शनिवार, 17 दिसंबर 2011

तेल कंपनियों को फूटी आंख नहीं सुहाते दलित

डीलरशिप की राह में खड़ी करती हैं तमाम मुश्किले
मध्यप्रदेश के चंदला में रहने वाले देवेन्द्र अहिरवार को पेट्रोल पंप डीलरशिप लेने में ज्यादा मुश्किलें पेश नहीं आईं, लेकिन उनके समुदाय के हजारों लोगों को इस काम के लिए काफी पापड़ बेलने पड़ते हैं। इसका अंदाजा उन्हें अच्छी तरह से है। अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों के कल्याण संबंधी संसदीय समिति की मानें तो सरकारी क्षेत्र की तेल कंपनियों को दलित फूटी अंाखों नहीं सुहाते। समिति ने अपनी ताजा रिपोर्ट में कहा है कि तेल क ंपनियां अनुसूचित जातियों के आर्थिक एवं सामाजिक उन्नयन के संविधान के उद्देश्य को ही समाप्त करने पर तुली हुई हैं। डीलरशिप के विज्ञापन इस तरह प्रसारित किए जाते हैं कि दलितों के बड़े हिस्से को उसकी जानकारी ही नहीं मिल पाती। भेदभाव की इंतिहा तब हो जाती है जब दलितों को ऐसे स्थान आरक्षित किए जाते हैं जहां बिक्री बेहद कम होती है कि उससे तेल कंपनियों का बकाया भरना भी दूभर हो जाता है। समिति ने सुझाव दिया है कि  वंचित तबके के  लोगों की वित्तीय मदद के लिए बैंक ब्याज दर १४ प्रतिशत के बजाय ४ फीसदी हो और दलितों को समस्याओं से बचाने के लिए तगड़ा मैकेनिज्म बनाया जाए  तभी इसका फायदा उन्हें मिल पाएगा।

1 टिप्पणी:

  1. सर मै चंदला का मूल निवासी हू,उनके पास सिर्फ इसलिए डीलरशिप है क्युकी वे चंदला विधायक श्री राम दयाल अहिरवार जी के रिश्तेदार है,

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