गुरुवार, 1 दिसंबर 2011

'लाल' की काली कमाई

प़ बंगाल के दार्जिलिंग में १९६७ में सीपीआई(एम)के कुछ  कार्यकर्ताओं ने नक्सलबाड़ी के जमींदारों के खिलाफ इसलिए बगावत की थी कि वे गरीब किसानों से न केवल बेगारी करवाते थे, बल्कि चाय की खेती की आड़ में अफीम और पोस्ता की गैरकानूनी खेती कर किसानों का शोषण करते थे। तब लाल झंडे के नीचे कसमें खाई गईं कि जब-तक किसानों और गरीबों का शोषण खत्म नहीं होगा, वे चैन से नहीं बैठेंगे। लेकिन, किसी को क्या पता था कि २००४ में भाकपा (माले) के गठन के बाद ये गरीब जनता के हित की बात करने वाले 'लाल आतंकवादीÓ बन जाएंगे और सामाजिक वातावरण ठीक करने के बजाए देश को अंदर से खोखला करने लगेंगे। इससे बड़ी विडंबना और क्या हो सकती है कि अत्याचार का बदला लेने के नाम पर अब तक हजारों निर्दोष ग्रामीणों और जवानों की जान लेने वाले ये लाल आतंकी ४४ सालों के सफर में खुद वही काम करने लगे हैं, जिसके विरोध में ये खड़े हुए थे। उद्योगपतियों, व्यापारियों, डाक्टरों और ठेकेदारों से अवैध वसूली करने वाले नक्सलियों ने अब पैसों के लिए अपना नार्कोटिक्स नेटवर्क खड़ा कर लिया है। ये छत्तीसगढ़ के बीजापुर और नारायणपुर जिले में किसानों को डरा-धमकाकर  गांजे की खेती करवा रहे हैं। इनका वार्षिक बजट १५००० करोड़  से ज्यादा का हो गया है और ये अवैध कमाई से वसूली राशि को शेयर बाजार, रियल इस्टेट, प्रापर्टी, सोना और बड़े शिक्षण संस्थानों में निवेश कर रहे हैं। राज्य पुलिस और गृह विभाग के पास इस बात के पुख्ता सबूत हैं कि नक्सली संगठन अवैध खनन, कोयला तस्करी से डेढ़ से दो करोड़ और राज्य के तेंदूपत्ता ठेकेदारों से हर साल ५५ से ६० करोड़ की काली कमाई कर रहे हैं। विकास कार्यों में बजट के हिसाब से ये २० से ३० फीसदी कमीशन वसूल रहे हैं। कभी तीर-कमान से आदिवासियों के हक की लड़ाई लडऩे वाले नक्सली आज राकेट लांचर जैसे अत्याधुनिक हथियारों से लैस हैं। विकास के नाम पर विनाश के रास्ते पर बढ़ चुके इन खतरनाक नक्सलियों से सावधान रहने की जरूरत है। ये आतंकी तालिबान बनें, इसके पहले इनके नेटवर्क को ध्वस्त करना होगा। तभी सही मायने में लोगों को विकास का लाभ मिलेगा।

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