शुक्रवार, 20 जनवरी 2012

कायराना हरकत

आमामोरा की पहाडिय़ों पर नक्सलियों के बारूदी विस्फोट में एएसपी समेत दस पुलिस जवानों का शहीद हो जाना दुखद घटना है। चिंता की बात यह है कि राजधानी रायपुर से महज १६० किमी दूर शाम सात बजे के करीब हुई इस वारदात की पुष्टि पुलिस देर तक नहीं कर पाई। राज्य के अधिकारी शहीदों की संख्या और घटना के बारे में कुछ भी बताने से बचते रहे। इससे यह जाहिर होता है कि प्रदेश सरकार नक्सल अभियान के प्रति कितनी गंभीर है। पिछले तीन-चार महीनों से सरकार को यह सूचनाएं मिल रही थीं कि नक्सली एकजुट हो रहे हैं और वे किसी बड़ी वारदात को अंजाम दे सकते हैं। फिर भी सरकार ने इस ओर गंभीरता नहीं दिखाई। केरल और आंध्र प्रदेश में सक्रिय नक्सली गुटों ने राजधानी और गरियाबंद के जंगलों में बैठकें कर लीं और हमारा खुफिया तंत्र सोता रहा।  जिस तरह सौ की संख्या में एकजुट नक्सलियों ने यह वारदात की इससे साफ है कि गरियाबंद के जंगलों में इनका संजाल फैल चुका है। हाल के महीनों में नक्सली वारदात बढऩे और सुरक्षा बलों के लगातार निशाना बनने से यह सवाल उठता है कि 'आपरेशन ग्रीन हंटÓ सुरक्षा बल चला रहे हैं या फिर नक्सली ? यह जानते हुए भी कि उड़ीसा की सीमा से लगा हुआ गरियाबंद का इलाका घने जंगलों और पहाडिय़ों से घिरा हुआ है, जवानों ने सुरक्षा की अनदेखी की। पुलिस के पास ऐसी खबरें थीं की नक्सलियों ने इलाके में अपना बड़ा बेस कैंप बना रखा है और तमाम क्षेत्रों में बारूदी सुरंगों का जाल बिछा रखा है। फिर भी केवल दस जवान इस खतरनाक इलाके में गश्त करने गए। जबकि, नक्सली अभियान के तहत इन इलाकों में बिना पर्याप्त बलों के नहीं जाया जाता है। हमारे जवानों से सुरक्षा में इस तरह की चूक कोई पहली बार नहीं हुई है। ऐसे में सवाल यह  है कि आखिर हमारे सुरक्षा बल नियमों की अनदेखी क्यों करते हैं। नक्सली तो कायर हैं ही। वे न केवल जवानों पर घात लगाकर हमला करते हैं बल्कि इस बार तो उन्होंने मानवता को शर्मशार करने वाले कृत्य को भी अंजाम दिया। हर मजहब में शव को सम्मान दिया जाता है। दुश्मन देश के सैनिकों के शव के साथ भी सेनाएं बुरा सलूक नहीं करतीं। लेकिन, सामाजिक सरोकारों की वकालत करने वाले नक्सलियों का न कोई धर्म है और न मजहब। शायद इसीलिए उन्होंने जाबांज सिपाहियों को गोलियों से मारने के बाद शवों पर कुल्हाडिय़ों से भी वार किया। शव कई जगह से कटे पाए गए। नक्सलियों के इस घिनौने कृत्य से जाहिर है कि वे बढ़ती सुरक्षा चौकसी से हताश हैं। इसलिए इस तरह की घटना को अंजाम दे रहे हैं। बहरहाल, नक्सली वारदात के बाद शहीद जवानों के प्रति सरकार के नुमाइंदों का संवेदना व्यक्त करने, सैन्य अफसरों का फोर्स व अन्य साजोसामान बढ़ाने की मांग करने और विपक्ष का सरकार को कोसने मात्र से ही 'नक्सल समस्या का समाधान नहीं निकलेगा। इस घटना के बाद सरकार के नुमाइंदों और नक्सलियों से निपटने के लिए रणनीति बनाने वाले पुलिस व सेना के अफसरों को सचेत हो जाना चाहिए कि नक्सलवाद की कोई विचारधारा नहीं रह गई है।लाल आंतक के खिलाफ अब हर स्तर पर  लडऩे की जरूरत है। साथ ही नक्सलवाद से निपटने में लगे राज्यों के पुलिस बल और सुरक्षाबलों में समन्वय बनाना होगा तभी खून के प्यासों के हौसलों को पस्त किया जा सकता है।

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