शनिवार, 10 दिसंबर 2011

सिरपुर: बुद्व की पावन धरती

यह गौतम बुद्व की पावन धरती है। लोग कहते हैं, उन्होंने यहां की आबोहवा को बनाया।
लंबे समय से यहां के 184 टीलों के नीचे स्वणरिाम इतिहास दबा है। यहां ईसा पूर्व छह सौ साल पहले का इतिहास सोया है। अभी दस-पंद्रह साल पहले तक इस वैभवशाली विरासत के बारे में छत्तीसगढ़ सरकार भी लगभग अनजान थी। उतना ही जानती थी, जितना अंग्रेज पुरातत्वविदों और बाद में एक विश्वविद्यालय ने बताया। छत्तीसगढ़ राज्य के रूप में नए राज्य के सृजन के बाद सरकार जगी, तो इतिहास भी जग गया। सिरपुर की धरती में फिर से उजाला पसर गया। अब नित नई जानकारियां उजागर हो रहीं हैं। पता चल रहा है, ईसा की 6वीं शताब्दी से 10वीं शताब्दी के बीच यहां बौद्ध धर्म काफी फला-फूला। प्रसिद्ध चीनी यात्री व्हेनसांग भी 643 वीं शताब्दी में सिरपुर आया था। उसने यहां के वैभव का अपने यात्रा वृतांत में उल्लेख किया है। उसने लिखा है कि मध्य भारत का यह भाग बौद्ध धर्म का स्तम्भ था। यहां का राजा सभी धर्मों का आदर करने वाला था। वह हिन्दू, बौद्ध और जैन धर्म को समान रूप से राजकीय संरक्षण प्रदान करता था। व्हेनसांग ने यह भी लिखा है कि यहां बहुत बड़ा शिक्षा का केंद्र था। दक्षिणी-पूर्व एशिया से दूर-दूर के शिक्षार्थी उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए सिरपुर आते थे। दो मंजिला बौद्ध विहारों में एक समय 10,000 से अधिक विद्यार्थी विद्याध्ययन करते थे, आदि आदि....।
कैसे बनी सिरपुर जाने की योजना
पिछले एक-डेढ़ सालों से जब से रायपुर में प्रवास कर रहा हूँ, सिरपुर के बारे में कुछ न कुछ सुनता रहा हूं। हाल ही यह भी पता चला, अयोध्या मामले में ऐतिहासिक तथ्यों को रखने वाले डॉ अशोक कुमार शर्मा जी ही पिछले दस सालों से सिरपुर में उत्खनन कार्य करवा रहे हैं। वर्षों पहले एक बार जब वे रायबरेली में चल रहे अयोध्या प्रकरण के मुकदमे में गवाही देने पहुंचे तब उनसे मुलाकात हुई थी। पत्रकारीय पेशे के दायित्व को निभाने के लिए तब शर्मा जी का एक साक्षात्कार लिया था। शर्मा जी के गुणों और कार्यों से तभी से प्रभावित हूं। एक तो सिरपुर को देखने-समझने, दूसरे शर्मा से मिलने की उत्कं ठा मेंमैंने यहां के भ्रमण की योजना बना ली। छह दिसंबर को बाबरी ध्वंस की बरसी  पर सिरपुर भ्रमण और शर्मा जी के साथ यादेंं ताजा करने के लिए महासमुंद चल पड़ा। अपने सहकर्मी और छोटे भाई समान राजेंद्र शाहू जी के संग। साथ हो लिए संतराम शाहू जी भी।
हम तीनों जन रायपुर से सुबह दस बजे दो मोटरसाइकिलों पर सवार होकर सिरपुर के लिए निकले। रायपुर से सिरपुर करीब ८४ किमी दूर नेशनल हाइवे ६ पर महासमुंद जिले में स्थित है। करीब साठ किमी की यात्रा हाइवे पर करने के बाद सिरपुर पहुंचने के लिए लगभग बीस किमी का सफर घने जंगलों के बीच से होकर जाने वाली सड़क से करनी पड़ती है। यहां का दृश्य बहुत मनोरम है। चिडिय़ों की चहचहाहट के बीच साठ किमी के सफर की थकान छूमंतर हो गई। और कब हम सिरपुर पहुंच गए पता ही नहीं चला।
महानदी के तट पर बसा एक छोटा कस्बा
सिरपुर महानदी के तट पर बसा एक छोटा सा कस्बा है। जहां पुरातात्विक महत्व के कई स्मारक मौजूद हैं। किसी समय सिरपुर भी दक्षिण कोसल की राजधानी रह चुका है। तब यह श्रीपुर नाम का एक समृद्ध नगर था। सातवीं आठवीं शताब्दी में यहां शरभपुरी पांडुवंशीय राजाओं का शासन था। जिन्होंने यहां कई मंदिर और विहार बनवाए थे। 7वीं शताब्दी में यहां आए चीनी यात्री ह्वेनसांग ने श्रीपुर में 70 मंदिरों व 100 विहारों का उल्लेख किया है। वह श्रीपुर का स्वर्णकाल था। कालांतर में कई मंदिर एवं विहार काल के गर्त में समा गए। अब यहां गिने चुने मंदिर तथा विहारों के अवशेष बचे हैं।
लक्ष्मण मंदिर
सिरपुर के प्राचीन मंदिरों में लक्ष्मण मंदिर प्रमुख है। स्थापत्य कला का यह अनूठा शिल्प ईटों से निर्मित है। प्राचीन मंदिरों में ईटों से बने मंदिर कम ही होते थे। यह देश का दूसरा प्राचीनतम मंदिर है जो ईटों से बना है। यह भगवान विष्णु को समर्पित है। मंदिर के शिखर में एक से अधिक निर्माण शैलियों की झलक दिखती है, विशेषकर उड़ीसा शैली की। इसका निर्माण पंचरथ शैली में किया गया है। जिसमें मंडप, अंतराल एवं गर्भगृह है। इसकी दीवारों पर चैत्य, गवाक्ष, वातायन, कीर्तिमुख, कर्ण आमलक आदि प्रभावशाली लगते हैं। प्रवेशद्वार पर विष्णु के शेषशायी रूप के साथ कुछ अवतारों का मोहक चित्रण है। तीन ओर की दीवारों पर तीन छोटे-छोटे दरवाजे बने हैं। ईटों के बने ये दरवाजे मंदिर की शोभा बढ़ाते हैं। लक्ष्मण मंदिर से कुछ दूर एक अन्य मंदिर के अवशेष पाए गए हैं। एक टीले के नीचे दबा रहा यह मंदिर अभी पूरी तरह अनावृत्त नहीं हुआ है। पुरातत्व विभाग द्वारा इसके संरक्षण का कार्य अभी चल रहा है। लक्ष्मण मंदिर के पीछे एक संग्रहालय भी है। जहां हमें उत्खनन में प्राप्त कई मूर्तियां देखने को मिलीं।

