छत्तीसगढ़ की खुशहाली खेती से है, लेकिन यहां के अन्नदाता बेहाल हैं। औद्योगिक विकास के लिए उनकी जमीनें छीनी जा रही हैं। इससे उनमे आक्रोश बढ़ रहा है। जांजगीर चांपा जिले के तो हर गांव में आग सुलग रही है। यहां छत्तीसगढ़ सरकार ने एक-दो नहीं, बल्कि 34 पावर प्लांट लगाने के लिए देश भर की नामी कंपनियों से एमओयू हस्ताक्षरित किए हैं। बड़ी संख्या में पावर प्लांट लगाए जाने से 70 प्रतिशत से अधिक सिंचाई और कृषि प्रधान भूमि खत्म हो गयी है। किसानों की हालत इतनी खराब है कि ओड़केरा गांव समेत कई गांवों के तो सभी किसान भूमिहीन हो गए हैं। इनके पास एक एकड़ तक जमीन नहीं बची है। यहां एथेना छत्तीसगढ़ पावर कंपनी लिमिटेड १२०० मेगावाट का पावर प्लांट लगा रही है। इस कंपनी पर भी वही आरोप हैं जो अन्य पावर प्लांट कंपनियों पर लगे हैं। जमीन खरीदी में बड़े पैमाने पर धोखाधड़ी की जा रही है। ग्रामीण प्लांट प्रबंधन, दलालों, अधिकारियों और नेताओं की चौकड़ी की कुटिल रणनीति में फंसकर अपनी दो फ सली जमीन बेच रहे हैं। एथेना पावर प्लांट प्रबंधन का साथ तो प्रशासन भी दे रहा है। अफसरों की मदद से भूअर्जन एक्ट की धारा 2 के तहत भूमि अधिग्रहण की कार्रवाई की जा रही है। जबकि, पावर प्लांट निजी है। इसलिए उसे भूअर्जन अधिनियम की धारा 7 के तहत जमीन अधिग्रहीत करनी चाहिए। धारा 2 के तहत तो सिर्फ शासकीय प्रमोशन के लिए जमीन अधिग्रहीत की जाती है। इसलिए ग्रामीणों का विरोध जायज है। बड़ी बात यह है कि भूमिहीन होने वाले गरीब आदिवासी हैं। इसलिए सरकार को इस समस्या की तरफ शिद्दत से ध्यान देगा होगा। विनाश की कीमत पर विकास नहीं चाहिए। इसका समाधान यह नहीं है कि किसी के साथ हिंसा हो या अग्रिम मुआवजे की राशि को बार-बार बढ़ाते हुए उस स्तर तक पहुंचा दिया जाए जिसके बाद परियोजनाओं को लगाना ही अव्यावहारिक हो जाए। इस समस्या का समाधान उन आदिवासियों के लिए प्लांट में हिस्सेदारी का कोई ऐसा फार्मूला पेश करना है, जिन्हें नुकसान हो रहा है। इस फार्मूले में दो तत्व शामिल होने चाहिए, निश्चितता और निष्पक्षता। जमीन के बदले आजीविका का कोई निश्चित विकल्प और निष्पक्ष व सर्वमान्य मुआवजा दिए बगैर जमीन छीनने से औद्योगिक विकास भले सुधर जाए, लेकिन आदिवासियों की तकदीर तो बिल्कुल ठीक नहीं होगी। धान का कटोरा कहीं राख का कटोरा न बन जाए, इसलिए समय रहते सुलगती आग को बुझाना बहुत जरूरी है।
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