व स्तुओं की कीमतों पर नियंत्रण रखना सरकार का काम है। लेकिन, जब यह काम जनता खुद करने लगे तो सरकार के लिए यह खतरनाक संकेत है। उसे सचेत हो जाना चाहिए। अपनी प्रशासनिक मशीनरी की समीक्षा करनी चाहिए। लेकिन, अफसोस। सत्तामद में चूर राज्य सरकार आंखें बंद किए बैठी है। दिसंबर २०१० में छत्तीसगढ़ में सीमेंट की बोरी १६०-१७५ रुपए के बीच बिक रही थी। फिर क्या हुआ कि सितंबर २०११ के बाद से एकाएक दाम बढऩे शुरू हो गए ?१८० रुपए की बोरी २१५ रुपए में बिकने लगी। अगस्त में यह २५० रुपए में जा पहुंची। डीलर्स, भू संपत्ति कारोबारी और ग्राहक चिल्लाते रहे, लेकिन कीमतें बढ़ती ही गईं। स्थिति यह हो गई कि दिसंबर,११ के अंतिम हफ्ते तक २८५ रु पए प्रति बोरी तक दाम जा पहुंंचे। भू संपत्ति कारोबार की शीर्ष संस्था नेशनल रीयल एस्टेट डेवलपमेंट काउंसिल और बिल्डरों की नियामक संस्था, क्रेडाई को भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग और राज्य सरकार से अनुरोध करना पड़ा कि वह सीमेंट कंपनियों की मनमानी पर रोक लगाए। सत्तासीन पार्टी के विधायक को भी ग्रामीणों के साथ आंदोलन करना पड़ा। लेकिन, औद्योगिक घरानों के अहसानों से दबी सरकार ने एक बार भी यह जानने की कोशिश नहीं कि आखिर सीमेेंट के दाम क्यों बढ़ रहे हैं। कंपनियों ने मुनाफा कमाने के बाद अपने हिसाब से दाम घटाए।
दरअसल, दाम घटाने और बढ़ाने के इस खेल के पीछे सीमेंट कंपनियों की सोची समझी रणनीति थी। लार्फाज, अंबुजा और एसीसी समेत अन्य कंपनियों की दिसंबर में क्लोजिंग होती है। उन्हें शेयरधारकों को दिखाना होता है कि कंपनी ने अच्छा प्रदर्शन किया है। बैलेंस शीट ठीक करने के लिए दाम बढ़ाए गए। एक बात और। अमूमन अगस्त के बाद आम ग्राहकों में सीमेंट की डिमांड अपेक्षाकृत कम हो जाती है, तब नवंबर-दिसंबर तक कंपनियां सरकारी खरीद पर निर्भर रहती हैं। इस बीच साल के बजट की राशि को खर्च करने के लिए सरकारी खरीद ज्यादा होती है। इसलिए भी दामों में बेतहाशा इजाफा होता है। क्योंकि, राशि सरकारी खजाने से खर्च होनी होती है।
बहरहाल, सेंचुरी सीमेंट के खिलाफ ग्रामीणों की आर्थिक नाकेबंदी के बाद यह संदेश गया कि कंपनी ग्रामीणों के दबाव में दाम घटाने के लिए मजबूर हुई। जबकि, सचाई यह है कि जनवरी के पहले सप्ताह में ही सीमेंट के दाम कम से कम ५० रुपए प्रति बोरी कम हो चुके थे। रही बात कंपनी की तरफ से ग्रामीणों की मांगें मान लेने की तो, ऐसा करके कंपनी ने कोई एहसान नहीं किया। ग्राम पंचायतों में विकास कार्य के लिए बाजार भाव से २० रुपए कम पर सीमेंट उपलब्ध कराकर भी कंपनी ने कोई सहूलियत नहीं दी। यह तो पहले से तय उसकी सामाजिक जिम्मेदारी का हिस्सा है। सीएसआर के तहत विकास कार्य कराना कानूनी बाध्यता भी है। कंपनी ग्रामीणों को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराने के नाम पर बरगला रही है। वास्तविकता यह है कि सीमेंट संयंत्रों से निकलने वाले प्रदूषण की वजह से दस किमी के दायरे में आने वाले लोग अस्थमा, टीबी जैसी घातक बीमारियों के मरीज हो रहे हैं। अपनी जमीन, संसाधन और स्वास्थ्य खोने वाले ग्रामीणों