल परिवारों को हर महीने ३५ किलो अनाज अलग से बांट रही है। इसके  तहत गेहंू ४.१५ रुपए प्रति किलो के भाव से मिलता है। जबकि, राज्य सरकार बीपीएल कार्डधारकों को प्रतिमाह एक रुपए की दर से 35 किलो चावल दे रही है। यह अच्छी बात है। लेकिन, इन सहूलियतों के बाद भी भुखमरी और गरीबी कम नहीं हो रही। भूख से मरने वालों का सिलसिला जारी है और राशन के गेहू़ं, चावल में भी लूटखसोट बढ़ती ही जा रही है। वोट बैंक और सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के चक्कर में सरकारें चावल, चना तो बंटवा देती हैं, लेकिन सब्सिडी का पूरा खाद्यान्न सही तरीके से गरीबों को नहीं मिलता। जिन्हें सब्सिडी का गेहंू, चीनी, चावल और केरोसिन चाहिए उनके पास राशन कार्ड ही नहीं हैं। यदि राशन कार्ड है तो राशन की दुकानें ही नहीं खुलतीं। गरीबों के राशन उठाने से पहले ही शक्कर, केरोसिन धन्नासेठों के गोदामों में चला जाता है। इस तरफ सरकारों का ध्यान नहीं है। राज्य में चावल वितरण में भारी भ्रष्टाचार हो रहा है। बताया जाता है कि पिछले साल अकेले बस्तर संभाग में ही सब्सिडी का 50 करोड़ रुपए का चावल राशन दुकानों को भेजा गया, लेकिन यह चावल धमतरी और जगदलपुर के राइस मिलों में खप गया। यह स्थिति केवल छत्तीसगढ़ की है, ऐसा नहीं है। देशभर में सार्वजनिक वितरण प्रणाली में भ्रष्टाचार हावी है। इसका खुलासा उच्चतम न्यायालय द्वारा नियुक्त सतर्कता समिति भी कर चुकी है। केंद्र सरकार सार्वजनिक वितरण प्रणाली में सब्सिडी पर सालाना 28000 करोड़ रुपए से ज्यादा की राशि खर्च करती है। पर वास्तव में यह पैसा कुछ अनुचित लोगों की जेब में चला जाता है। यही हाल राज्य सरकारों द्वारा दी जाने वाली सब्सिडी का भी है। बहरहाल, छत्तीसगढ़ की सार्वजनिक वितरण प्रणाली देशभर में एक प्रेरणादायक मिसाल के रूप में देखी जा रही है। ऐसे में रमन सरकार के लिए यह चुनौती है कि वह सब्सिडी के राशन को बिचौलियों के हाथों से बचाकर वास्तविक गरीबों तक पहुंचाने की व्यवस्था करें। गरीबी से जूझ रही जनता को तभी खाद्य सुरक्षा  सुनिश्चित हो सकेगी। यदि ऐसा हुआ तो चाउर वाले बाबा को चना-चबैना वाले बाबा की उपाधि मिलते देर न लगेगी।

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