यह छत्तीसगढ़ में ही संभव है। जिसे जो काम करना चाहिए वह वो नहीं कर रहा। नाम के अनुरूप यहां काम को लेकर भी ३६ का आंकड़ा है। इतिहासकार का काम ऐतिहासिक तथ्यों की जांच-पड़ताल और इतिहास लेखन करना है। लेकिन, छत्तीसगढ़ सरकार ऐसा नहीं मानती। उसके लिए विषय विशेषज्ञता का कोई मतलब नहीं। शायद इसीलिए यहां के स्वास्थ्य महकमे ने इतिहासकारों को महामारी विशेषज्ञ बना दिया है। वह भी एक दो नहीं, बल्कि राज्य के १८ जिलों में। राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन(एनएचआरएम)के तहत प्रदेश के सभी जिलों में इपिडेमोलोजिस्ट (महामारी विशेषज्ञ) के पद पर एमबीबीएस या पब्लिक हेल्थ डिग्रीधारी की जगह इतिहास और समाजशास्त्र के पोस्ट ग्रेजुएट महामारी विशेषज्ञ के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। जबकि, केंद्र सरकार ने इस पद के लिए न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता एमबीबीएस तय की है। कल्पना कीजिए, जिस राज्य में इतिहासकार महामारी की रोक थाम के उपाय सुझाएंगे वहां की स्वास्थ्य योजनाओं का क्या हश्र होगा।
राज्य के स्वास्थ्य विभाग का एक और कारनामा कवर्धा में उजागर हुआ है। यहां के जिला अस्पताल में पदस्थ ईएनटी विशेषज्ञ डॉ. एनके यदु की नियुक्ति इसलिए हुई कि वे नाक, कान और गले के मरीजों का इलाज करेंगे। लेकिन, यदु पिछले २१ सालों से नसबंदी कर रहे हैं। वह भी महिलाओं की। उन्हें इसका फक्र भी है। तभी तो अभी तक उनके द्वारा किए गए तकरीबन ८२० नसबंदी आपरेशनों का लेखा-जोखा बतौर उपलब्धि उनके नाम दर्ज है। हालांकि, डॉ. यदु एमबीबीएस डिग्रीधारी हैं। इसलिए नसबंदी आपरेशन की अर्हता वे रखते हैं। लेकिन, नसबंदी आपरेशन के लिए नियमानुसार उन्हें कम से कम छह माह का प्रशिक्षण हासिल करना चाहिए था। यह इनके पास नहीं है। शर्मनाक तथ्य यह है कि यदु ने नसबंदी प्रशिक्षण के फर्जी प्रमाणपत्र बटोरे हैं। विशेषज्ञ चिकित्सकों की राय में कोई भी ईएनटी स्पेशलिस्ट किसी महिला या पुरुष की नसबंदी नहीं कर सकता। यह मेडिकल इथिक्स के खिलाफ है। डॉ. यदु की अज्ञानता और लापरवाही ने एक महिला की जान ले ली। तब मामला प्रकाश में आया। जांच हुई तो तो यदु के कारनामे उजागर हुए। इस फर्जीवाड़े के पहले इसी तरह का एक और मामला पकड़ में आया। रायपुर के आमापारा में एक फर्जी डॉक्टर ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना के तहत दो महीने में तीन सौ से अधिक मोतियाबिंद के आपरेशन कर डाले। इसके पास चिकित्सीय योग्यता के नाम पर सिर्फ एक साल के पैरा मेडिकल सर्टीफिकेट कोर्स, नेत्र सहायक का डिप्लोमा है। लेकिन, नेत्र मरीजों की मरहम पट्टी की योग्यता रखने वाला यह व्यक्ति स्वास्थ्य विभाग के अफसरों की कृपा से एमबीबीएस,एमएस डिग्रीधारी डॉक्टर के कार्य को अंजाम दे रहा था। इस तरह की अनियमिताएं सिर्फ स्वास्थ्य विभाग में ही हैं, ऐसा नहीं है।
