शुक्रवार, 20 जनवरी 2012

नीति नहीं नीयत जरूरी

जिस बात अंदेशा था आखिर वही हो रहा है। केंद्र सरकार ने जब बड़े जोर-शोर से शिक्षा का अधिकार कानून (आरटीई) लागू करने की घोषणा की थी,तब ऐसा लगा था मानों देश में एक नए युग का सूत्रपात होगा। अमीर-गरीब सभी के बच्चों को पढ़ाई का कानूनी हक मिलेगा। कहा गया कि नामी और बड़े स्कूलों में गरीबों के बच्चे बिना फीस के पढ़ेंगे। लेकिन, यह क्या। छत्तीसगढ़ राज्य के अधिकतर निजी स्कूलों को तो पता ही नहीं कि आरटीई क्या बला है। जिन्हें कानून के बारे में मालूम है वे खुद को कानून से ऊपर समझ रहे हैं। दरअसल, राज्य में आरटीई कानून के माखौल बनने की बड़ी वजह राज्य सरकार की दिलचस्पी न होना है। शुरुआत के कुछ माह तक तो आरटीई को लेकर खूब उत्साह देखने को मिला। इसके बाद जहां केंद्रीय मंत्रालय ने संसाधनों की कमी की दुहाई देनी शुरू कर दीं वहीं, राज्य सरकार अपनी असमर्थता सिद्ध करने में जुट गई। एक्ट के लागू होने के छह माह के भीतर राज्य को आदर्श नियम बनाकर इसकी अधिसूचना जारी करनी थी, विद्यालयों में स्कूल प्रबंध समिति का निर्माण किया जाना था। लेकिन, हकीकत यह है कि साल भर बाद भी सरकार ने स्कूल मैनेजमेंट कमेटी बनाने की जहमत नहीं उठायी। जबकि, इसी कमेटी को स्कूल जाने योग्य बच्चों की पहचान, उनका नामांकन और स्कूल में बच्चों के बने रहने की जिम्मेदारी निभानी थी। यही नहीं, स्कूल विकास योजना बनाने की कवायद भी अभी तक शुरू नहीं हुई है। प्रदेश में करीब १७ लाख बच्चे ऐसे हैं, जिनका भविष्य अप्रशिक्षित शिक्षकों के हवाले है। राज्य में पहली से बारहवीं तक के करीब ८८०८ स्कूल हैं। स्कूल शिक्षा विभाग के सेटअप के अनुसार इन स्कूलों में ६१ हजार से अधिक शिक्षक होने चाहिए। लेकिन, इनमें ज्यादातर शिक्षकों के पास बीएड-डीएड की डिग्री ही नहीं है। प्रदेश के निजी स्कूलों के साथ-साथ सरकारी स्कूलों में ट्रेंड टीचर्स की काफी कमी बनी हुई है। शासन के लाख प्रयास के बावजूद प्रदेश के सरकारी स्कूलों में शिक्षक प्रतिशत ६६.४६ ही है। निजी स्कूलों की स्थिति तो इससे भी ज्यादा खराब है। दो से तीन हजार रुपए देकर १२वीं और कॉलेज उत्तीर्ण विद्यार्थियों से अध्यापन कार्य कराया जा रहा है। इस पर सरकार का किसी भी प्रकार से नियंत्रण नहीं है। हालत यह है कि स्कूल शिक्षा विभाग अभी तक निजी स्कूलों के लिए न तो आदर्श आचार संहिता बना पाया है और न ही सरकारी स्कूलों के संचालन के लिए समितियों का गठन हो सका है। इसी वजह से निजी स्कूल मनमानी फीस बढ़ा रहे हैें। निजी स्कूल संचालकों की यह दलील कि बैठकों में आरटीई कानून के पालन की तो बात होती है। लेकिन इस संबंध में कोई परिपत्र न मिलना गंभीर चिंता की बात है। सभी को शिक्षा का हक मिले इसके लिए कानून की नहीं, बल्कि उचित वातावरण की भी जरूरत है । राज्य में अभी शिक्षा का अधिकार एक नारे से अधिक कुछ नहीं है। सभी को शिक्षा मिले, इसके लिए नीति नहीं नीयत की जरूरत है। राज्य का हर बच्चा स्कूल जाए इसके लिए सरकार को अपनी प्राथमिकता समझनी होगी। इसके लिए जनता को भी सचेत होना होगा तभी 'आओ पढ़ाएं, सबको बढ़ाएं का नारा साकार होगा।

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