शनिवार, 17 दिसंबर 2011

अभी आसान नहीं है दलितों की राह

ताजा रिपोर्ट के मुताबिक इस वित्तीय वर्ष में दलित उद्यमियों को दिए गए कज्रे में 33ण्8 फीसद की कमी आई हैण्वे सभी जिन्होंने पिछले दिनों डिक्की अर्थात दलित चेम्बर आफ कामर्स एंड इंडस्ट्रीज के दिल्ली चैप्टर के उद्घाटन की रिपोर्ट पढ़ी होगी या जो केन्द्र सरकार के इस फैसले से अवगत हुए होंगे कि उसने तय किया है कि वह छोटे एवं मध्यम दज्रे के दलित उद्यमियों से अपनी खरीदारी का 20 प्रतिशत लिया करेगीए उन सभी के लिए एक बुरी खबर हैण् मीडिया में प्रकाशित एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक इस वित्तीय वर्ष में दलित उद्यमियों को दिए गए कज्रे में 33ण्8 फीसद की कमी आई हैए जो सैकड़ों ष्दलित उद्यमियों द्वारा सामाजिक आर्थिक बाधाओं को लांघने एवं मुख्यधारा के बिजनेस में पैर जमाने की कोशिशों मेंष् अड़ंगा  बन सकती हैंण्
लाजिमी है कि बिना कज्रे के ऐसे उद्यमियों को उस अवसर से वंचित होना पड़ सकता हैए जो केन्द्र सरकार की नई नीति ने प्रदान किया है जिसका ऐलान हाल में हुआ हैण् यह अनुमान लगाया गया था कि हर साल केन्द्र सरकार छोटे उद्यमियों से 35 हजार करोड़ रुपए की खरीदारी करती हैए उसमें से सात हजार करोड़ की खरीदारी अब वह दलितों.आदिवासियों की मिल्कीयत वाले उद्यमों से किया करेगी
अगर हम सरकारी घोषणाओं के बरक्स दलितों.आदिवासियों के साथ बैंकों के अन्तक्र्रिया पर नजर डालें तो यही पाते हैं कि वहां चित्र बहुत रमणीय नहीं हैण् रिजर्व बैंक आफ इंडिया द्वारा जारी किए गए आंकड़ों के मुताबिक अप्रैल से अक्तूबर माह के बीच सामाजिक न्याय मंत्रालय की बीस विभिन्न योजनाओं के लिए प्रदत्त कज्रे की मात्रा 1ए670 करोड़ तक पहुंची है जो एक तरह से विगत तिमाही से 33ण्8 फीसद कम हैण् अगर पिछले साल के इसी कालखंड को देखें तो मंत्रालय ने 2ए524 करोड़ रुपए की राशि कज्रे के तौर पर प्रदान की थी
दलित एवं आदिवासी तबके से आनेवाले उद्यमियों को सरकारी खरीद में एक निश्चित हिस्सा प्रदान किया जाएय यह चर्चा आज से लगभग दस साल पहले  शुरू हुई थीए जब तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह की अगुआई में मध्यप्रदेश सरकार ने ष्दलित एजेंडाष् पर केन्द्रित एक आयोजन किया थाण् बताया गया था कि अमेरिका की तरह हमें भी व्यापार आदि में विविधता सिद्धांत का पालन करना चाहिएए जहां सरकार अपनी सकारात्मक नीतियों ;एफम्रेटिव एक्शनद्ध के तहत अफ्रो.अमेरिकन एवं अन्य अल्पसंख्यक समुदायों से संबद्ध बिजनेस समूहों से अपनी जरूरत की 30 फीसद सामग्री खरीदती है
हम इसे अमेरिका के अनुभव की चर्चा करके समझ सकते हैंण् अमेरिका में पचास.साठ के दशक में नागरिक अधिकारों के लिए चले आंदोलन के बाद. जिसने अेतों और अन्य अल्पसंख्यक तबकों के साथ ेत समुदाय द्वारा किए जाते भेदभाव को उजागर किया था. अमेरिकी सरकार को ऐसी नीति बनाने के लिए मजबूर होना पड़ा कि अेतों का अनुपात शिक्षा संस्थानों से लेकर रोजगार के विभिन्न क्षेत्रों ही नहीं बल्कि बिजनेस लीडर्स की फेहरिस्त में भी बढ़ेण् इन नीतियों को एफम्रेक्टिव एक्शन अर्थात सकारात्मक नीतियां कहा गयाए जिसके अंतर्गत उद्योगपतियों को इस बात के लिए प्रोत्साहित किया गया कि वे अपने यहां इन तबकों को स्थान देंण्
