गुरुवार, 1 दिसंबर 2011

रोड मैनेजमेंट से ही रुकेंगे हादसे

नेशनल क्राइम रिकॉड्र्स ब्यूरो के अनुसार देश में हर घंटे तेरह लोग सड़क हादसे में अपनी जान से हाथ धो बैठते हैं। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में पिछले दस महीने में बेकाबू ट्रकों ने ४५६ लोगों की जान ले ली। तकरीबन हर रोज अकेले रायपुर में एक व्यक्ति सड़क हादसे में अपंग हो रहा है। बावजूद इसके सड़क सुरक्षा हमारे नीति-निर्धारकों की नजर में नहीं है । और न ही सड़क सुरक्षा सड़क इंजीनियरिंग का हिस्सा ही बन पाई है। सड़क दुर्घटनाओं की ऑडिटिंग, उपयुक्त जांच और राज्य के हालात के मुताबिक अनुसंधान कर सड़क इंजीनियरिंग को सुधारने और यातायात के नियमों को सख्ती से लागू करने के बारे में कोई सुविचारित नीति भी सरकारों के पास नहीं है। राज्य सरकारंे एड्स और कैंसर पीडि़तों के लिए हर साल लंबा-चौड़ा बजट बनाती हैं, लेकिन सड़क दुर्घटनाओं पर नियंत्रण के लिए साल में एक बार यातायात सप्ताह की रस्म अदायगी के सिवाय कुछ नहीं किया जाता। नीति-निर्धारकों के लिए पैदल चलने वाले या फिर दुपहिया वाहन चालकों के सुरक्षा उपाय अमूूमन सबसे निम्न प्राथमिकता में होते हैं। जब भी शहरी क्षेत्रों में कहीं सड़कों की क्षमता बढ़ाई जाती है या फिर नई सड़कें बनती हैं, सरकार की प्राथमिकता महज सड़क जाम से निपटने की होती है। कई बार ऐसा होता है कि फ्लाईओवर बनाकर एक क्रॉसिंग का जाम खत्म करने की कोशिश की जाती है, लेकिन सड़क इंजीनियरिंग और यातायात प्रबंधन के अभाव में यह जाम उस क्रॉसिंग से हटकर उससे अगली क्रॉसिंग पर पहुंच जाता है। कहीं भी देख लीजिए। पैदल चलने वालों को सड़कों के किनारे की पटरी नहीं मिलती। बड़े शहरों को छोड़ दें तो कहीं भी सड़क क्रास करने के लिए स्थान तय नहीं होते। इसकी वजह से पैदल चलने वाले और दोपहिया चालक कहीं से भी सड़क पार करने की कोशिश करते हैं और दुर्घटना का शिकार होते हैं। सड़क दुर्घटनाओं में मरने वाले या घायल होने वालों में निम्न और मध्य वर्ग के लोग ही ज्यादा होते हैं। मरने वालों में पैदल यात्रियों और दुपहिया वाहन चालकों की संख्या अधिक होती है। क्योंकि अमीर वर्ग न तो पैदल चलता है और न ही टू-व्हीलर का अधिक इस्तेमाल करता है। अमूूमन गरीब तबका यह मान लेता है कि व्यक्ति की मौत आई थी, इसलिए वह दुर्घटना का शिकार हो गया। बहुत कम मामलों में खराब रोड मैनेजमेंट के लिए सरकार को कटघरे में खड़ा किया जाता है। शायद यही वजह है कि सड़क दुर्घटना रोकने के लिए सरकार की प्राथमिकता में सड़क सुरक्षा उपाय है ही नहीं। यह बात ड्राइविंग लाइसेंस जारी करने की प्रक्रिया से देखी-समझी जा सकती है। कोई ऐसा जिला नहीं, जहां परिवहन कार्यालयों में ट्रांसपोर्ट दलाल सक्रिय न हों। लोगों के ड्राइविंग लाइसेेंस पैसे के बल पर बिना ड्राइविंग टेस्ट लिए ही बन जाते हैं। लाइसेंस जारी करने में कहीं भी योग्यता की पूरी जांच नहीं की जाती। लोगों में यातायात समझ भी नहीं है। यातायात पुलिस भी इतनी भ्रष्ट हो चुकी है कि वह चंद नोटों की खातिर ट्रैफिक नियमों को तोडऩे की खुली छूट दे देती है। पुलिस की मिलीभगत से हर  रोज नो एंट्री जोन में भारी वाहनों की बेरोकटोक आवाजाही लगी रहती है। यातायात भावना न होने से लोग बेतरतीब ड्राइविंग करते हैं। दुर्घटनाएं बताती हैं कि कितने लोग ट्रैफिक संकेतों का पालन करते हैं। कई बार जब संकेत लाल होता है, लोग देखते हैं कि यातायात सिपाही मौजूद नहीं है, तो वे नियम तोडऩे से परहेज नहीं करते। जीवन की सुरक्षा के लिए एक मिनट की भी प्रतीक्षा लोगों को गंवारा नहीं। जगह-जगह लिखा होता है यहां किस गति से गाड़ी चलाएं या फिर हार्न न बजाएं , लेकिन कितने लोग सड़क पर गति सीमा का पालन करते हैं। एक लेन से दूसरी लेन को पार करने से पहले 10 बार सोचने की जरूरत होती है। कितने लोग दाएं-बाएं देखकर लेन बदलते हैं। नियम तोडऩे पर कितनों को सजा मिलती है। यह कुछ ऐसे सवाल हैं जिनके जवाब हमें और आपको ही तलाशने होंगे। सड़क हादसों को रोकना है तो जितनी जरूरत पुख्ता रोड मैनेजमेंट को लागू करने की है उतनी ही लोगों में यातायात सिविक सेंस विकसित करने की भी है। तभी हम और आप अपने घरों को सुरक्षित लौट पाएंगे।

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