बाघिन की निर्मम मौत पर अब स्यापा हो रहा है। कई वन अधिकारी तो छाती पीट-पीटकर रो रहे हैं। उन्हें पछतावा है, वे बेबस बाघिन को हजारों उन्मादियों की भीड़ से बचा न सके। कुछ वन्य जीव रक्षक इसलिए घडिय़ाली आंसू बहा रहे हैं कि जाल में फंसाने के बाद भी वे उसे सही-सलामत पकड़ न सके। संरक्षित जीवों की सूची 'शेड्यूल-ए में दर्ज बाघिन की हत्या कुछ वन अधिकारियों की मौजूदगी में हुई। उन पर मौत का ठीकरा न फूटे और नौकरी पर न बन आए, इसलिए वे भी रुआंसा चेहरा बनाए बयान देते फिर रहे हैं। कह रहे हैं, बाघिन गर्भवती थी, बीमार और घायल थी। सुबह से भागते-भागते थक चुकी थी। जान बचाने के लिए दुबककर झाड़ की ओट में बैठ गई। तभी उस पर कहर टूट पड़ा। हम बेबस थे, नहीं बचा पाए। अन्य मामलों की तरह बेजुबान जीव की मौत पर भी सियासत शुरू हो गई है। भाजपा और कांग्रेस इस मौत को अपने-अपने चश्मे से देख रहे हैं, तो राज्य सरकार के दो मंत्री आपस में ही भिड़ गए हैं। मौत की आंच उनके विभाग तक न आए इसलिए आरोपों-प्रत्यारोपों का दौर शुरू हो गया है। वनमंत्री विक्रम उसेंडी कह रहे हैं कि पुलिस महकमे ने अपेक्षित सहयोग दिया होता तो आक्रोशित ग्रामीणों से बाघिन को बचाया जा सकता था। गृहमंत्री ननकीराम कंवर का बयान आया है कि वन विभाग इस मामले में निष्क्रिय था। उसने पहले से कोई सुनियोजित तैयारी नहीं की। वन अमले को जब मालूम था कि ग्रामीणों में आक्रोश है तो पर्याप्त पुलिस बल की मांग की जानी चाहिए थी। वे सीधे तौर पर वन अफसरों को मौत के लिए जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। पछतावा तो धर्मभीरु ग्रामीण जनता को भी है। पखवारे भर पहले बाघिन को भगाने और पकडऩे के लिए 'तिहारÓ मनाने वाले ग्रामीण अब मां दुर्गा की सवारी बाघ की हत्या पर बड़े पाप की आशंका से सहमे हैं। बाघिन को पकडऩे के लिए यज्ञ की सलाह देने वाले तथाकथित पंडित अब बाघिन की हत्या को गोहत्या से भी बड़ा पाप बता रहे हैं। कह रहे हैं नवरात्रि से चंद दिनों पहले बाघिन की हत्या घोर अनिष्टकारी है। कुल मिलाकर एक और यज्ञ की तैयारी है अब। तैयारी तो वन विभाग भी कर रहा है ताकि, उसके भी 'पाप धुल सकें। घटना की फिल्म देखकर आरोपियों की पहचान की जाएगी। हत्या करने वालों पर केस दर्ज होगा।
लेकिन, सवाल यह है कि बाघिन की मौत के बाद यह स्यापा क्यों? जब महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ दोनों राज्यों के वन महकमे को यह पता था कि बाघिन आदमखोर हो गई है, आबादी के पास रहने की आदी हो चुकी है तो आखिर इसके प्रबंधन की योजना क्यों नहीं बनाई गई ? सवाल तो महाराष्ट्र के वन विभाग की कार्यप्रणाली पर भी उठ रहे हैं। यहां के राष्ट्रीय पार्क की यह तीन महीने तक मेहमान थी। पिंजरे में रहने की इसे आदत हो चुकी थी। वंशवृद्वि के लिए इसे रोका गया था। आखिर यह पिंजरे से आजाद कैसे हो गई। गढ़चिरौली के ब्रह्मपुरी क्षेत्र में अप्रैल माह में किसने इस पर कुल्हाड़ी से वार किया। फिर यह कैसे पकड़ी गई और इसका तीन महीने तक इलाज चला। चिरचारी डिपो में हुई पोस्टमार्टम रिपोर्ट बताती है कि उसकी आंख के ऊपर गहरे घाव के निशान अब भी नहीं भरे थे। तब उसमें पांच टांके लगे थे। घाव अभी तरह सूखा नहीं थे। पता चला है कि उसके पेट में ट्यूमर भी था। इतनी सारी जानकारियां बाघिन की मौत के २४ घंटे के भीतर ही उजागर करने वाले अधिकारी इस बात का खुलासा क्यों नहीं कर रहे हैं कि इलाज के दौरान बाघिन भटक कैसे गई। और इसे पकडऩे के सार्थक प्रयास क्यों नहीं किए गए? प्रश्नचिन्ह तो बाघिन को रात्रि के अंधेरे में दफनाने पर भी खड़ा हो रहा है। आखिर, किस डर की आशंका से आनन-फानन में यह सब किया गया। साल भर के भीतर दो बाघों की मौत प्रदेश में वन्य प्राणियों के लचर संरक्षण की पोल खोल दी है। रिपोर्ट तो इस पर भी तलब की जानी चाहिए।
लेकिन, सवाल यह है कि बाघिन की मौत के बाद यह स्यापा क्यों? जब महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ दोनों राज्यों के वन महकमे को यह पता था कि बाघिन आदमखोर हो गई है, आबादी के पास रहने की आदी हो चुकी है तो आखिर इसके प्रबंधन की योजना क्यों नहीं बनाई गई ? सवाल तो महाराष्ट्र के वन विभाग की कार्यप्रणाली पर भी उठ रहे हैं। यहां के राष्ट्रीय पार्क की यह तीन महीने तक मेहमान थी। पिंजरे में रहने की इसे आदत हो चुकी थी। वंशवृद्वि के लिए इसे रोका गया था। आखिर यह पिंजरे से आजाद कैसे हो गई। गढ़चिरौली के ब्रह्मपुरी क्षेत्र में अप्रैल माह में किसने इस पर कुल्हाड़ी से वार किया। फिर यह कैसे पकड़ी गई और इसका तीन महीने तक इलाज चला। चिरचारी डिपो में हुई पोस्टमार्टम रिपोर्ट बताती है कि उसकी आंख के ऊपर गहरे घाव के निशान अब भी नहीं भरे थे। तब उसमें पांच टांके लगे थे। घाव अभी तरह सूखा नहीं थे। पता चला है कि उसके पेट में ट्यूमर भी था। इतनी सारी जानकारियां बाघिन की मौत के २४ घंटे के भीतर ही उजागर करने वाले अधिकारी इस बात का खुलासा क्यों नहीं कर रहे हैं कि इलाज के दौरान बाघिन भटक कैसे गई। और इसे पकडऩे के सार्थक प्रयास क्यों नहीं किए गए? प्रश्नचिन्ह तो बाघिन को रात्रि के अंधेरे में दफनाने पर भी खड़ा हो रहा है। आखिर, किस डर की आशंका से आनन-फानन में यह सब किया गया। साल भर के भीतर दो बाघों की मौत प्रदेश में वन्य प्राणियों के लचर संरक्षण की पोल खोल दी है। रिपोर्ट तो इस पर भी तलब की जानी चाहिए।
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