प्रिंट मीडिया के दो स्तंभ हैं- रिपोर्टर और सब एडीटर। इन्हीं के कंधों पर होता है न्यूज का दारोमदार। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में रिपोर्टर (एंकर) और प्रोड्यूसर यह जिम्मेदारी निभाते हैं। मीडिया के बदलते परिवेश में आज दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। कभी रिपोर्टर सब एडीटर की भूमिका में होता है तो कभी सब एडीटर रिपोर्टर की। जिस अखबार में सब एडीटर और रिपोट्र्स में अच्छे संबंध होते हैं, वहां खबरें बोलती हैं, चमकती-दमकती दिखती हैं। लेकिन, दुर्भाग्यवश आज बहुत कम अखबारों में ही रिपोट्र्स और सब एडीटर्स के बीच तालमेल दिखता है। प्राय: दोनों में अहम की लड़ाई चलती रहती है। उप संपादक समझता है, संवाददाता को कुछ नहीं आता। तो संवाददाता को लगता है कि उप संपादक अल्पज्ञ है। न केवल भारत बल्कि समूची दुनिया की मीडिया में दोनों के बीच यही भाव देखने को मिलता है। यही हाल इलैक्ट्रॉनिक मीडिया का भी है। यहां भी रिपोट्र्स और प्रोड्यूसर के बीच शीतयुद्ध जारी रहता है। खबर फाइल करने के साथ ही सब एडीटर्स और संवाददाता के बीच शीतयुद्ध शुरू हो जाता है। खासकर ब्यूरो और लोकल ब्यूरो से जुड़ी सिटी डेस्क और सेंट्रल डेस्क के सब एडीटर्स के बीच ज्यादा तनातनी रहती है। इन्हीं दोनों डेस्कों के उप संपादकों के बीच ज्यादा मिस अंडरस्टैडिंग और इनटॉलरेंस भी पैदा होता है। छोटी-छोटी बातों पर मनमुटाव कई बार रिपोटर्स को यह लगता है कि खबर की जो हेडिंग और प्लेसिंग होनी चाहिए वह नहीं मिली। शीर्षक और स्थान को लेकर अक्सर बहस होती है। संवाददाता की शिकायत होती है, खबर ज्यादा पठनीय थी उसे प्रथम पृष्ठ पर या अमुक पृष्ठ पर अमुक स्थान मिलना चाहिए था। विशेष इफेक्ट के साथ छापा जाना चाहिए था। रिपोट्र्स कहते हैं, उनकी खबर के अमुक अंश ज्यादा महत्वपूर्ण थे उन्हें हाईलाइट होना चाहिए था, या अमुक तथ्य जरूरी था लेकिन, उसे काट दिया गया। डबल कालम की खबर को सिंगल कर दिया गया या संक्षिप्त कर दिया गया। कई बार संवाददाता किसी खास पक्ष को उजागर करने के लिए या फिर किसी व्यक्ति विशेष को उपकृत करने के लिए खबरें लिखते हैं। उनकी अपेक्षा होती है कि खबर हू-ब-हू छप जाए। दूसरे दिन अखबार से खबर नदारद देख झगड़ा शुरू होता है। रिपोट्र्स को अपने लिखे हर वाक्य, हर शब्द से प्यार होता है लेकिन सब एडीटर्स पर ज्यादा से ज्यादा खबरें पेज पर लेने का दबाव होता है। इसीलिए वह खबरों से अनावश्यक तथ्य हटाकर संपादित अंश प्रकाशित करता है। प्राय: रिपोट्र्स बिना तथ्यों की पुष्टि किए या खबर से जुड़े व्यक्ति का पक्ष लिए बिना अधूरी और एकपक्षीय खबरें लिखते हैं। सब एडीटर्स खबर की गुणवत्ता और विश्वसनीयता के लिए इन तथ्यों की मांग करते हैं, तो दोनों में मनमुटाव पैदा होता है। रिपोट्र्स की इच्छा हर उस खबर पर बाईलाइन लेने की होती है जो रूटीन से हटकर होती है, या जिसमें अतिरिक्त जानकारी होती है। कई बार मूल खबर के कुछ अंशों को घुमा-फिराकर बाईलाइन के चक्कर में स्पेशल स्टोरी लिखी जाती है। सब एडीट्र्स इसे खबर का दोहराव मानता है तो रिपोर्टर अपनी एक्सक्ल्यूसिव स्टोरी। इसको लेकर भी बहस होती है।
अक्सर रिपोट्र्स को घर जाने की जल्दी होती है क्योंकि, वह दिन भर फील्ड में रहता है। इसलिए वह जल्दी-जल्दी खबरें निपटाता है। ऐसे में कई बार महत्वपूर्ण तथ्य छूट जाते हंै, वह जल्दी में गलत एंगिल पर स्टोरी की शुरुआत करता है, या खबर में व्याकरण की दृष्टि से तमाम अशुद्धियां करता है। छोटी-छोटी गलतियां, कामा, विराम और मात्राओं की त्रुटियां सब एडीटर्स को इरीटेट करती हैं। केयरलेस होकर लिखी गयी खबर या डंपिग इन्फारमेशन उप संपादकों पर मनोवैज्ञानिक दबाव डालती हैं। रिपोट्र्स को अपने बीट की एक-दो खबरें लिखनी होती हैं, जबकि उप संपादक के पास तमाम रिपोट्र्स की खबरों को तय समय में संपादित करने का टास्क होता है। ऐसे में खबर का इंट्रो और स्टोरी की बॉडी चेंज करनी पड़ी तो सब एडीट्र्स अपनी झल्लाहट रिपोट्र्स पर उतारता है।
क्या करें रिपोर्टर कुशल रिपोर्टर को चाहिए कि वह खबर लिखने के पहले न्यूज वैल्यू, न्यूज सेन्स के बारे में विचार कर सेंट्रल आइडिया पर ध्यान केंद्रित करे। चंूकि, अखबार पाठकों के लिए निकलता है इसलिए हर खबर में पाठकों के हित को उसके पक्ष को ध्यान में रखें। सेंसेन पैदा करना या फिर हो-हल्ला मचाना खबर का मकसद नहीं होना चाहिए। किसी खबर को लेकर संशय हो तो खूब चर्चा करें। सब एडीट्र्स या अपने कुलीग्स से बात करें। इससे खबर का बेहतर इण्ट्रो और अच्छा बॉडी स्ट्रक्चर बनता है। खबर लिखने के बाद एक बार स्वयं खबरों की स्क्रूटनी करने का नियम बना लें। तथ्यों का मिलान कर लें तो न गल्तियां होंगी और न ही एक दूसरे को नीचा दिखाने की नौबत आएगी।
क्या करें उप संपादक एक अच्छा सब एडीटर वही है जिसमें संयम हो। भाषा का संयम,लेखन का संयम और संपादन का संयम। व्यवहार में संयम तो जरूरी है ही। उसे चाहिए कि वह अपने ईगो और ज्ञान को संभालकर रखें। अच्छे साहित्य पढ़े, ताकि भाषाई ज्ञान में अभिवृद्धि होती रहे। कई बार अच्छे रिपोट्र्स की स्टोरी खराब सब एडीटर को बनाने के लिए मिल जाती है। नासमझी में वह खबर के भाव को ही उलट देता है। इसलिए न्यूज एडीटर को चाहिए कि वह उपयुक्त उपसंपादक को ही उपयुक्त कार्य सौंपे।
महेन्द्र प्रताप सिंह
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