छत्तीसगढ़ में बाघिन, तेंदुआ, हाथी और बायसन के बाद अब भालू व लकड़बघ्घे की मौत। राज्य के विभिन्न हिस्सों में निरीह बेजुबानों की संदिग्ध मौतों का सिलसिला जारी है। लेकिन, हर मौत को वन अधिकारी स्वाभाविक बता रहे हैं। राजनांदगांव के अंधागढ़ चौकी इलाके में दुर्लभ वन्यजीव गौर (बायसन) को मारा गया। भालू और लकड़बग्घे को करंट से तड़पा तड़पाकर मौत दी गई। बायसन ने तो दो महिलाओं पर हमला किया था। इसलिए ग्रामीणों ने उसे अपने तरीके से सजा दी। भालू और लकड़बग्घा अपनी झुधा की आग बुझाने के लिए खेत में घुसने की कोशिश की और मारे गए। इन दोनोंं ही मौतों पर वन अफसरों के बयान पर गौर करें। कहीं से नहीं लगता इन्हें बेजुबानों की मौत का दर्द है। ये तो वन्यजीवों की मौत के लिए किसी को दोषी भी नहीं मानते। राजनांदगांव के डीएफओ ने बयान दिया, गौर पेड़ के नीचे बैठा, फिर उठा ही नहीं। जबकि, उसके शरीर पर गंभीर चोट के निशान मिले थे। जिस इलाके में गौर की हत्या हुई वह इनका स्वाभाविक रहवास नहीं है। इसके पहले इस प्रजाति के वन्य जीव को यहां कभी देखा नहीं गया। ग्रामीणों का कहना है कि महाराष्ट्र के जंगलों से भटकते हुए तीन बायसन छत्तीसगढ़ की सीमा में आ गए थे। इसकी जानकारी वन महकमे को थी। लेकिन, वन विभाग ने न तो ग्रामीणों और न ही इस दुर्लभ वन्यजीव की सुरक्षा की पहल की। बायसन का भी वही हश्र जो सितंबर २०११ में छुरिया के बखरूटोला में महाराष्ट्र के जंगलों से भटकर आई बाघिन का हुआ था। भालू और लकड़बग्घे की मौत पर सरोना रेंज के डिप्टी रेंजर का बयान है कि फसल बचाने के लिए किसान खेतों के चारो ओर गैर कानूनी ढंग से करंट दौड़ा रखे हैं। यानि, विभाग को जानकारी है फिर भी अपराध होने दिया जा रहा है। अब मामले की जांच होगी। इसके पहले भी कई हाथियों और तंदुए को भी बर्बरता से मारा गया। बार नवापारा के लवन परिक्षेत्र में इसी अक्टूबर महीने में शिकारियों ने तेंदुए का शिकार कर लिया। इसी हप्ते घरघोड़ा परिक्षेत्र में हथिनी की संदिग्ध मौत हुई। इसके पहले महासमुंद में एक हाथी को करंट लगाकर मार डाला गया। सरगुजा और कोरबा इलाके में तो भालुओं को करंट से मारने की सालभर के भीतर दर्जनों घटनाएं हुई हैं। ये वे मामले हैं जो उजागर हुए और अखबारों की सुर्खियां बनें। इनकी जांच चल रही है। लेकिन, लेकिन वन्य जीवों को मारने वालों के खिलाफ साक्ष्य न मिलने की वजह से किसी पर अभी तक सीधे कार्रवाई नहीं हुई। इसीलिए शिकारी और ग्रामीण बेखौफ हैं। और हर रोज बेजुबान बेमौत मारे जा रहे हैं। राज्य में वन्यजीवों की हत्या के नित नए रिकार्ड बन रहे हैं लेकिन, वन अमला चुप है। राज्य से दुलर्भ सांपों, अजगरों से लेकर बाघ, हाथी तक की हड्डियों, दांतों और खालों की तस्करी हो रही है। सवाल है कि प्रदेश का भारी भरकम वन अमला,राज्य जीव जंतु कल्याण बोर्ड और जिला पशु क्रूरता निवारण समिति समेत अन्य विभाग बेजुबानों को बचाने के लिए क्या कर रहे हैं। बिजली परियोजनाओं और कोयला खनन के लिए रोज जंगल कट रहें तो आखिर वन्य जीव कहां जाएं। उनका पेट कैसे भरे। वे बस्ती में आएंगे ही। ऐसे में नागरिकों विशेषकर ग्रामीणों और वन क्षेत्रों में रहने वाले लोगों में यह जागरूकता क्यों नहीं लाई जा रही कि उनके क्षेत्र में आने वाले वन्य प्राणी निरीह, भोले व अनजान हैं, जो दया व संरक्षण के अभिलाषी हैं और अनजाने में भटकते हुए बस्ती में आ जाते हैं। ये डरे हुए प्राणी आहार, पानी और सुरक्षित स्थान की तलाश में होते हैं। इसलिए इन पर दया करें। इसके साथ ही विभाग को वन्यप्राणियों की हत्या करने वालों के साथ सख्ती से पेश आना होगा। लेकिन, यह कौन करेगा जो शिकारियों से मिला हो उससे क्या उम्मीद की जा सकती है।

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