शनिवार, 10 दिसंबर 2011

नालंदा से भी पुराना सिरपुर का शिक्षा केंद्र

उत्खनन में मिली ईसा पूर्व तीसरी सदी की वैदिक पाठशाला मिली
पुरातात्विक स्थल, सिरपुर का शिक्षा केंद्र बिहार के नालंदा विश्वविद्यालय से भी पुराना था। यहां उत्खनन में मिली ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी की वैदिक पाठशाला की कार्बन डेटिंग से पता चलता है कि एक हजार वर्ष पहले सिरपुर पूरी तरह से शिक्षाकेंद्र के रूप में विकसित हो चुका था। सातवीं सदी में जब यहां चीनी पर्यटक व विद्वान ह्वेनसांग आया था तब यहां करीब 100 संघाराम थे, जिनमेें महायान संप्रदाय के दस हजार से ज्यादा भिक्षु विद्यार्जन करते थे। लेकिन, सिरपुर के पुरातात्विक स्थलों का उत्खनन न होने से यहां की ऐतिहासिकता समय पर उजागर नहीं हो पाई। और इसका ज्यादा प्रचार-प्रसार नहीं हो सका।
स्तूप का संबंध भगवान बुद्ध से 
महासमुंद जिले में स्थित सिरपुर में पिछले कई सालों से उत्खनन कार्य करा रहे पुरातत्ववेत्ता और राज्य सरकार के पुरातत्व सलाहकार डॉ अरुण कुमार शर्मा के मुताबिक यहां खुदाई में एक स्तूप मिला है जिसका सीधा संबंध भगवान बुद्ध से है। यह स्तूप सांची के स्तूप से अलग है और पत्थर निर्मित है। पत्थर के स्तूपों के बारे में कहा जाता है कि ऐसे स्तूप भगवान बुद्ध के निर्देशन में ही बनते थे। बौद्ध ग्रंथों में उल्लेख है कि बुद्ध ईसा पूर्व छठीं सदी में सिरपुर आए थे। तब यहां बौद्ध विहारों की स्थापना शुरू हुई। ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में सम्राट अशोक ने इस क्षेत्र में कई स्तूपों का निर्माण कराया। सिरपुर आए ह्वेनसांग केकई लेखों में यहां की अध्ययन प्रणाली, अभ्यास और मठवासी जीवन की पवित्रता का उत्कृ ष्ट वर्णन मिलता है। यह स्थल दीर्घकाल तक ज्ञान-विज्ञान और कला का केन्द्र बना रहा। बारहवीं शताब्दी में आए भीषण भूकंप के बाद यहां की पूरी सभ्यता और विरासत तहस-नहस हो गई।
देश की पहली वैदिक पाठशाला
सिरपुर में उत्खनन के दौरान ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी की वैदिक पाठशाला व शिक्षकों के कमरे मिले हैं। इसे डॉ अरुण कुमार शर्मा के निर्देशन में खोजा गया।10 मीटर लंबे व 1.5 मीटर चौड़े कमरों के बीचो बीच विष्णु की मूर्ति मिली है। इस कमरे में 60 विद्यार्थियों के पढऩे की व्यवस्था थी। डॉ शर्मा के अनुसार यह भारत में खोजी गई सबसे प्राचीन और पहली पाठशाला है। इस तरह की यहां कई पाठशालाओं के होने के प्रमाण मिले हैं।
अब तक का सबसे बड़ा विहार
तीवरदेव महाविहार दक्षिण कोसल में मिला अब तक का सबसे बड़ा विहार है। यह कसडोल जाने वाले मार्ग पर दाहिनी ओर लक्ष्मण मंदिर से एक किमी पूर्व स्थित है। इस क्षेत्र में और कई विहार मिले हैं, जहां छात्रों और अध्यापकों के रहने के अलग-अलग कमरे थे। वस्तुत:यह पूरा क्षेत्र एक बौद्ध सांस्कृतिक संकुल था। क्योंकि, इसी परिसर में अन्य विहार भी स्थित हैं।
प्राचीन चिकित्सा केंद्र भी
उत्खनन में एक महत्वपूर्ण बात यह भी सामने आई है कि सिरपुर एक पूर्ण विकसित नगर होने के साथ ही एक बड़ा आयुर्वेदिक केन्द्र भी था। पूर्णत: वास्तु के अनुरूप बने इस नगर में कई आर्युेदिक स्नानागार भी मिले हैं। जिनमें विभिन्न रोगियों का उपचार किया जाता था। स्नानागारों में जड़ी-बूटियों के अवशेष, आयुर्वेदिक दवाओं के निर्माण में प्रयुक्त पत्थरों के औजार भी पाए गए हैं। एक स्नानागार से व्यक्ति के हाथ का एक अस्थि पंजर मिला है। जिसमें टूटी हड्डी को लोहे की राड से जोड़ा गया है। खास बात यह है कि आज भी यह राड जंगरहित है। इससे पता चलता है कि यहां का आयुर्वेदिक चिकित्सा विज्ञान कितना उन्नत था।
और नालंदा विश्वविद्यालय एक नजर में
प्राचीन भारत में उच्च शिक्षा के सर्वाधिक महत्वपूर्ण इस केन्द्र में महायान व हीनयान बौद्ध धर्म के साथ अन्य धर्मों के तथा अनेक देशों के छात्र पढ़ते थे। बिहार राज्य के पटना से 88.5 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व में इस विश्वविद्यालय के भग्नावशेष मिले। सातवीं शताब्दी में यहां भी भ्रमण पर आए चीनी यात्री ह्वेनसांग तथा इत्सिंग के यात्रा विवरणों में इसका जिक्र है। इस विश्वविद्यालय की स्थापना गुप्त शासक कुमारगुप्त प्रथम (सन् 450-470ई) ने की थी। यहां भी करीब 10,000 विद्यार्थी पढ़ते थे और अध्यापकों की संख्या 2000 के आसपास थी। ११९९ ई में तुर्क आक्रमणकारी बख्तियार खिलजी ने इसे जलाकर नष्ट कर दिया था।

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