बौद्ध विहार
सिरपुर में अब दो बड़े विहारों के खंडहर शेष हैं। इनमें से एक है आनंद प्रभु कुटी विहार। विहार में पद्मासन मुद्रा में स्थित भगवान बुद्ध की प्रतिमा वास्तव में दर्शनीय है। बौद्धभिक्षु आनंद प्रभु के लिए बना मंडप भी यहां सुरक्षित है। दूसरा स्वस्तिक विहार कहलाता है। स्वस्तिक आकार में निर्मित इस विहार में ध्यान मुद्रा में भगवान बुद्ध की प्रतिमा स्थित है। सिरपुर के विहार भी ईटों से ही निर्मित हैं। आसपास के क्षेत्र में कुछ और छोटे ऐतिहासिक मंदिर और विहारों के अवशेष मिले हैं।
गंधेश्वर मंदिर
महानदी के तट पर गंधेश्वर मंदिर स्थित है। कहते हैं इस मंदिर का वातावरण प्राकृतिक रूप से सुगंधित बना रहता है। इसीलिए इसे गंधेश्वर मंदिर कहा जाता है। मान्यता है कि यह सुगंध शिवलिंग से आती है, जो प्राकृतिक रूप से प्रकट हुआ है। गर्भगृह के द्वार पर शिव परिवार, कैलाश पर्वत, रावण द्वारा पर्वत हिलाने का प्रयास तथा कुछ अन्य मूर्तियां उकेरी गई हैं। स्तंभों पर पालि भाषा में कुछ शिलालेख भी मौजूद हैं। मुख्य मंदिर के सामने कुछ छोटे मंदिर भी हैं।
पुण्य सलिला महानदी
गंधेश्वर मंदिर से पुण्य सलिला महानदी का विस्तृत क्षेत्र काफी मनोरम लगता है। लेकिन अब नदी में बहुत कम मात्रा में ही पानी रहता है। डॉ शर्मा ने बताया कि इसरो के सेटलाइट से मिले चित्रों के मुताबिक कभी महानदी में बारहों महीने बीस-बीस फीट तक पानी रहता था। तब महानदी में बड़े बड़े जहाज चला करते थे। उत्खनन में मिले बाजार क्षेत्र में बंदरगाह के भी प्रमाण मिले हैं। इससे इस बात की पुष्टि होती है कि दूर देश के व्यापारी यहां अपने माल लेकर आया करते थे। 
मानव संस्कृति की अमूल्य धरोहर खतरे में
हमारी आंखों के सामने ही धीरे-धीरे विलुप्त होता जा रहा है सिरपुर का समृद्व इतिहास ।  समुचित सुरक्षा के अभाव में यह अहसास बरबस पैदा होता है कि आखिर कैसे बचेगी यहंा की धरोहर। पर्यटक बिना किसी नियंत्रण के हर कहीं आ-जा सकते हैं। संस्कृति को कैमरे में कैद करने की ललक के साथ वे ऐतिहासिक बनावटों पर मनमाने ढंग से घूमते हैं, अमूल्य मूर्तियों और नक्काशियों को नंगी उंगलियों से परखते हैं। प्राचीन पत्थर से बनी मूर्तियां वैसे भी अपनी चमक खो चुकी हैं। क्या यह समय की थपेड़ है या राज्य के पर्यटन विभाग की उपेक्षा। बहरहाल, इन स्मारकों के बीच चलते हुए इतिहास की गोद में होने का अनोखा और सुखद अनुभव होता है लेकिन, कुछ सालों में इनकी क्या हालत हो जाएगी। ये खंडहर, भग्नावशेष हजारों साल तक पुराने हैं। इन्हें बचाना है तो पर्यटन से इनकी रक्षा करनी पड़ेगी। लक्ष्मण मंदिर में तो लोग अक्सर कैंपिंग के लिए आते हैं और कूड़ा छोड़ जाते हैं। क्या यह अभी अभी जन्में इतिहास के सिमटने की दास्तान है...। ईश्वर करें ऐसा न हो क्योंकि, सिरपुर को तो अभी अंतरराष्ट्रीय क्षितिज पर पहचान बनानी बाकी है।

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