छत्तीसगढ़ की जीवदायिनी महानदी की निर्मल धारा अब अविरल प्रवाहित नहीं होगी। इसके पानी को जगह-जगह रोकने तैयारी की जा रही है। जांजगीर-चांपा, रायगढ़ और रायपुर जिले में स्थापित होने वाली दर्जनों बिजली कंपनियों को भरपूर पानी मिले, इसके लिए राज्य सरकार महानदी पर एक नहीं, सात-सात बैराज बनाएगी। इन बैराजों का पानी जिंदल, लेंको, जीएमआर, एस्सार, एनटीपीसी, लाड्र्स, भूषण, मोजरबेयर, टोरंटो और सोना पावर जैसी तमाम कंपनियों बेचा जाएगा। पानी की बिक्री से जलसंसाधन विभाग की तिजोरी में सालाना ६२८ करोड़ रुपए आएंगे। महानदी का पानी बेचने से पहले राज्य काजल संसाधन विभाग रोगदा बांध की भी बिक्री का सौदा केएसके पॉवर कंपनी के साथ कर चुका है और गंगरेल बांध को बेचने की तैयारी है। बहरहाल, सरकार बांध बनने से कमाई होने के साथ इसके अनेक अन्य फायदे भी गिना रही है। कहा जा रहा है कि बांधों के बनने से आसपास के क्षेत्रों का जलस्तर बढ़ेगा , कुंओं और तालाबों का पानी जल्दी नहीं सूखेगा और क्षेत्र के ग्रामीणों को सालभर निस्तारी पानी मिलेगा। सवाल यह है कि बांधों के फायदे तो बताए जा रहे हैं, लेकिन इनसे होने वाले नुकसान पर हुक्मरानों के मुंह बंद हैं। जगह-जगह बांधों के बनने से बांध जलभराव क्षेत्र से कितने गांवों का विस्थापन होगा, कितनी उपजाऊ जमीन जलमग्न हो जाएगी और कितना खाद्यान्न उत्पादन घटेगा! सरकार इसका खुलासा क्यों नहीं कर रही। जलप्रवाह को रोके जाने से पारिस्थिकीय संतुलन पर जो बुरा असर पड़ेगा क्या जलसंसाधन विभाग ने इसका आंकलन किया है! रोगदा बांध को बेचे अभी ज्यादा दिन नहीं हुआ है। बांध पाटकर यहां पॉवर प्लांट लगाने की तैयारी का किसान पुरजोर विरोध कर रहे हैं, पर शासन-प्रशासन कम्पनी पर पूरी तरह मेहरबान हैं। प्राकृतिक जल स्रोत को राज्य शासन ने जिस तरह से बेचा है, उससे ग्रामीणों में आक्रोश है। बांध पाटे जाने के बाद आसपास के गांवों का भूजल स्रोत १५-२० मीटर नीचे चला गया है। बहरहाल, राज्य की जमीन, खनिज-वन संपदा और अन्य प्राकृतिक संसाधनों की सौदागर सरकार अब पानी बेचने पर उतारू है। नदी और बांध बेचने के ये सौदे तो उजागर हो गए हैं, लेकिन क्या पता, यह सरकार पानी के बाद हवा, रोशनी और रात की चांदनी का भी सौदा न कर चुकी हो और कल को हम से सांस की कीमत भी वसूली जाय। यह नौबत आए इससे पहले हमें सचेत होना होगा। लेकिन चिंता की बात यह है कि इस गंभीर विषय पर न सरकार चेत रही है, न जनता जाग रही है। छोटी-छोटी बातों पर बवाल मचाने वाले समाजसेवी और स्वयंसेवी संस्थाएं भी मूकदर्शक बनी हुई हैं। खनिज,वन संपदा,नदी, नाले और पानी के प्राकृतिक स्रोत पर सभी का समान हक है। ऐसे में यह गंभीर मामला है कि आखिर सरकार अकेले नदियों का सौदा कैसे कर सकती है! उद्योगपति भूगर्भ जल और नदी के पानी का अंधाधुंध दोहन करें और प्रदूषित जल नदी में प्रवाहित करें, इसके पहले हमें जागना होगा। अन्यथा बैराजों के बनने से पर्यावरण असंतुलन तो गड़बड़ाएगा ही, बिजली कंपनियों से निकलने वाले प्रदूषित जल से कैंसर जैसी विभिन्न घातक बीमारियों के शिकार भी होंगे। महानदी का विषैला जल मछलियों और अन्य जलजीवों के लिए अभिशाप साबित होगा।
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