नगर निगम में भी जिसके जिम्मे जो काम है वह उसे अंजाम नहीं दे रहा। नगर निगम की जिम्मेदारी है कि वह यह सुनिश्चित करे कि नगर की सीमा में बन रहे मकान नक्शे के अनुरूप सुरक्षित और सही ढंग से बनेंं। इसलिए हर जोन में सिविल और आर्कीटेक्ट इंजीनियरों की भर्ती की गई है। लेकिन, रायपुर नगर निगम के तीन जोन में मैकनिकल इंजीनियर और सर्वेयर स्तर के लोग नक्शा पास कर रहे हैं। जबकि, छत्तीसगढ़ भूमि विकास अधिनियम1984 के नियम 26 के मुताबिक सिविल इंजीनियर ही टाउन प्लानिंग का काम देख सकते हैं। जब अपात्र लोग नक्शे पास करेंगे तो मकानों की गुणवत्ता क्या होगी? यह आसानी से समझा जा सकता है। यही हाल गृह निर्माण सहकारी समितियों का भी है। यहां नियुक्त ओआईसी अपना मूल काम नहीं कर रहे हैं। इनका काम गृह निर्माण सहकारी समितियों का चुनाव कराना और संचालक मंडल की नियुक्ति करना है, ताकि जरुरतमंदों को विवाद रहित मकान बनाने के लिए प्लॉट मिल सके। लेकिन, ओआईसी खुद प्लॉट बेचने में जुटे हैं। यानी रक्षक ही लूट रहे हैं घर का सपना। इस तरह की गड़बडिय़ां केवल निचले स्तर पर ही हैं, ऐसा नहीं है। छत्तीसगढ़ विधानसभा के सचिव का काम रिसर्च ऑफिसर देख रहे हैं। इस पद पर काबिज देवेन्द्र वर्मा के खिलाफ राज्य वित्त आयोग के पूर्व अध्यक्ष विरेन्द्र पाण्डेय ने कई आरोप लगाए हैं। लेकिन, सरकार ने सचिव के पद कि योग्यता से तीन पद नीचे वाले अनुसंधान अधिकारी को अभी तक नहीं हटाया है।
छत्तीसगढ़ सरकार की लचर कार्य प्रणाली के ये चंद नमूने हैं। हर विभाग की फाइल पलट लीजिए सब जगह भ्रष्टाचार है। नियमों का कहीं पालन नहीं हो रहा है। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के दस सालों के भीतर अपात्र नियुक्तियों के हजारों ऐसे मामले हैं जिनकी पड़ताल की जरूरत है। परदर्शी और जवाबदेह शासन का नारा देने वाली भाजपा सरकार के लिए नौकरशाही के ये भ्रष्ट उदाहरण यह समझने के लिए काफी हैं कि वाकई छत्तीसगढ़ में कितना स्वच्छ व पारदर्शी प्रशासन है। बहरहाल, सरकार हर उस कर्मचारी से वही काम ले जिनके लिए वे सुयोग्य हैं। नहीं तो हर रोज गलत आपरेशन से किसी महिला की कहीं मौत होगी तो कोई कहीं अपनी आंखों की रोशनी गवांएगा।
राज्य के स्वास्थ्य विभाग का एक और कारनामा कवर्धा में उजागर हुआ है। यहां के जिला अस्पताल में पदस्थ ईएनटी विशेषज्ञ डॉ. एनके यदु की नियुक्ति इसलिए हुई कि वे नाक, कान और गले के मरीजों का इलाज करेंगे। लेकिन, यदु पिछले २१ सालों से नसबंदी कर रहे हैं। वह भी महिलाओं की। उन्हें इसका फक्र भी है। तभी तो अभी तक उनके द्वारा किए गए तकरीबन ८२० नसबंदी आपरेशनों का लेखा-जोखा बतौर उपलब्धि उनके नाम दर्ज है। हालांकि, डॉ. यदु एमबीबीएस डिग्रीधारी हैं। इसलिए नसबंदी आपरेशन की अर्हता वे रखते हैं। लेकिन, नसबंदी आपरेशन के लिए नियमानुसार उन्हें कम से कम छह माह का प्रशिक्षण हासिल करना चाहिए था। यह इनके पास नहीं है। शर्मनाक तथ्य यह है कि यदु ने नसबंदी प्रशिक्षण के फर्जी प्रमाणपत्र बटोरे हैं। विशेषज्ञ चिकित्सकों की राय में कोई भी ईएनटी स्पेशलिस्ट किसी महिला या पुरुष की नसबंदी नहीं कर सकता। यह मेडिकल इथिक्स के खिलाफ है। डॉ. यदु की अज्ञानता और लापरवाही ने एक