भारतीय संविधान देश के सभी नागरिकों के लिए व्यक्तिगत और सामूहिक रूप से बुनियादी स्वतंत्रता देता है। मौलिक अधिकारों की रक्षा की भी संवैधानिक गारंटी है। इनकी रक्षा करना राज्य सरकार का दायित्व है। लेकिन खेद है, छत्तीसगढ़ सरकार नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करने में विफल रही है। उसे कोर्ट की फटकार सुनने की आदत सी पड़ गई है। राज्य के नागरिकों को न साफ हवा मिल रही है, न स्वच्छ वातावरण। और न ही पीने के लिए साफ पानी। बात चाहे बिलासपुर की हो राजधानी रायपुर की या फिर राज्य के किसी और शहर की। बजबजाती नालियां, सड़कों और गलियों में पसरी गंदगी ने नागरिकों का जीना मुहाल कर दिया है। राज्य की सड़कों की हालत ऐसी है कि सही-सलामत घर पहुंच जाएं तो यह राहगीर की किस्मत। परिवहन व्यवस्था तो और भी चौपट है। सड़कों पर जगह-जगह आड़े-तिरछे खड़ी गाडिय़ां, हर पल ट्रैफिक रूल्स की धज्जियां उड़ाते फर्राटा भरते वाहन शहर की पहचान बनते जा रहे हैं। राज्य निर्माण के एक दशक हो चुके हैं लेकिन, लोगों में अभी तक ट्रैफिक सेंस डेवलप नहीं हो पाया है। राज्य का परिवहन महकमा भी नहीं चाहता कि लोग नियमों का पालन करें। इसीलिए अफसर ट्रैफिक व्यवस्था सुधारने के बजाय खुलेआम वसूली में मस्त हैं। इसी तरह हर शहर में कहीं सीवर लाइन, कहीं वाटर सप्लाई तो कहीं बिजली, टेलीफोन के तार बिछाने के लिए सड़कें खोदकर छोड़ दी गई हैं।नियम है कि सड़क काटने के लिए नगर निगम की अनुमति ली जाए। सड़क काटने के बाद सड़क की मरम्मत के लिए नगर निगम संबंधित विभाग से निर्माण राशि वसूलता है। लेकिन, यह राशि निगम अफसरों की जेबों के गड्ढे भरने में खप रही है। नगर निगम अधिनियम की धारा ६६ में प्रावधान है कि वह नागरिकों को बेहतर वातावरण, बेहतर चिकित्सा सुविधाएं, सड़क-पानी समेत जन सुविधाओं का ख्याल रखे। इसके लिए निगम नागरिकों से टैक्स भी वसूलता है। लेकिन, जब राज्य सरकार को ही जनता के मौलिक अधिकारों का ख्याल नहीं तो नगर निगम कुशल और जवाबदेह प्रशासन की उम्मीद कैसे की जा सकती है? मौलिक अधिकारों के हनन और जन सुविधाओं की अवहेलना पर बिलासपुर उच्च न्यायालय आए दिन राज्य सरकार को फटकार लगा रहा है। लेकिन, राज्य सरकार कहीं भी राज्य के नीति निर्देशक तत्वों को पूरा करती नहीं दिखती। ऐसा लगता है,राज्य के मुखिया कागजों में और आंकड़ों के सहारे प्रदेश की किस्मत चमकाने में विश्वास रखते हैं। इसलिए कोर्ट फटकारे या प्रदेश की जनता चिल्लाए उन्हें इसकी परवाह नहीं। अफसर भी अपने हिसाब से कोर्ट को याचिकाओं का जवाब पेश कर देगें। लेकिन कब तक?
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