का तो यह हक बनता है कि उन्हें बेहतर जीवन, अच्छा स्वास्थ्य और आजीविका की गारंटी मिले। पिछले तीन महीने में अल्ट्राटेक ने २७८ करोड़, अंबुजा ने १७६ करोड़ और सेंचुरी ने करीब ३०० करोड़ प्रदेश से कमाए हैं। पिछले पांच साल में राज्य में सीमेंट उत्पादन ८० मीट्रिक टन से बढ़कर १४० मीट्रिक टन हो गया है। महंगाई और उत्पादन लागत बढऩे के बाद भी आज कंपनियों की उत्पादन लागत १२५ रुपए प्रति बोरी पड़ रही है। इस तरह कंपनियां प्रति बोरी दोगुने से भी ज्यादा लाभ कमा रही हैं। ऐसे में यह कहना नाइंसाफी होगा कि कंपनियों ने ग्रामीणों के हित के लिए नुकसान उठाया है।
दरअसल, दाम घटाने और बढ़ाने के इस खेल के पीछे सीमेंट कंपनियों की सोची समझी रणनीति थी। लार्फाज, अंबुजा और एसीसी समेत अन्य कंपनियों की दिसंबर में क्लोजिंग होती है। उन्हें शेयरधारकों को दिखाना होता है कि कंपनी ने अच्छा प्रदर्शन किया है। बैलेंस शीट ठीक करने के लिए दाम बढ़ाए गए। एक बात और। अमूमन अगस्त के बाद आम ग्राहकों में सीमेंट की डिमांड अपेक्षाकृत कम हो जाती है, तब नवंबर-दिसंबर तक कंपनियां सरकारी खरीद पर निर्भर रहती हैं। इस बीच साल के बजट की राशि को खर्च करने के लिए सरकारी खरीद ज्यादा होती है। इसलिए भी दामों में बेतहाशा इजाफा होता है। क्योंकि, राशि सरकारी खजाने से खर्च होनी होती है।
बहरहाल, सेंचुरी सीमेंट के खिलाफ ग्रामीणों की आर्थिक नाकेबंदी के बाद यह संदेश गया कि कंपनी ग्रामीणों के दबाव में दाम घटाने के लिए मजबूर हुई। जबकि, सचाई यह है कि जनवरी के पहले सप्ताह में ही सीमेंट के दाम कम से कम ५० रुपए प्रति बोरी कम हो चुके थे। रही बात कंपनी की तरफ से ग्रामीणों की मांगें मान लेने की तो, ऐसा करके कंपनी ने कोई एहसान नहीं किया। ग्राम पंचायतों में विकास कार्य के लिए बाजार भाव से २० रुपए कम पर सीमेंट उपलब्ध कराकर भी कंपनी ने कोई सहूलियत नहीं दी। यह तो पहले से तय उसकी सामाजिक जिम्मेदारी का हिस्सा है। सीएसआर के तहत विकास कार्य कराना कानूनी बाध्यता भी है। कंपनी ग्रामीणों को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराने के नाम पर बरगला रही है। वास्तविकता यह है कि सीमेंट संयंत्रों से निकलने वाले प्रदूषण की वजह से दस किमी के दायरे में आने वाले लोग अस्थमा, टीबी जैसी घातक बीमारियों के मरीज हो रहे हैं। अपनी जमीन, संसाधन और स्वास्थ्य खोने वाले ग्रामीणों का तो यह हक बनता है कि उन्हें बेहतर जीवन, अच्छा स्वास्थ्य और आजीविका की गारंटी मिले। पिछले तीन महीने में अल्ट्राटेक ने २७८ करोड़, अंबुजा ने १७६ करोड़ और सेंचुरी ने करीब ३०० करोड़ प्रदेश से कमाए हैं। पिछले पांच साल में राज्य में सीमेंट उत्पादन ८० मीट्रिक टन से बढ़कर १४० मीट्रिक टन हो गया है। महंगाई और उत्पादन लागत बढऩे के बाद भी आज कंपनियों की उत्पादन लागत १२५ रुपए प्रति बोरी पड़ रही है। इस तरह कंपनियां प्रति बोरी दोगुने से भी ज्यादा लाभ कमा रही हैं। ऐसे में यह कहना नाइंसाफी होगा कि कंपनियों ने ग्रामीणों के हित के लिए नुकसान उठाया है।
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