महिला की जान ले ली। तब मामला प्रकाश में आया। जांच हुई तो तो यदु के कारनामे उजागर हुए। इस फर्जीवाड़े के पहले इसी तरह का एक और मामला पकड़ में आया। रायपुर के आमापारा में एक फर्जी डॉक्टर ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना के तहत दो महीने में तीन सौ से अधिक मोतियाबिंद के आपरेशन कर डाले। इसके पास चिकित्सीय योग्यता के नाम पर सिर्फ एक साल के पैरा मेडिकल सर्टीफिकेट कोर्स, नेत्र सहायक का डिप्लोमा है। लेकिन, नेत्र मरीजों की मरहम पट्टी की योग्यता रखने वाला यह व्यक्ति स्वास्थ्य विभाग के अफसरों की कृपा से एमबीबीएस,एमएस डिग्रीधारी डॉक्टर के कार्य को अंजाम दे रहा था। इस तरह की अनियमिताएं सिर्फ स्वास्थ्य विभाग में ही हैं, ऐसा नहीं है।
नगर निगम में भी जिसके जिम्मे जो काम है वह उसे अंजाम नहीं दे रहा। नगर निगम की जिम्मेदारी है कि वह यह सुनिश्चित करे कि नगर की सीमा में बन रहे मकान नक्शे के अनुरूप सुरक्षित और सही ढंग से बनेंं। इसलिए हर जोन में सिविल और आर्कीटेक्ट इंजीनियरों की भर्ती की गई है। लेकिन, रायपुर नगर निगम के तीन जोन में मैकनिकल इंजीनियर और सर्वेयर स्तर के लोग नक्शा पास कर रहे हैं। जबकि, छत्तीसगढ़ भूमि विकास अधिनियम1984 के नियम 26 के मुताबिक सिविल इंजीनियर ही टाउन प्लानिंग का काम देख सकते हैं। जब अपात्र लोग नक्शे पास करेंगे तो मकानों की गुणवत्ता क्या होगी? यह आसानी से समझा जा सकता है। यही हाल गृह निर्माण सहकारी समितियों का भी है। यहां नियुक्त ओआईसी अपना मूल काम नहीं कर रहे हैं। इनका काम गृह निर्माण सहकारी समितियों का चुनाव कराना और संचालक मंडल की नियुक्ति करना है, ताकि जरुरतमंदों को विवाद रहित मकान बनाने के लिए प्लॉट मिल सके। लेकिन, ओआईसी खुद प्लॉट बेचने में जुटे हैं। यानी रक्षक ही लूट रहे हैं घर का सपना। इस तरह की गड़बडिय़ां केवल निचले स्तर पर ही हैं, ऐसा नहीं है। छत्तीसगढ़ विधानसभा के सचिव का काम रिसर्च ऑफिसर देख रहे हैं। इस पद पर काबिज देवेन्द्र वर्मा के खिलाफ राज्य वित्त आयोग के पूर्व अध्यक्ष विरेन्द्र पाण्डेय ने कई आरोप लगाए हैं। लेकिन, सरकार ने सचिव के पद कि योग्यता से तीन पद नीचे वाले अनुसंधान अधिकारी को अभी तक नहीं हटाया है।
छत्तीसगढ़ सरकार की लचर कार्य प्रणाली के ये चंद नमूने हैं। हर विभाग की फाइल पलट लीजिए सब जगह भ्रष्टाचार है। नियमों का कहीं पालन नहीं हो रहा है। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के दस सालों के भीतर अपात्र नियुक्तियों के हजारों ऐसे मामले हैं जिनकी पड़ताल की जरूरत है। परदर्शी और जवाबदेह शासन का नारा देने वाली भाजपा सरकार के लिए नौकरशाही के ये भ्रष्ट उदाहरण यह समझने के लिए काफी हैं कि वाकई छत्तीसगढ़ में कितना स्वच्छ व पारदर्शी प्रशासन है। बहरहाल, सरकार हर उस कर्मचारी से वही काम ले जिनके लिए वे सुयोग्य हैं। नहीं तो हर रोज गलत आपरेशन से किसी महिला की कहीं मौत होगी तो कोई कहीं अपनी आंखों की रोशनी गवांएगा।
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