ऐसे समय में जब पूरे देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ एक सकारात्मक माहौल बना है, उस वक्त भाजपा शासित राज्यों में बढ़ते भ्रष्टाचार को लेकर राष्ट्रीय स्वयं संघ का चिंतित होना लाजिमी है। इसमें कोई दो राय नहीं कि राष्ट्रीय अस्मिता, सुचिता और पारदर्शी व भ्रष्टाचारमुक्त शासन का दावा करने वाली भाजपा सरकारों में भी भ्रष्टाचार का घुन अन्य सरकारों की ही तरह लग चुका है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि सत्ता सुख में भाजपा अपना चाल-चरित्र और सांगठनिक अनुशासन धीरे-धीरे खोती जा रही है। संघ की सबसे बड़ी चिंता भी यही है। भ्रष्टाचार के मुद्दे पर पार्टी के शीर्ष नेतृत्व का जिस तरह का ढुलमुल रवैया रहा है, उससे उसका दोहरा चरित्र उजागर हो गया है। भ्रष्टाचार के मामले में महीनेभर संसद में हंगामा करने वाली पार्टी की खुद की राज्य सरकारों पर जब भ्रष्टाचार के दाग लगे तो वह बगले झांकतें नजर आयी। आकंठ भ्रष्टाचार में डूबी कर्नाटक की येदियुरप्पा सरकार को लेकर कई दिनों तक जो नाटक हुआ उसे देश की जनता ने देखा। येदि सरकार के शर्मनाक पतन के बाद अब उत्तराखंड में आसीन भाजपा सरकार के मुखिया रमेश पोखरियाल 'निशंकÓ सरकार के कुशासन और भ्रष्टाचार के खिलाफ पार्टी में ही व्यापक असंतोष की खबरें आ रही हैं। भले ही निशंक के मीडिया मैनेजमेंट के कारण सटर्जिया जैसे बड़े घोटाले की खबर देश की मीडिया में स्थान हासिल न कर पाई हो लेकिन, इससे भाजपा मठाधीशों की नींद उड़ी है। भाजपा का शीर्ष नेतृत्व भौचक्का है कि उत्तराखंड भाजपा के कई वरिष्ठ नेता इस भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रदेशव्यापी खुली जंग पर उतारू हैं। सरकार और पार्टी में भ्रष्टाचार के खिलाफ इस लड़ाई का नेतृत्व भाजपा के पूर्व सांसद रहे ले.जनरल तेजपाल सिंह रावत कर रहे हैं। पार्टी के दो वरिष्ठ नेता पूर्व मुख्यमंत्री भुवनचंद खंडूडी व भगतसिंह कोश्यारी भी पोखरियाल सरकार के भ्रष्टाचार के कृत्यों से असंतुष्ट हैं। वे दिल्ली दरबार में कई बार अपनी वेदना प्रकट कर चुके हैं। लेकिन, पार्टी कार्यकर्ता और प्रदेश की आम जनता हैरान है कि सटर्जिया सहित कई अन्य भ्रष्टाचारों में पूरी तरह से घिरी उत्तराखंड सरकार के मुखिया रमेश पोखरियाल को तलब करने के बजाय केन्द्रीय नेतृत्व न जाने किस लोभ में उनको संरक्षण देने को उतारू है। यहां स्थिति कर्नाटक से ज्यादा शर्मनाक होने के बाबजूद शायद भाजपा कर्नाटक सी फजीहत होने देने का इंतजार कर रही है। छत्तीसगढ़ की डा.रमन सरकार का भी यही हाल है। यहां के कई मंत्रियों पर भ्रष्टाचार में लिप्त होने की पुख्ता खबरों के बावजूद पार्टी का शीर्ष नेतृत्व भ्रष्ट मंत्रियों पर किसी तरह की कार्रवाई से कतरा रहा है। मध्यप्रदेश में शिवराज सरकार में भी मंत्री से संत्री तक, अधिकारी से चपरासी तक सभी भ्रष्टाचार और कालेधन की चासनी से लबरेज हैं। यही हाल भाजपा शासित अन्य राज्यों का भी है। लेकिन, पार्टी संगठन भ्रष्टाचार पर नकेल कसने के मामले में असहाय ही नजर आ रहा है। पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी को अपने ही घर में लगी आग को पहले बुझाना होगा। उन्हें यह याद रखना चाहिए कि भ्रष्टाचार का अंत राजनैतिक प्रक्रिया से ही होगा। केवल हो-हल्ला मचाने से कुछ नहीं होगा। पार्टी की साख बचानी है तो अपनी सरकारों के भ्रष्ट मंत्रियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई कर स्वच्छ प्रशासन का उदाहरण पेश करना होगा। संघ की चिंता का निदान भी इसी से होगा।
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