भारत में वंचितध्उत्पीड़ित तबकों के साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय को दूर करने के लिए उनके लिए स्थानों का निश्चित प्रतिशत सुरक्षित करने की जो पण्राली कायम की गईए उससे यह पण्राली थोड़ी अलग किस्म की थीण् किसी भी संस्थान में अगर विविधता सूचकांक ;डाइवर्सिटी इंडेक्सद्ध अच्छा है अर्थात विभिन्न तबकों को ठीक स्थान दिया गया है तो उपरोक्त संस्थान सरकार की तरफ से विशेष छूटोंए सुविधाओं का लाभ उठा सकता थाए इसके विपरीत यदि किसी संस्थान में यह मन माफिक नहीं है तो अपने आप ऐसी सुविधाओंए छूटों में कटौती होती थीण् वर्ष 1964 में कायम हुई इन नीतियों ने अमेरिकी उद्योगों की सामाजिक संरचना को विविधतापूर्ण बनाने में अहम भूमिका अदा कीण् 
अगर हम खरीदारी में दलितों.आदिवासियों की अगुआई वाले उद्यमों के लिए सरकारी खरीदारी में निश्चित हिस्सा सुरक्षित रखने के सामाजिक प्रभाव की बात करें तो कह सकते हैं कि इस कदम कोए बकौल प्रोफेसर सुखदेव थोरात.  ष्आरक्षण की तर्ज पर सार्वजनिक रोजगारए शिक्षा एवं रोजगार के प्रावधानों में अवसर प्रदान करने की तर्ज पर ऐतिहासिक कदम कहा जा सकता हैण्ष् खुद डॉण् अम्बेडकर ने 25 जनवरी 1919 को साउथबरो आयोग के सामने इसका उल्लेख किया थाण् अपनी प्रस्तुति में उन्होंने उस ष्महारष् महिला का उल्लेख किया था जो फल बेच रही थीण् उनके मुताबिक पुलिस ने तत्काल इस महिला को गिरफ्तार किया क्योंकि उसने इस रिवाज का उल्लंघन किया थाए जिसके अंतर्गत दलित तबके का कोई भी व्यक्ति दूषित करने वाले उद्यम को ही अपना सकता थाण् वर्ष 1947 में संविधान सभा को सौंपे गए ज्ञापन में भी इसका विशेष उल्लेख थाण् उसके मुताबिक ष्फैक्टरियों और व्यावसायिक उद्यमों में निजी उद्यमियों द्वारा जातीय आधार पर किए जानेवाले भेदभाव को भी अपराध समझा जाना चाहिएण्ष् कुछ समय पहले की बात है जब अमेरिका के प्रिंस्टन विविद्यालय और भारत की ष्इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ दलित स्टडीजष् के तत्वावधान में एक अलग किस्म का अध्ययन किया गया थाण् अमेरिका में अेतों एवं अन्य अल्पसंख्यक तबकों के साथ होने वाले भेदभाव को नापने के लिए बनाई गई टेक्नीक का इस्तेमाल करते हुए प्रस्तुत अध्ययन में लगभग पांच हजार आवेदन पत्र भारत की अग्रणी कम्पनियों को 548 विभिन्न पदों के लिए भेजे गएण्योग्यताएं एक होने के बावजूद कुछ आवेदन पत्रों के आवेदकों के नाम से स्पष्ट हो रहा था कि वह दलित समुदायों से सम्बधित हैंण् गौरतलब था कि कम्पनियों की तरफ से ज्यादातर उन्हीं प्रत्याशियों से वापस संपर्क किया गया जिनके नाम उच्च वर्णीय तबके से आते प्रतीत होते थेण् दलित सदृश्य नामों वाले ष्प्रत्याशीष् नौकरी की पहली ही सीढ़ी पर छांट दिए गए थेण् भारत के प्रतिष्ठित ष्इकोनोमिक एंड पोलिटिकल वीकलीष् नामक जर्नल में इस अध्ययन का समूचा विवरण प्रकाशित भी हुआ थाण्इसे विडम्बना ही कहा जाएगा कि सामाजिक तौर पर उत्पीड़ितध्वंचित रहे तबकों को अपने यहां तैनात करने हेतु आरक्षण जैसी किसी पण्राली को लागू करने के केन्द्र सरकार के प्रस्ताव को खारिज करते हुए ष्मेरिटष् की वरीयता की बात करनेवाले कॉरपोरेट क्षेत्र को बेपर्दा करने वाले प्रस्तुत अध्ययन के निष्कषरें पर कभी चर्चा नहीं हुईण् बात आई गई हो गई

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